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मौत से ठीक पहले सांसों का यह बदला पैटर्न क्या कहता है, जानिए शरीर के भीतर चलने वाला पूरा विज्ञानस्वास्थ्य
24 जून 2026, 12:17 pm (45 दिन पहले)· 4

मौत से ठीक पहले सांसों का यह बदला पैटर्न क्या कहता है, जानिए शरीर के भीतर चलने वाला पूरा विज्ञान

मृत्यु के अंतिम समय में चलने वाली 'उल्टी सांस' यानी डेथ रेटल आखिर क्यों होती है, शरीर में इस दौरान क्या बदलता है और क्या इसमें दर्द होता है, समझिए मेडिकल साइंस और इतिहास की नजर से.

किसी अपने को आखिरी पलों में देखना सबसे कठिन अनुभवों में से एक है, और अक्सर परिवार उस वक्त एक खास तरह की सांस देखता है जिसे आम बोलचाल में 'उल्टी सांस' कहा जाता है. यह वही पल होता है जब सांसें कभी बहुत तेज और गहरी चलने लगती हैं, फिर अचानक थम जाती हैं और गले से एक घरघराहट जैसी आवाज आने लगती है. मेडिकल साइंस और अध्यात्म, दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि यह प्रक्रिया आमतौर पर जीवन के बिल्कुल अंतिम चरण में दिखती है. इसी को अंतिम सांसें और डेथ रेटल भी कहा जाता है.

अक्सर देखा जाता है कि किसी बुजुर्ग के निधन से पहले उसकी सांसें इसी तरह बदलने लगती हैं. इसे शरीर का एक संकेत माना जाता है कि वह अब धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा समेट रहा है, ताकि जीवन-ऊर्जा या आत्मा शरीर से मुक्त हो सके. आइए विस्तार से समझते हैं कि असल में हो क्या रहा होता है.

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आखिर 'उल्टी सांस' कहते किसे हैं

सामान्य हालत में जब हम सांस लेते हैं तो छाती बाहर की ओर फूलती है और पेट भी थोड़ा बाहर आता है. लेकिन अंतिम समय में यही तरीका पूरी तरह उलट जाता है. व्यक्ति पहले बहुत गहरी और तेज सांस खींचता है, फिर सांस अचानक धीमी पड़ जाती है और कुछ पलों के लिए पूरी तरह रुक जाती है. यह ठहराव 10 से 30 सेकंड तक का हो सकता है.

इसके बाद एक बार फिर लंबी और गहरी सांस आती है, जिसके साथ गले या छाती से एक अलग किस्म की घरघराहट सुनाई दे सकती है. इसी रुक-रुक कर और बेतरतीब चलने वाले सांस के पैटर्न को आम भाषा में 'उल्टी सांस चलना' कहा जाता है.

शरीर के भीतर तीन बड़ी वजहें

जब कोई इंसान जीवन के बिल्कुल आखिरी मोड़ पर होता है, तो उसके अंग एक-एक कर काम करना बंद करने लगते हैं. इसके पीछे मुख्य रूप से तीन वैज्ञानिक कारण काम करते हैं.

1. दिमाग तक ऑक्सीजन की कमी: मौत के करीब पहुंचते ही दिल की धड़कन धीमी होने लगती है, जिससे दिमाग तक पहुंचने वाले खून और ऑक्सीजन की मात्रा बहुत घट जाती है. दिमाग का जो हिस्सा सांस को नियंत्रित करता है, वह कमजोर पड़ जाता है और सांस की लय संभाल नहीं पाता. नतीजा यह होता है कि सांसें अनियमित हो जाती हैं.

2. कार्बन डाइऑक्साइड का जमा होना: जब फेफड़े पूरी हवा बाहर नहीं निकाल पाते, तो शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड इकट्ठा होने लगती है. जैसे ही दिमाग को लगता है कि इसकी मात्रा हद से ज्यादा बढ़ गई है, वह शरीर को अचानक एक बहुत गहरी सांस लेने का आदेश देता है. यही वजह है कि व्यक्ति बीच-बीच में अचानक गहरी सांस खींचता दिखता है.

3. गले में तरल का इकट्ठा होना: अंतिम समय में निगलने की क्षमता खत्म हो जाती है, जिससे गले और लार ग्रंथियों में थोड़ा कफ या तरल जमा हो जाता है. जब बची-खुची हवा इस तरल से होकर गुजरती है तो एक खास तरह की आवाज पैदा होती है, जिसे 'डेथ रेटल' कहा जाता है.

क्या इसमें दर्द या तकलीफ होती है

परिवार के लिए यह दृश्य बेहद भावुक और विचलित करने वाला होता है, लेकिन चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक इस दौरान व्यक्ति को कोई दर्द या तकलीफ महसूस नहीं होती. इस अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते उसका अचेतन मन सक्रिय हो जाता है और वह एक गहरी शांति की स्थिति में चला जाता है.

दरअसल इस समय शरीर खुद ही कुछ ऐसे हार्मोन और एंडोर्फिन छोड़ता है जो दर्द को पूरी तरह खत्म कर देते हैं. यह प्रकृति का अपना तरीका है, जिससे वह शरीर को बिना किसी कष्ट के शांत कर देती है.

