दोपहर या रात का पूरा भोजन कर लेने के बाद भी कई बार मन शांत नहीं होता और नजरें सीधे रसोई या फ्रिज की ओर मुड़ने लगती हैं। पेट पूरी तरह संतुष्ट होने के बावजूद दिमाग लगातार यह हिसाब लगाने लगता है कि अगली बार क्या चखा जाए, कोई मीठी चीज मिल जाए या अपनी मनपसंद तली-भुनी डिश का स्वाद लिया जाए। वास्तविक शारीरिक भूख न होने पर भी भोजन के इर्द-गिर्द घूमने वाले इन अनचाहे ख्यालों को वैज्ञानिक और स्वास्थ्य जगत में फूड नॉइज कहा जाता है।
फूड नॉइज क्या है और दिमाग पर इसका असर
फूड नॉइज का सीधा अर्थ है दिमाग में भोजन को लेकर लगातार चलने वाली मानसिक बातचीत या विचारों की निरंतर गूंज। इससे जूझने वाला व्यक्ति अक्सर इस कशमकश में रहता है कि उसे थोड़ी देर बाद क्या खाना चाहिए, मीठे की तलब क्यों उठ रही है या पसंदीदा भोजन कब मिलेगा। सबसे अहम बात यह है कि इस मानसिक हलचल का वास्तविक भूख से कोई सीधा संबंध नहीं होता। पेट भरा होने पर भी खाने की यह तलब शांत नहीं पड़ती। यह स्थिति कोई अलग से पहचानी जाने वाली चिकित्सीय बीमारी नहीं है, बल्कि भोजन से जुड़े लगातार हावी रहने वाले ख्यालों को व्यक्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक सामान्य शब्द है।
तनाव, बोरियत और भावनात्मक भूख का खेल
जब भी कोई व्यक्ति उदासी, अकेलापन, दिनभर की थकान या अत्यधिक मानसिक तनाव से गुजरता है, तो उसका ध्यान अचानक पसंदीदा चीजों की ओर खिंचने लगता है। इस स्थिति को इमोशनल ईटिंग यानी भावनात्मक रूप से खाना कहा जाता है। भोजन करने से मस्तिष्क को कुछ पलों के लिए शांति या राहत का अहसास होता है, जिससे मन उसी अस्थाई सुकून को बार-बार पाने के लिए खाने की नई तलब पैदा करने लगता है। बोरियत के पलों में भी लोग सिर्फ समय बिताने के लिए रसोई का रुख करने लगते हैं।
स्वाद की यादें और दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम
सिर्फ भावनाएं ही नहीं, बल्कि बाहरी चीजें भी इन विचारों को तेजी से भड़काती हैं। अपनी पसंदीदा मिठाई, समोसा, नमकीन या तले हुए व्यंजनों को केवल देख लेना या उनकी महक नाक तक पहुंचना ही दिमाग को सक्रिय कर देता है। भोजन से जुड़ी पुरानी सुखद स्मृतियां और मस्तिष्क की इनाम से जुड़ी प्रक्रियाएं मिलकर स्वाद की तीव्र चाह पैदा कर देती हैं। दिमाग उन चीजों को पाने के लिए मचलने लगता है, भले ही शरीर को उस वक्त एक भी अतिरिक्त निवाले की आवश्यकता न हो।
क्रैश डाइटिंग, पोषक तत्वों की कमी और अधूरी नींद
वजन घटाने के चक्कर में सख्त डाइटिंग करना भी फूड नॉइज को कई गुना बढ़ा देता है। जब कोई व्यक्ति मील छोड़ता है, अत्यधिक कम कैलोरी लेता है या भोजन में जरूरी पोषक तत्वों की अनदेखी करता है, तो शरीर को पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिल पाती। नतीजतन, शरीर लगातार भूख के सिग्नल भेजने लगता है और दिमाग में हर वक्त भोजन की तस्वीरें तैरने लगती हैं। इसके अलावा, नींद पूरी न होना भी भूख और तृप्ति को नियंत्रित करने वाले आंतरिक हार्मोन्स के संतुलन को बिगाड़ देता है। अधूरी नींद के बाद शरीर तुरंत हाई कैलोरी और मीठी चीजों की मांग करने लगता है।
फूड नॉइज के चक्र से बाहर निकलने के आसान उपाय
इस अनचाही मानसिक उलझन को नियंत्रित करने के लिए अपनी रोजमर्रा की आदतों में कुछ बुनियादी बदलाव करना बेहद जरूरी है। सबसे पहले एक तय समय पर संतुलित आहार लेने का नियम बनाएं। अपनी थाली में प्रोटीन, फाइबर और जरूरी पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा शामिल करें, जिससे पेट लंबे समय तक भरा रहे और शरीर को भरपूर पोषण मिले। इसके साथ ही हर रात पूरी नींद लें ताकि हार्मोन्स संतुलित रहें। तनाव को भोजन के बजाय अन्य तरीकों से संभालें, जैसे खुली हवा में टहलना, गहरी सांस लेने का अभ्यास करना या अपनी पसंद की किसी रचनात्मक गतिविधि में वक्त बिताना। जब भी अचानक कुछ खाने की तीव्र इच्छा जगे, तो एक पल रुककर खुद से सच्चाई से पूछें कि क्या यह वाकई पेट की भूख है या फिर तनाव और बोरियत के कारण मन कुछ चबाना चाहता है।


















