फरीदाबाद में सर्दियों की आहट के साथ ही दिल्ली-NCR और पूरे उत्तर भारत में स्मॉग तथा वायु प्रदूषण का संकट गहराने लगता है। इस जहरीली हवा का दुष्प्रभाव केवल आम लोगों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गर्भवती महिलाओं और उनके गर्भ में पल रहे शिशु की सेहत पर भी इसका गंभीर असर पड़ सकता है। फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल के ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी डिपार्टमेंट की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. गार्गी अग्रवाल के अनुसार, हवा में मौजूद अत्यधिक सूक्ष्म कण सांस के रास्ते शरीर में प्रवेश कर खून के जरिए गर्भनाल तक पहुंच सकते हैं, जिससे भ्रूण के विकास में बाधा आने का अंदेशा रहता है।
खून और गर्भनाल तक पहुंचते हैं सूक्ष्म कण
डॉ. गार्गी अग्रवाल का कहना है कि स्मॉग में तैरने वाले बेहद महीन प्रदूषक तत्व सांस के माध्यम से सीधे रक्त संचार प्रणाली में मिल जाते हैं। विभिन्न शोधों में इस बात के संकेत मिले हैं कि ये खतरनाक कण प्लेसेंटा यानी गर्भनाल को भी पार कर सकते हैं। जो महिलाएं लंबे समय तक इस तरह के दूषित माहौल में सांस लेती हैं, उनमें समय से पहले प्रसव होने का जोखिम और नवजात शिशु का वजन कम पैदा होने की आशंका काफी बढ़ जाती है।
गर्भावस्था के पहले तीन महीने क्यों हैं सबसे ज्यादा संवेदनशील
डॉक्टर गार्गी अग्रवाल के मुताबिक, गर्भधारण के शुरुआती तीन महीने भ्रूण के अंगों के निर्माण और विकास के दृष्टिकोण से अत्यधिक नाजुक होते हैं। इस शुरुआती दौर में यदि प्रदूषित हवा का सामना अधिक करना पड़े, तो बच्चे के शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि बाद के महीनों में लापरवाही बरती जाए, क्योंकि गर्भावस्था के दूसरे और तीसरे चरण में भी बच्चे का विकास लगातार जारी रहता है, इसलिए पूरे समय सतर्कता रखना आवश्यक है।
बचाव के लिए N95 मास्क और एयर प्यूरीफायर का उपयोग
प्रदूषण के दुष्प्रभावों से बचने के लिए डॉ. गार्गी अग्रवाल कुछ व्यावहारिक कदम उठाने की सलाह देती हैं। उनका सुझाव है कि गर्भवती महिलाओं को जितना हो सके प्रदूषित वातावरण के सीधे संपर्क में आने से बचना चाहिए। घर से बाहर निकलते वक्त N95 मास्क का इस्तेमाल करने से हवा के कुछ बारीक कणों को श्वसन तंत्र में जाने से रोका जा सकता है, हालांकि यह मास्क सभी प्रकार की जहरीली गैसों से सौ प्रतिशत सुरक्षा की गारंटी नहीं देता है। इसके अलावा घरों के भीतर कमरे के क्षेत्रफल के हिसाब से HEPA फिल्टर युक्त एयर प्यूरीफायर का प्रयोग करना भी फायदेमंद साबित हो सकता है।
नियमित मेडिकल जांच और संतुलित आहार है जरूरी
केवल हवा को शुद्ध करने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इस दौरान महिलाओं को अपनी नियमित मेडिकल जांच पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए। डॉ. गार्गी अग्रवाल का सुझाव है कि समय-समय पर अल्ट्रासाउंड करवाना, गर्भ में पल रहे बच्चे की ग्रोथ पर नजर रखना और एक संतुलित एवं पौष्टिक आहार लेना बेहद जरूरी है। हालांकि यह सच है कि इस प्रदूषित परिवेश से पूरी तरह बच पाना हमेशा मुमकिन नहीं होता, लेकिन उचित सावधानियां अपनाकर इसके संपर्क में आने वाले जोखिम को काफी हद तक कम जरूर किया जा सकता है।



















