मातृत्व की यात्रा किसी भी महिला के जीवन का बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण पड़ाव होती है। इस समय गर्भवती महिला को न केवल अपने स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी करनी होती है, बल्कि गर्भ में विकसित हो रहे शिशु की पोषण व सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं का भी पूरा ख्याल रखना पड़ता है। इस पूरी अवधि में संतुलित व पौष्टिक भोजन, पर्याप्त विश्राम और नियमित रूप से की जाने वाली सौम्य शारीरिक गतिविधियां अत्यंत अहम भूमिका निभाती हैं। प्रसव की प्रक्रिया के लिए शरीर को धीरे-धीरे तैयार करने और पूरे नौ महीनों तक खुद को ऊर्जावान व तंदुरुस्त बनाए रखने के मकसद से कई महिलाएं योग और हल्के व्यायाम का सहारा लेती हैं।
शारीरिक सक्रियता और मानसिक शांति का संतुलन
चिकित्सक अथवा प्रशिक्षित विशेषज्ञ की समुचित निगरानी में अपनाए गए योगाभ्यास शरीर की मांसपेशियों को चुस्त रखने में काफी मदद करते हैं। इनसे न सिर्फ जोड़ों और लिगामेंट्स का लचीलापन बना रहता है, बल्कि इस नाजुक दौर में हार्मोनल उतार-चढ़ाव से उत्पन्न होने वाले मानसिक तनाव और चिंता को कम करने में भी सहायता मिलती है। हालांकि किसी भी नए अभ्यास को दिनचर्या का हिस्सा बनाने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लेना अनिवार्य है। नीचे ऐसे पांच प्रमुख आसनों और प्राणायाम के बारे में विस्तार से बताया गया है, जिन्हें विशेषज्ञ मार्गदर्शन में किया जा सकता है।
बद्ध कोणासन या तितली आसन
बद्ध कोणासन को आम बोलचाल में तितली आसन यानी बटरफ्लाई पोज के नाम से जाना जाता है। इस अभ्यास को करने के लिए समतल जमीन पर चटाई बिछाकर आराम से बैठ जाएं और दोनों पैरों के पंजों व तलवों को सामने की ओर आपस में सटा लें। इसके बाद अपने दोनों घुटनों को सहजता से बाहर की तरफ जमीन की दिशा में झुकाएं। इस दौरान सबसे जरूरी बात यह है कि पैरों को बलपूर्वक अथवा झटके के साथ अपनी ओर खींचने का कतई प्रयास न करें। यह आसन जांघों के भीतरी हिस्से और कूल्हों के आसपास स्थित मांसपेशियों में सुखद खिंचाव पैदा करता है, जिससे प्रसव से पहले पेल्विक क्षेत्र की मांसपेशियों में स्वाभाविक लचीलापन बना रहता है।
मार्जरी आसन से पीठ को राहत
गर्भावस्था के आगे बढ़ने के साथ-साथ कई महिलाओं को रीढ़, पीठ और कमर के निचले हिस्से में अकड़न व दर्द की शिकायत रहने लगती है। ऐसी स्थिति में मार्जरी आसन, जिसे कैट-काउ पोज भी कहा जाता है, पीठ को बेहद सुरक्षित और कोमल हलचल प्रदान करने में उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इसे करने के लिए अपनी दोनों हथेलियों और घुटनों को जमीन पर टिकाकर चौपाया मुद्रा बना लें। इसके बाद धीमी सांस अंदर भरते हुए पीठ को हल्का सा नीचे की ओर झुकाएं और सांस बाहर छोड़ते हुए पीठ को ऊपर की ओर गोलाई में उभारें। इस पूरी प्रक्रिया को बिना किसी जल्दबाजी के सहज गति से दोहराएं। इससे रीढ़ की हड्डी में लचक बनी रहती है और पीठ की मांसपेशियों में जमा खिंचाव ढीला पड़ता है।
ताड़ासन से शरीर का संतुलन
शारीरिक मुद्रा, स्थिरता और शरीर के संतुलन को दुरुस्त रखने के लिए ताड़ासन का अभ्यास बेहद प्रभावी माना जाता है। इसे करने के लिए पैरों के बीच थोड़ा सुरक्षित फासला रखकर सीधे खड़े हो जाएं। इसके उपरांत धीरे-धीरे अपने दोनों हाथों को ऊपर की दिशा में उठाएं और पूरे शरीर को सीधा तानें। इस स्थिति में कुछ सेकंड रुकते हुए स्वाभाविक रूप से सांस लेते और छोड़ते रहें। चूंकि गर्भावस्था के विभिन्न चरणों में पेट का भार बढ़ने से शरीर का गुरुत्वाकर्षण केंद्र और संतुलन बदलता रहता है, इसलिए इस आसन को किसी मजबूत दीवार या सहारे के निकट खड़े होकर ही करना चाहिए ताकि गिरने का कोई जोखिम न रहे।
वज्रासन करते समय जरूरी सावधानियां
वज्रासन एक ऐसा अभ्यास है जिसमें घुटनों को पीछे मोड़कर एड़ियों के ऊपर बैठा जाता है, पीठ को तानकर सीधा रखा जाता है और दोनों हाथों को घुटनों पर टिकाया जाता है। यद्यपि यह पाचन के लिए जाना जाता है, परंतु गर्भावस्था के दौरान पेट का आकार और वजन बढ़ने के कारण इस स्थिति में ज्यादा देर बैठना कई बार असुविधाजनक महसूस हो सकता है। अतः इसे अपनी दिनचर्या में केवल तभी शामिल करना चाहिए जब डॉक्टर स्पष्ट रूप से इसके लिए अनुमति दें। यदि बैठने में खिंचाव लगे तो नितंबों या पैरों के नीचे मुलायम तकिए अथवा कुशन का सहारा लिया जा सकता है। घुटनों पर असामान्य दबाव पड़ने या पेट पर जरा सा भी जोर महसूस होने पर इस आसन को बिल्कुल छोड़ देना चाहिए।
भ्रामरी प्राणायाम से मानसिक शांति
गर्भावस्था के दौरान शरीर में तेजी से होने वाले बदलावों के चलते कई बार बेचैनी, घबराहट और मानसिक थकावट की समस्या हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में भ्रामरी प्राणायाम मन को तुरंत विश्राम देने और मस्तिष्क को शांत करने में अत्यंत प्रभावशाली भूमिका निभाता है। इसे करने के लिए किसी भी आरामदायक मुद्रा में बैठ जाएं और अपनी आंखें कोमलता से बंद कर लें। अब नासिका छिद्रों से धीरे-धीरे गहरी सांस भीतर खींचें और सांस को बाहर छोड़ते समय भंवरे जैसी धीमी गुनगुनाहट की ध्वनि निकालें। इस चक्र को अपनी सहज क्षमता के अनुसार कुछ बार दोहराएं। अभ्यास के दौरान सांस को रोकने या फेफड़ों पर अतिरिक्त जोर डालने की बिल्कुल जरूरत नहीं होती है।


















