भारत अपनी हवाई युद्ध क्षमताओं को केवल पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों तक सीमित रखने के मूड में नहीं है, बल्कि भविष्य की सैन्य चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए 6th Gen एयर कॉम्बैट तकनीक हासिल करने की दिशा में भी सक्रियता से कदम बढ़ा रहा है। स्वदेशी एडवांस्ड मिडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA प्रोजेक्ट के साथ-साथ भारत फ्रांस के नेतृत्व वाले फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम यानी FCAS कार्यक्रम में भागीदार बनने की संभावनाएं तलाश रहा है। संसद में पेश की गई सरकार की एक एक्शन टेकन रिपोर्ट से इस महत्वपूर्ण रणनीतिक पहल की पुष्टि हुई है। इसके बाद रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने रक्षा मंत्रालय से इस संबंध में एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, जिसमें छठी पीढ़ी के फाइटर जेट कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति, भारत की संभावित भूमिका, विकास और खरीद योजना के साथ-साथ इसकी प्रस्तावित समयसीमा का पूरा खाका पेश करने को कहा गया है।
संसदीय समिति की समीक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर
संसद में शुक्रवार को प्रस्तुत की गई एक्शन टेकन रिपोर्ट के बाद रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने भारत के 6th Gen फाइटर जेट विजन को लेकर अपनी उत्सुकता जताई है। समिति चाहती है कि रक्षा मंत्रालय अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के माध्यम से इस महत्वाकांक्षी परियोजना में भारत के प्रवेश का मार्ग स्पष्ट करे। समिति ने मंत्रालय से पूछा है कि इस परियोजना के तहत तकनीक साझा करने, संयुक्त अनुसंधान करने और भारतीय वायुसेना की भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए क्या रूपरेखा तैयार की जा रही है। इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि भारतीय नीति निर्माता भविष्य के हवाई युद्ध के लिए केवल अध्ययन या शुरुआती बातचीत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर बन रहे रक्षा गठबंधनों का हिस्सा बनने की दिशा में ठोस कदम बढ़ा रहे हैं।
क्यों अनिवार्य हो गया है 6th Gen फाइटर जेट विकसित करना?
वर्तमान समय में भारत का प्राथमिक ध्यान स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान AMCA के निर्माण पर केंद्रित है। हालांकि, दुनिया की शीर्ष सैन्य शक्तियां तेजी से छठी पीढ़ी की एयर कॉम्बैट टेक्नोलॉजी विकसित करने में जुट गई हैं। ऐसे माहौल में भारत के समक्ष चुनौती केवल एक नई उड़ान प्रणाली तैयार करने की नहीं है, बल्कि आधुनिक युद्ध के तेजी से बदलते स्वरूप के साथ सामंजस्य बिठाने की है। 6th Gen के फाइटर जेट्स पारंपरिक विमानों से बुनियादी रूप से अलग होंगे। इनमें केवल अधिक गति, बेहतर स्टील्थ क्षमताएं या घातक हथियार ही शामिल नहीं होंगे, बल्कि यह विमान एक एकीकृत युद्धक नेटवर्क के केंद्र के रूप में काम करेंगे।
छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वायत्त ड्रोन प्रणालियों, उन्नत सेंसर नेटवर्क, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और रियल टाइम डेटा शेयरिंग का अनूठा समावेश होगा। इसका अर्थ यह है कि भविष्य का लड़ाकू विमान कभी भी अकेले मिशन पर नहीं निकलेगा, बल्कि उसके साथ कई मानवरहित विमान और अन्य सैन्य प्लेटफॉर्म मिलकर एक टीम के रूप में काम करेंगे। इस प्रकार की अत्यधिक जटिल और आधुनिक तकनीक को विकसित करना बेहद खर्चीला और समय लेने वाला काम है। यही कारण है कि भारत के लिए FCAS जैसे अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम का हिस्सा बनना अत्यंत व्यावहारिक माना जा रहा है, जिससे कम समय में अत्याधुनिक तकनीकों तक सीधी पहुंच हासिल की जा सके।
फ्रांस के FCAS कार्यक्रम की ओर भारत का झुकाव
फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम यानी FCAS को सिर्फ एक नए लड़ाकू जेट के निर्माण तक सीमित नहीं देखा जा सकता। यह वास्तव में एक पूर्ण कॉम्बैट नेटवर्क और वायु युद्ध प्रणाली है, जिसमें अगली पीढ़ी के विमान, मानवरहित ड्रोन और अन्य नेटवर्क-संबद्ध सैन्य प्रणालियां एक साथ मिलकर काम करेंगी। इस दूरगामी परियोजना की शुरुआत फ्रांस और जर्मनी ने मिलकर की थी, जिसमें बाद में स्पेन भी एक प्रमुख साझेदार के रूप में शामिल हुआ। हालांकि, इस परियोजना के संगठनात्मक ढांचे, बौद्धिक संपदा अधिकारों और औद्योगिक हिस्सेदारी को लेकर यूरोपीय रक्षा कंपनियों के बीच मतभेद उभरकर सामने आए हैं।
