गांवों और ग्रामीण अंचलों में अक्सर पगडंडियों और झाड़ियों के इर्द-गिर्द प्राकृतिक रूप से पनपने वाला मकोय का पौधा देखने में भले ही सामान्य घास-फूस की तरह नजर आए, लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद के नजरिए से यह अत्यंत गुणकारी वनस्पति है। आमतौर पर स्थानीय लोग इसे काला भटकोइया के नाम से भी पहचानते हैं। इस पौधे पर जब फल पूरी तरह पक जाते हैं तो उनका रंग गहरा काला हो जाता है, जिसके चलते कई इलाकों में इसे यह देसी नाम मिला है। आयुर्वेद में करीब 17 साल का गहन अनुभव रखने वाले जिला आयुर्वेद एवं यूनानी अधिकारी बलिया डॉ. अनिल कुमार ने इस पौधे के चिकित्सीय महत्व और उपयोग के तौर-तरीकों को विस्तार से रेखांकित किया है।
पूर्वांचल में प्रचुरता और गरीबों का अंगूर की पहचान
डॉ. अनिल कुमार की दी गई जानकारी के अनुसार, काला भटकोइया का यह पौधा बलिया जनपद समेत पूरे पूर्वांचल और आसपास के कई अन्य जिलों में बहुतायत में उगता है। स्वरूप की बात करें तो यह एक झाड़ीनुमा वनस्पति होती है, जिसकी पत्तियां हरी और मुलायम होती हैं। फल पकने के बाद काले मोतियों जैसे चमकते हैं। अपने इसी अनूठे स्वरूप और सुलभता के कारण ग्रामीण अंचलों में कई लोग इसे गरीबों का अंगूर भी कहते हैं। औषधीय घटकों से लबरेज होने के कारण इसका पारंपरिक इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है।
लिवर का टॉनिक और फैटी लिवर में असरदार
डॉ. अनिल कुमार बताते हैं कि मकोय का सबसे चमत्कारी प्रभाव मानव शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंग यानी लिवर पर देखा जाता है। यही कारण है कि आयुर्वेद के जानकारों के बीच इसे लिवर का टॉनिक माना जाता है। खासकर जब कोई व्यक्ति फैटी लिवर की परेशानी से जूझ रहा होता है, तब इसके नियमित और संतुलित प्रयोग से काफी राहत मिलती है। इसके अलावा पीलिया जैसे गंभीर यकृत विकार में भी इसका सेवन अत्यंत मुफीद माना गया है। सुबह और शाम के समय सीमित मात्रा में इसके काढ़े का सेवन करने से लिवर की कार्यप्रणाली तेजी से सुधरती है।
पाचन तंत्र, किडनी और त्वचा के विकारों में राहत
लिवर के साथ-साथ यह पौधा आंत के बुखार, शरीर की भीतरी या बाहरी सूजन और जोड़ों के दर्द को दूर करने में भी सहायक साबित होता है। डॉ. कुमार के मुताबिक, मकोय पाचन शक्ति को मजबूत बनाता है और उदर विकारों को शांत करता है। इसके अलावा मूत्र संबंधी समस्याओं और किडनी की सेहत को दुरुस्त रखने में भी यह पौधा विशेष तौर पर गुणकारी है। विभिन्न प्रकार के त्वचा रोगों से पीड़ित लोगों के लिए भी इसका पारंपरिक प्रयोग लाभ पहुंचाता है, जिससे यह पूरी तरह से एक बहुउपयोगी घरेलू औषधि के रूप में सामने आता है।



















