देशभर में कैंसर के मामले लगातार पैर पसार रहे हैं, लेकिन पुरुषों से जुड़े प्रोस्टेट कैंसर को लेकर जागरूकता की स्थिति बेहद निराशाजनक बनी हुई है। उम्रदराज पुरुषों में यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है, फिर भी बड़ी आबादी को यह तक मालूम नहीं है कि उन्होंने कभी इसकी जांच कराई भी है या नहीं। हील फाउंडेशन और साइजेन ग्लोबल इनसाइट्स एंड कंसल्टिंग द्वारा किए गए एक व्यापक राष्ट्रीय अध्ययन में यह बात सामने आई है कि स्क्रीनिंग और समय पर पहचान के अभाव में यह बीमारी लगातार गंभीर रूप लेती जा रही है।
जांच स्थिति को लेकर अनिश्चितता और उपेक्षा
इस अध्ययन में दिल्ली एनसीआर, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और महाराष्ट्र के 45 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 1,036 पुरुषों को शामिल किया गया था। इसमें हिस्सा लेने वाले 84 प्रतिशत पुरुष या तो ऐसे थे जिनकी कभी जांच नहीं हुई, या वे अपनी जांच स्थिति को लेकर पूरी तरह अनिश्चित थे, अथवा उन्हें लगता था कि जांच की कोई आवश्यकता ही नहीं है। अध्ययन में शामिल 10 में से 6 पुरुषों (लगभग 60.8 प्रतिशत) को यह भी नहीं पता था कि उनके जीवन में कभी प्रोस्टेट स्वास्थ्य का कोई परीक्षण हुआ है या नहीं। केवल छह में से लगभग एक पुरुष ने ही यह पुष्टि की कि उसने कभी स्क्रीनिंग कराई है।
यह स्थिति तब है जब सर्वेक्षण में शामिल लगभग दो-तिहाई पुरुषों ने बताया कि वे हर साल सामान्य स्वास्थ्य जांच अवश्य करवाते हैं। नियमित मेडिकल चेकअप कराने के बावजूद प्रोस्टेट स्वास्थ्य पर बात न होना यह दर्शाता है कि प्राथमिक जांच के दौरान यह महत्वपूर्ण विषय छूट जाता है। जब तक स्क्रीनिंग की दरें नहीं सुधरेंगी, तब तक समय रहते इस कैंसर की पहचान और कारगर इलाज सुनिश्चित करना असंभव बना रहेगा।
जोखिम कारकों और सही उम्र की समझ में भारी कमी
अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि 68.9 प्रतिशत पुरुष प्रोस्टेट कैंसर से जुड़े किसी भी जोखिम कारक का नाम तक नहीं बता सके। केवल 13.2 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने यह पहचाना कि पारिवारिक इतिहास या जेनेटिक्स इस बीमारी का एक प्रमुख जोखिम कारक हो सकता है। अधिकांश पुरुषों को इस बात की तनिक भी जानकारी नहीं है कि परिवार में यदि किसी को यह बीमारी रही हो, तो उन्हें अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता होती है।
इसके अतिरिक्त, लगभग 75 प्रतिशत प्रतिभागियों का यह मानना था कि प्रोस्टेट कैंसर की नियमित निगरानी केवल 50 वर्ष की आयु या उसके बाद ही शुरू होनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि 45 वर्ष की आयु पार करते ही पुरुषों को अपने व्यक्तिगत जोखिम का आकलन शुरू कर देना चाहिए। जोखिम कारकों के प्रति यह अनभिज्ञता मरीजों को अंतिम चरण में अस्पताल पहुंचाती है, जिससे समय पर बचाव के अवसर हाथ से निकल जाते हैं।
डॉ देवव्रत आर्या की राय और विशेषज्ञ सलाह
मैक्स हेल्थकेयर, दिल्ली में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के वाइस प्रेसिडेंट डॉ देवव्रत आर्या ने इन नतीजों पर गंभीर चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा, "जोखिम, जांच और डॉक्टर से कब बात करनी चाहिए, इसके बारे में जागरूकता सूचित, व्यक्तिगत स्वास्थ्य देखभाल संबंधी निर्णयों की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहला कदम है।"
