मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यून सिस्टम पर हमला करने वाला ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस यानी एचआईवी सही जानकारी और समय पर मेडिकल हस्तक्षेप से पूरी तरह प्रबंधित किया जा सकता है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और बागेश्वर क्षेत्र में स्वास्थ्य जागरूकता के संदर्भ में बागेश्वर जिला अस्पताल की चिकित्सक डॉ. सावित्री शुक्ला ने बताया कि इस वायरस से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करना और इसके वैज्ञानिक पहलुओं को समझना बेहद जरूरी है। समय पर जांच और सही एंटीरेट्रोवायरल इलाज की मदद से संक्रमित व्यक्ति भी एक लंबा और सेहतमंद जीवन जी सकता है।
संक्रमण के वास्तविक कारण और सामान्य सामाजिक संपर्क से जुड़े भ्रम
अक्सर समाज में एचआईवी को लेकर कई तरह के निराधार डर और गलतफहमियां देखने को मिलती हैं। डॉ. सावित्री शुक्ला के अनुसार, एचआईवी से संक्रमित किसी भी व्यक्ति के साथ हाथ मिलाने, गले मिलने, एक ही कमरे में पास बैठने या साथ बैठकर भोजन साझा करने से यह वायरस कभी नहीं फैलता है। यह किसी भी सामान्य सामाजिक संपर्क, बातचीत या छूने से नहीं फैलता।
यह वायरस मुख्य रूप से कुछ विशिष्ट शारीरिक द्रवों के आदान-प्रदान के माध्यम से ही एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचता है। इनमें संक्रमित खून, वीर्य, योनि स्राव और स्तन का दूध शामिल हैं। मुख्य जोखिम कारकों में बिना सुरक्षा के यौन संबंध बनाना, संक्रमित व्यक्ति पर इस्तेमाल की गई सुई या सिरिंज का दोबारा उपयोग करना और बिना जांचा हुआ संक्रमित रक्त चढ़ाना शामिल हैं। बचाव के लिए यौन संबंधों के दौरान कंडोम का सही उपयोग करना चाहिए। किसी भी मेडिकल प्रक्रिया या इंजेक्शन के दौरान हमेशा नई और स्टेराइल सुई या सिरिंज का इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके अलावा, रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ने पर हमेशा पूरी तरह जांचे-परखे रक्त का ही उपयोग होना चाहिए, और शेविंग रेजर या ब्लेड जैसी खून के संपर्क में आने वाली वस्तुओं को कभी भी साझा नहीं करना चाहिए।
शुरुआती शारीरिक संकेत और जांच की अनिवार्यता
एचआईवी संक्रमण के शुरुआती दौर में कई लोगों के शरीर में किसी भी प्रकार के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। हालांकि, संक्रमण के संपर्क में आने के कुछ हफ्तों बाद कुछ व्यक्तियों में फ्लू जैसे सामान्य लक्षण उभर सकते हैं। इनमें हल्का बुखार, सिरदर्द, गले में खराश, त्वचा पर लाल चकत्ते और अत्यधिक थकान महसूस होना शामिल हैं।
यदि संक्रमण समय के साथ शरीर में बढ़ता रहे, तो वजन में अप्रत्याशित कमी, लंबे समय तक बना रहने वाला बुखार, हफ्तों तक चलने वाला लगातार दस्त, पुरानी खांसी और लिम्फ नोड्स में सूजन जैसी गंभीर समस्याएं सामने आ सकती हैं। डॉ. शुक्ला का कहना है कि ये सभी लक्षण केवल एचआईवी तक सीमित नहीं हैं और कई अन्य सामान्य बीमारियों में भी देखे जा सकते हैं। इसलिए लक्षणों के आधार पर खुद कोई राय बनाने के बजाय प्रयोगशाला में एचआईवी जांच कराना ही वास्तविक स्थिति जानने का एकमात्र वैज्ञानिक और पुख्ता तरीका है।
72 घंटे के भीतर पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीईपी) की भूमिका
यदि किसी व्यक्ति का संभावित रूप से संक्रमित रक्त या शारीरिक द्रव से संपर्क हो जाता है, जैसे कि असुरक्षित यौन संबंध, कंडोम का फटना या संक्रमित सुई चुभना, तो उसे तुरंत बिना किसी देरी के डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। ऐसी आपात स्थिति में चिकित्सक स्थिति का आकलन करके पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस यानी पीईपी उपचार शुरू करने की सलाह देते हैं।
पीईपी एंटीरेट्रोवायरल दवाओं का एक विशेष कोर्स है, जिसे संभावित संक्रमण के 72 घंटे यानी 3 दिन के भीतर शुरू करना अनिवार्य होता है। यह उपचार जितनी जल्दी शुरू किया जाए, संक्रमण के खतरे को रोकने में उतना ही अधिक प्रभावी होता है। आमतौर पर पीईपी दवाओं का यह कोर्स लगातार 28 दिनों तक चलता है। यह पूरी तरह से एक मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन आधारित उपचार है, जिसे केवल अधिकृत डॉक्टर की देखरेख में ही लिया जाना चाहिए; मरीज को कभी भी अपने स्तर पर इन दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए।
विंडो पीरियड और दोबारा जांच का महत्व
संभावित संपर्क के तुरंत बाद कराई गई एचआईवी जांच की रिपोर्ट अक्सर नेगेटिव आ सकती है। इसके पीछे मुख्य कारण विंडो पीरियड होता है। विंडो पीरियड वह समय अंतराल है, जिसमें शरीर में वायरस के प्रवेश करने के बावजूद संबंधित टेस्ट किट में वायरस या उसके एंटीबॉडीज का पता नहीं चल पाता।
अलग-अलग प्रकार की एचआईवी जांच तकनीकों के लिए यह विंडो पीरियड अलग-अलग समय-सीमा का हो सकता है। इसी वजह से संदिग्ध संपर्क के तुरंत बाद आने वाली नेगेटिव रिपोर्ट को अंतिम परिणाम नहीं माना जाना चाहिए। डॉक्टर द्वारा सुझाए गए निश्चित अंतराल के बाद दोबारा जांच कराना जरूरी होता है। यदि हाल ही में कोई जोखिम भरा संपर्क हुआ है, तो जांच के नतीजों के इंतजार में समय गंवाने के बजाय तत्काल डॉक्टर से मिलकर पीईपी थेरेपी के बारे में परामर्श लेना चाहिए।
सरकारी सुविधाएं, गोपनीयता और राष्ट्रीय हेल्पलाइन 1097
भारत सरकार के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के तहत देश भर के सरकारी जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में एकीकृत परामर्श एवं परीक्षण केंद्र (आईसीटीसी) संचालित किए जाते हैं। इन केंद्रों पर एचआईवी की नि:शुल्क जांच और विशेषज्ञ परामर्श की पूरी सुविधा उपलब्ध है।
आईसीटीसी केंद्रों पर जांच कराने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पहचान और रिपोर्ट की गोपनीयता का शत-प्रतिशत ध्यान रखा जाता है। इसके अतिरिक्त, गर्भवती महिलाओं के लिए समय पर एचआईवी जांच कराना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि संक्रमण का समय रहते पता चलने पर उचित चिकित्सकीय देखरेख से बच्चे में वायरस के प्रसार को प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है। एचआईवी से जुड़ी किसी भी प्रकार की जानकारी, निकटतम केंद्र का पता या परामर्श प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1097 पर संपर्क किया जा सकता है।



















