दुनिया भर में कैंसर की सौ से भी अधिक किस्में मौजूद हैं और प्रत्येक प्रकार के इलाज के लिए अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियां अपनाई जाती हैं। मानव शरीर के पाचन तंत्र में स्थित पित्त वाहिनी का कैंसर यानी बाइलरी ट्रैक्ट कैंसर बेहद जानलेवा माना जाता है। इस कैंसर से पीड़ितों के पूरी तरह स्वस्थ होने की दर चिंताजनक रूप से काफी कम रहती है। वर्तमान समय में ब्रिटेन और स्वीडन की जानी-मानी बायोटेक फर्म एस्ट्राजेनेका द्वारा निर्मित इम्फिंजी दवा को इस बीमारी के खिलाफ सबसे अचूक हथियार माना जाता है। हालांकि, अब चीन की बायोटेक संस्थान अकेसो ने दावा किया है कि उसने इवोनसिमैब नाम से एक नई दवा विकसित की है जो एस्ट्राजेनेका की दवा की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली और असरदार परिणाम दे रही है। व्यापक स्तर पर आयोजित तीसरे चरण के क्लिनिकल ट्रायल के आंकड़े बताते हैं कि अकेसो की यह खोज वैश्विक फार्मास्यूटिकल बाजार में नया बदलाव ला सकती है।
क्लिनिकल ट्रायल के नतीजे और मरीजों की जीवन अवधि
अकेसो द्वारा आयोजित तीसरे चरण के इस परीक्षण में पित्त वाहिनी के कैंसर से जूझ रहे कुल 682 मरीजों को शामिल किया गया था। अध्ययन को निष्पक्ष और सटीक बनाने के लिए मरीजों को दो अलग-अलग समूहों में बांटा गया। पहले समूह के रोगियों को अकेसो की नई दवा इवोनसिमैब के साथ पारंपरिक कीमोथेरेपी दी गई, जबकि दूसरे समूह के रोगियों को एस्ट्राजेनेका की स्थापित दवा इम्फिंजी के साथ कीमोथेरेपी की खुराक दी गई। क्लिनिकल आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि इवोनसिमैब का सेवन करने वाले मरीजों की जीवित रहने की अवधि इम्फिंजी लेने वाले मरीजों की तुलना में काफी अधिक रही। अकेसो की संस्थापक और सीईओ डॉ. शिया यू के अनुसार, पेट और पाचन तंत्र से जुड़े कैंसर के इलाज में यह खोज एक ऐतिहासिक सफलता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह दवा चीन में फेफड़ों के कैंसर के इलाज के लिए पहले ही प्रशासनिक मंजूरी हासिल कर चुकी है, जबकि अमेरिका में इसकी स्वीकृति की प्रक्रिया जारी है। इसके साथ ही कंपनी अब आंतों के कैंसर और गले या गर्दन के कैंसर पर भी इसके परीक्षण का दायरा बढ़ा रही है।
कीमोथेरेपी बनाम इम्यूनोथेरेपी की कार्यप्रणाली
कैंसर के उपचार में लंबे समय से इस्तेमाल की जाने वाली कीमोथेरेपी कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के साथ-साथ शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को भी भारी नुकसान पहुंचाती है। इस कारण अक्सर मरीजों के महत्वपूर्ण अंग काम करना बंद कर देते हैं, जो चिकित्सा विज्ञान के सामने एक बड़ी चुनौती रही है। इसके विपरीत, एस्ट्राजेनेका की इम्फिंजी और अकेसो की इवोनसिमैब दोनों ही आधुनिक इम्यूनोथेरेपी तकनीक पर काम करती हैं। सामान्य परिस्थितियों में हमारे शरीर के लिंफ सिस्टम में मौजूद टी कोशिकाएं किसी भी बाहरी संक्रमण या असंतुलन को पहचानकर उसे नष्ट कर देती हैं। हालांकि, कैंसर कोशिकाएं बेहद चालाक होती हैं और वे अपनी सतह पर PD-L1 नामक प्रोटीन की एक सुरक्षात्मक परत बना लेती हैं। इस ढाल के कारण टी कोशिकाएं कैंसर कोशिकाओं को पहचान नहीं पातीं और उन्हें सामान्य स्वस्थ कोशिकाएं समझ बैठती हैं। इम्यूनोथेरेपी दवाएं इस PD-L1 प्रोटीन के आवरण को निष्क्रिय कर देती हैं, जिससे शरीर का अपना इम्यून सिस्टम कैंसर कोशिकाओं को आसानी से पहचानकर उन्हें खत्म कर देता है। अकेसो की इवोनसिमैब इसी प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी ढंग से अंजाम देती है।
ग्लोबल फार्मा बाजार और भावी चुनौतियां
कैंसर उपचार के वैश्विक बाजार में इस समय अमेरिकी दिग्गज मर्क, मोडर्ना और ब्रिटिश-स्वीडिश कंपनी एस्ट्राजेनेका जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व है। मर्क द्वारा बनाई जाने वाली दवा कीट्रुडा को दुनिया की सबसे सफल इम्यूनोथेरेपी माना जाता है, जिसके जेनेरिक विकल्प भी उपलब्ध हैं। दूसरी तरफ, एस्ट्राजेनेका ने पिछले वर्ष अकेले इम्फिंजी की वैश्विक बिक्री से 6 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का राजस्व अर्जित किया था, जो उसकी पिछली वार्षिक बिक्री से 28 प्रतिशत अधिक था। ऐसे में चीन की बायोटेक कंपनियों का यह नया प्रदर्शन पश्चिमी देशों के एकाधिकार को सीधी चुनौती दे रहा है। बाजार विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि अकेसो की नियामकीय प्रक्रियाएं बिना किसी रुकावट के पूरी हो जाती हैं, तो इवोनसिमैब बहुत जल्द बाइलरी ट्रैक्ट कैंसर के मरीजों के लिए बाजार में व्यावसायिक रूप से उपलब्ध कराई जा सकती है।



