200 साल पुरानी खोज और चेन-स्टोक्स नाम

इस प्रक्रिया की वैज्ञानिक पहचान करीब 200 साल पहले हुई थी. साल 1818 में स्कॉटलैंड के सैन्य डॉक्टर जॉन चेन ने पहली बार एक ऐसे मरीज का ब्योरा दर्ज किया, जिसकी मौत से पहले के दिनों में सांसें बार-बार रुक रही थीं और फिर अचानक बहुत तेज हो जा रही थीं. इसके बाद 1854 में आयरलैंड के प्रोफेसर विलियम स्टोक्स ने दिल की गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों में यही पैटर्न देखा और उस पर शोध किया.

इन्हीं दोनों वैज्ञानिकों के सम्मान में इस स्थिति को 'चेन-स्टोक्स' ब्रीथिंग नाम दिया गया. दिलचस्प बात यह है कि आधुनिक वैज्ञानिकों ने पाया कि ईसा से करीब 2000 साल पहले महान प्राचीन चिकित्सक हिप्पोक्रेटस ने भी अपने लेखों में इसका जिक्र किया था. इस सवाल पर खूब शोध हुआ कि आखिर दिमाग ऐसा बर्ताव क्यों करता है, और निष्कर्ष यह निकला कि यह शरीर का एक 'ऑटोमैटिक कंट्रोल सिस्टम' है जो गड़बड़ा जाता है.

अब यह पैटर्न बना एक चेतावनी संकेत

आजकल वैज्ञानिक इस पैटर्न को 'डिजिटल बायोमार्कर' की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. हालिया क्लिनिकल अध्ययनों में सामने आया कि रात को सोते समय जो मरीज 'चेन-स्टोक्स' यानी उल्टी सांस के दौरों से गुजरते हैं, उनमें आने वाले दिनों में हार्ट अटैक का खतरा सामान्य से कई गुना ज्यादा होता है.

इन तमाम शोधों का सार यही है कि मृत्यु के समय यह प्रक्रिया शरीर के विदा होने का एक बेहद शांतिपूर्ण और प्राकृतिक तरीका है. लेकिन अगर सामान्य जीवन में ऐसा हो, तो यह एक गंभीर मेडिकल अलार्म है, जिसे मशीनों और दवाओं की मदद से ठीक किया जा सकता है.

सामान्य जिंदगी में भी दिख सकता है यह पैटर्न

मृत्यु के अलावा जीवन में कई गंभीर और आपातकालीन हालात ऐसे होते हैं, जब सांसें बिल्कुल इसी पैटर्न पर चलने लगती हैं. यह इस बात का इशारा होता है कि शरीर में ऑक्सीजन की भारी कमी हो गई है और दिमाग या फेफड़े गंभीर संकट में हैं.

गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्या के दौरान ऐसा हो सकता है. गंभीर स्ट्रोक या ब्रेन हैमरेज के समय भी यही स्थिति बन सकती है. कई बार सिर पर लगी गंभीर चोट और ब्रेन ट्यूमर में भी उल्टी सांस चलने लगती है.

सवाल-जवाब

उल्टी सांस या डेथ रेटल आखिर है क्या?
यह सांस लेने का एक बेतरतीब पैटर्न है जिसमें सांसें कभी बहुत गहरी और तेज, कभी धीमी और कुछ पलों के लिए पूरी तरह रुक जाती हैं, और गले से घरघराहट की आवाज आती है. यह आमतौर पर जीवन के अंतिम चरण में दिखता है.
सांस के रुकने का यह ठहराव कितनी देर का होता है?
अंतिम समय में सांस पूरी तरह रुकने वाला यह ठहराव 10 से 30 सेकंड तक का हो सकता है, जिसके बाद फिर एक गहरी और लंबी सांस आती है.
क्या इस दौरान व्यक्ति को दर्द होता है?
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इस दौरान व्यक्ति को कोई दर्द या तकलीफ नहीं होती. शरीर खुद ऐसे हार्मोन और एंडोर्फिन छोड़ता है जो दर्द को पूरी तरह खत्म कर देते हैं.
इसे चेन-स्टोक्स ब्रीथिंग क्यों कहते हैं?
साल 1818 में स्कॉटलैंड के डॉक्टर जॉन चेन और 1854 में आयरलैंड के प्रोफेसर विलियम स्टोक्स ने इस पैटर्न का अध्ययन किया था, इन्हीं दोनों के सम्मान में इसे चेन-स्टोक्स ब्रीथिंग नाम दिया गया.
इस प्रक्रिया के पीछे मुख्य वैज्ञानिक कारण क्या हैं?
मुख्य रूप से तीन कारण हैं, दिमाग तक ऑक्सीजन की कमी, शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड का जमा होना, और गले में तरल पदार्थ का इकट्ठा होना.
क्या यह पैटर्न सिर्फ मौत के समय ही दिखता है?
नहीं. गंभीर स्ट्रोक, ब्रेन हैमरेज, सिर की गंभीर चोट और ब्रेन ट्यूमर जैसी गंभीर स्थितियों में भी ऐसी सांसें चल सकती हैं, जो ऑक्सीजन की भारी कमी का संकेत होती हैं.
क्या नींद में यह सांस आना खतरनाक है?
हालिया अध्ययनों में पाया गया है कि रात को सोते समय जिन मरीजों में चेन-स्टोक्स यानी उल्टी सांस के दौरे आते हैं, उनमें आने वाले दिनों में हार्ट अटैक का खतरा सामान्य से कई गुना ज्यादा होता है.
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