डॉ देवव्रत आर्या का कहना है कि जब 10 में से लगभग 7 पुरुष एक भी खतरे की पहचान नहीं कर पाते और 10 में से 6 को अपनी जांच स्थिति का भान नहीं होता, तो यह साफ है कि 45 साल से अधिक उम्र के पुरुषों के लिए प्रोस्टेट स्वास्थ्य को दैनिक चिकित्सकीय बातचीत का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। उन्होंने जोर दिया कि लोगों को जोखिम और जांच की प्रक्रिया समझाने के लिए अभी बड़े पैमाने पर काम करने की आवश्यकता है, ताकि व्यक्तिगत स्वास्थ्य फैसले सही समय पर लिए जा सकें।
पीएसए रक्त जांच और विशेषज्ञ चयन पर उलझन
प्रोस्टेट कैंसर की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाले पीएसए (प्रोस्टेट-विशिष्ट एंटीजन) रक्त परीक्षण को लेकर भी बेहद कम समझ देखने को मिली। अध्ययन में शामिल पुरुषों में से केवल 31 प्रतिशत ने ही पीएसए टेस्ट के बारे में सुना था। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि सिर्फ 14 प्रतिशत पुरुषों ने कभी स्वेच्छा से डॉक्टर से इस विशेष रक्त परीक्षण की मांग की थी।
चिकित्सकों पर भरोसा होने के बावजूद सही विशेषज्ञ तक पहुंचने में भी असमंजस नजर आया। करीब 67 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे किसी भी सलाह के लिए डॉक्टरों पर सर्वाधिक भरोसा करते हैं, लेकिन केवल 36 प्रतिशत पुरुष ही यह सही पहचान कर सके कि प्रोस्टेट कैंसर के निदान और उपचार के लिए यूरोलॉजिस्ट (मूत्र रोग विशेषज्ञ) उपयुक्त विशेषज्ञ होते हैं। दूसरी ओर, 44 प्रतिशत प्रतिभागियों ने यह इच्छा जताई कि वे कोई भी उपचार शुरू करने से पहले दूसरी चिकित्सीय राय (सेकंड ओपिनियन) लेना चाहेंगे, जिससे साफ होता है कि वे सही निर्णय तो लेना चाहते हैं, पर इलाज की पूरी प्रक्रिया की समझ उनमें अधूरी है।
संकोच की दीवार और डिजिटल माध्यमों पर निर्भरता
अध्ययन से यह भी स्पष्ट हुआ कि हमारे समाज में प्रोस्टेट स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना अब भी पुरुषों के लिए एक बड़ी झिझक का विषय है। राष्ट्रीय स्तर पर 59.5 प्रतिशत पुरुषों ने स्वीकार किया कि वे डॉक्टर के साथ प्रोस्टेट स्क्रीनिंग या इसके उपचार के बारे में बात करने में असहज महसूस करते हैं। केवल 18 प्रतिशत पुरुष ऐसे थे जिन्होंने कहा कि वे खुद आगे बढ़कर डॉक्टर से इस विषय पर चर्चा शुरू कर सकते हैं।
इस झिझक के बीच लोग जानकारी जुटाने के लिए इंटरनेट का सहारा ले रहे हैं। अध्ययन के अनुसार 84 प्रतिशत पुरुष स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारियों के लिए ऑनलाइन खोज करते हैं। वहीं 48 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि परिवार या दोस्तों के साथ हुई बातचीत ने प्रोस्टेट कैंसर के बारे में उनकी पहली समझ को प्रभावित किया। हालांकि केवल ऑनलाइन जानकारी या घरेलू चर्चाएं चिकित्सकीय जांच का विकल्प नहीं बन सकतीं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पुरुष संकोच छोड़कर अपने डॉक्टरों से सीधे सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक इस बीमारी की रोकथाम और शुरुआती पहचान एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।



















