हरियाणा के फरीदाबाद जिले के अंतर्गत दयालपुर गांव से पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। यहां एक परिवार द्वारा बाजार से खरीदे गए पैकेटबंद जूस का सेवन करने के तुरंत बाद उनके साढ़े आठ साल के बेटे की तबीयत अचानक बिगड़ गई। बच्चे को लगातार उल्टियां होने लगीं और स्थिति बिगड़ने पर उसे तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाना पड़ा। परिजनों का आरोप है कि जूस के डिब्बों के भीतर फंगस जैसी काली परतें तैर रही थीं, जबकि उत्पाद के पैकेट पर उसकी उपयोगिता अवधि यानी एक्सपायरी डेट अक्टूबर 2026 तक दर्ज थी।
मासूम की तबीयत बिगड़ी, आठ दिनों तक अस्पताल में रहा भर्ती
पीड़ित परिवार के सदस्य गुननाम सिंह ने बताया कि वह अपने बच्चों के लिए बल्लभगढ़ के एक बाजार से ट्रॉपिकाना फ्रूट्ज जूस का तीस पैकेट वाला पूरा बंडल खरीदकर लाए थे। घर पहुंचकर जैसे ही उनके साढ़े आठ वर्षीय बेटे ने एक पैकेट खोलकर जूस पिया, उसे उल्टी शुरू हो गई। देखते ही देखते बच्चे की शारीरिक हालत काफी नाजुक हो गई, जिसके बाद परिजन उसे बिना देर किए अस्पताल लेकर पहुंचे।
अस्पताल में शुरुआती उपचार के दौरान डॉक्टरों ने बच्चे को दवाइयां दीं, लेकिन उसके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं दिखा। इसके बाद चिकित्सकों ने जरूरी चिकित्सकीय परीक्षण और जांच की, जिसमें सामने आया कि बच्चे के पेट और आंतों में गंभीर संक्रमण फैल चुका है। संक्रमण की गंभीरता को देखते हुए बच्चे को तुरंत भर्ती कर सघन इलाज शुरू किया गया। शुरुआत के दो दिनों तक बच्चे को किसी प्रकार की राहत नहीं मिली और उसे ठीक होने में करीब आठ दिन का समय लगा, जिसके चलते वह आठ दिनों तक अस्पताल में उपचाराधीन रहा।
पैकेट के भीतर मिली काली परत और फंगस होने का दावा
परिजनों का स्पष्ट कहना है कि जब उन्होंने बाकी बचे और उपयोग किए गए पैकेट की बारीकी से जांच की, तो उसमें से काले रंग की परतें और फंगस जैसी संदिग्ध सामग्री बाहर निकली। जूस के निचले हिस्से में भी भारी मात्रा में काली परत जमा पाई गई। यह देखकर परिवार के लोग दंग रह गए क्योंकि पैकेट पर स्पष्ट रूप से अक्टूबर 2026 तक की समाप्ति तिथि अंकित थी। समय सीमा बाकी होने के बावजूद इस तरह की दूषित सामग्री का पैकेट के भीतर मिलना खाद्य सुरक्षा मानकों पर सीधे सवाल खड़े करता है।
दुकानदार का जवाब और कंपनी की कथित अनदेखी
घटना के तुरंत बाद जब गुननाम सिंह शिकायत लेकर बल्लभगढ़ स्थित संबंधित दुकानदार के पास पहुंचे, तो दुकानदार ने इस गंभीर समस्या को बेहद सामान्य मानते हुए कहा कि वह पूरा खराब पैकेट वापस लेकर उसकी जगह दूसरा नया पैकेट दे देगा। दुकानदार के इस टालमटोल भरे रवैये के बाद परिवार ने निर्माता कंपनी से औपचारिक संपर्क साधने का प्रयास किया।
गुननाम सिंह के अनुसार, यह घटना करीब दो महीने पहले घटित हुई थी। पिछले दो महीनों के दौरान वह लगातार कंपनी के हेल्पलाइन और शिकायत तंत्र पर संपर्क साध रहे हैं और अब तक लगभग 10 से 12 बार शिकायत दर्ज करा चुके हैं। उनका कहना है कि हर बार कंपनी के प्रतिनिधि उन्हें यह भरोसा दिलाते हैं कि अगले 10 से 12 घंटों के भीतर उनकी जांच टीम मौके पर पहुंचकर संपर्क करेगी या मिलने आएगी, लेकिन दो महीने का समय बीत जाने के बाद भी अब तक कंपनी का कोई भी प्रतिनिधि उनके पास जांच के लिए नहीं पहुंचा।
मुआवजे के सवाल पर अदालत जाने की सलाह
शिकायतकर्ता के अनुसार, इस दौरान कंपनी की ओर से एक व्हाट्सएप कॉल आया था, जिसमें उन्हें केवल इतना प्रस्ताव दिया गया कि वे खराब पैकेट के बदले दूसरा नया पैकेट प्राप्त कर सकते हैं। इस पर जब बच्चे के पिता ने कड़ा विरोध जताते हुए सवाल किया कि यदि दूषित जूस पीने से उनका मासूम बच्चा गंभीर रूप से बीमार पड़ा है, तो उसके इलाज के खर्च और परिवार को हुए मानसिक व आर्थिक नुकसान की भरपाई कौन करेगा, तो कंपनी की तरफ से कथित तौर पर यह जवाब दिया गया कि उनके पास इसके अलावा कोई अन्य उपाय नहीं है। कंपनी के प्रतिनिधि ने यह भी कह दिया कि यदि पीड़ित पक्ष आगे कोई कदम उठाना चाहता है तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
नमूनों की निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग
परिवार का कहना है कि वे केवल इतना चाहते हैं कि कंपनी के जिम्मेदार अधिकारी और विशेषज्ञ दयालपुर आकर जूस के इन पैकेटों और उनमें मौजूद सामग्री की वैज्ञानिक जांच करें, जिससे यह सच सामने आ सके कि आखिर सीलबंद पैकेट के भीतर ऐसी काली परतें और फंगस कैसे पैदा हुईं। परिवार पूरी तरह आश्वस्त है कि बच्चे की तबीयत खराब जूस पीने के कारण ही बिगड़ी थी। हालांकि, जूस की गुणवत्ता वास्तव में खराब थी या नहीं और बच्चे के पेट के संक्रमण का संबंध सीधे तौर पर इसी पेय पदार्थ से था अथवा नहीं, यह बात संबंधित नमूनों की आधिकारिक जांच और प्रयोगशाला परीक्षण के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।



