यूरोपीय कंपनियों के बीच जारी इस खिंचाव ने भारत के लिए एक नया अवसर पैदा कर दिया है। फ्रांस के साथ भारत के पहले से ही गहरे रणनीतिक और रक्षा संबंध रहे हैं, जिसके कारण भारत के लिए FCAS के तहत फ्रांस के साथ सहयोग की संभावनाएं मजबूत हुई हैं। उल्लेखनीय है कि भारत और फ्रांस के बीच छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की तकनीक को लेकर पहले भी उच्च स्तरीय संवाद हो चुका है। हाल ही में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और फ्रांस की रक्षा मंत्री कैथरीन वॉत्रिन के बीच आयोजित बैठक में भी भविष्य के एयर कॉम्बैट प्लेटफॉर्म में संभावित भारत-फ्रांस सहयोग पर गहराई से चर्चा की गई थी।
6th Gen की वैश्विक होड़ और भारत की रणनीतिक स्थिति
रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में रेखांकित किया है कि वर्तमान में विश्व स्तर पर 6th Gen फाइटर जेट्स के विकास के लिए दो प्रमुख अंतरराष्ट्रीय गुट सक्रिय हैं। पहला अंतरराष्ट्रीय समूह ब्रिटेन, इटली और जापान की संयुक्त भागीदारी से चल रहा है, जिसे ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम के तहत देखा जाता है। वहीं, दूसरा प्रमुख समूह फ्रांस, जर्मनी और स्पेन के नेतृत्व वाला FCAS कार्यक्रम है। संसदीय समिति का यह स्पष्ट मानना है कि भारतीय वायुसेना को इन दोनों प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समूहों में से किसी एक के साथ औपचारिक रूप से जुड़ने का प्रयास करना चाहिए, ताकि भारत अगली पीढ़ी की एयरोस्पेस तकनीक की दौड़ में पीछे न रह जाए। समिति के इस सुझाव के बीच सरकार द्वारा दी गई हालिया जानकारी दर्शाती है कि भारत का तात्कालिक ध्यान फ्रांस के FCAS प्रोजेक्ट की तरफ केंद्रित है।
भारत की दोहरी रणनीति: AMCA और FCAS का संतुलन
6th Gen तकनीक के लिए FCAS कार्यक्रम में रुचि दिखाने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि भारत अपने स्वदेशी 5th Gen लड़ाकू विमान AMCA को प्राथमिकता देना बंद कर देगा। AMCA भारत की राष्ट्रीय रक्षा तैयारियों का केंद्र बिंदु बना रहेगा। संसदीय समिति की जानकारी के अनुसार, AMCA का डिजाइन पूरी तरह तैयार कर लिया गया है और अब इसके विकास एवं उत्पादन चरणों को लेकर उच्च स्तरीय बातचीत चल रही है। स्वदेशी लड़ाकू क्षमता को मजबूत करने की इस कड़ी में तेजस Mk-II भी अपने डिजाइन और विकास के चरण में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
इसके अतिरिक्त, भारतीय वायुसेना की वर्तमान लड़ाकू स्क्वाड्रन संख्या में आई कमी को दूर करने के लिए मल्टी रोल एयरक्राफ्ट यानी MRFA कार्यक्रम को भी समानांतर रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। इस प्रकार भारत एक बहुत ही संतुलित और दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है। एक तरफ जहां स्वदेशी परियोजनाओं जैसे AMCA और तेजस Mk-II के जरिए देश अपनी पांचवीं पीढ़ी की तकनीकी क्षमता मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ FCAS जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों के जरिए छठी पीढ़ी के एयर कॉम्बैट सिस्टम में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की तैयारी कर रहा है।
आधुनिक युद्ध का बदलता स्वरूप और नियर-स्पेस ऑपरेशंस
संसदीय स्थायी समिति ने आधुनिक सैन्य संघर्षों की प्रकृति में आ रहे एक बड़े क्रांतिकारी बदलाव की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। समिति ने स्पष्ट किया है कि एयर वॉरफेयर में तकनीक के इस्तेमाल का एक नया दौर शुरू हो चुका है, जिसके मद्देनजर भारतीय वायुसेना की क्षमताओं का आधुनिकीकरण करना अत्यंत आवश्यक है। इस संदर्भ में समिति ने Near-Space Operations यानी पृथ्वी के वायुमंडल के ऊपरी हिस्से में संचालित होने वाले अभियानों पर विशेष ध्यान देने और इसके लिए पर्याप्त वित्तीय व तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराने की सिफारिश की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत की भावी हवाई सुरक्षा रणनीति केवल पारंपरिक विमानों की तैनाती तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसमें अंतरिक्ष के नजदीकी क्षेत्रों का उपयोग, व्यापक सेंसर नेटवर्क और स्वचालित युद्धक प्रणालियों का व्यापक समावेश होगा।


















