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पेड़ों के सहारे ताकत खींचती है गिलोय, नीम के संग मिलकर बनती है अचूक औषधिस्वास्थ्य
19 सित॰ 2026, 10:42 pm (54 मिनट पहले)· 0

पेड़ों के सहारे ताकत खींचती है गिलोय, नीम के संग मिलकर बनती है अचूक औषधि

नीम के पेड़ पर पनपने वाली गिलोय दोनों के औषधीय गुणों को समेटकर रोग प्रतिरोधक क्षमता को कई गुना मजबूत बनाती है। विशेषज्ञ के अनुसार इसका काढ़ा और अर्क मौसमी संक्रमणों के साथ डेंगू, मलेरिया और पुराने बुखार से लड़ने में अत्यधिक असरदार है।

प्राकृतिक वनस्पतियों में गिलोय को विशेष स्थान हासिल है, खासकर तब जब यह किसी गुणकारी पेड़ के सहारे फलती-फूलती है। जंगलों और ग्रामीण इलाकों में बहुतायत से मिलने वाले नीम के पेड़ों पर अक्सर गिलोय की हरी लताएं फैली दिखाई देती हैं। इस स्वाभाविक जुड़ाव की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि गिलोय जिस पेड़ का सहारा लेती है, उसके औषधीय तत्वों को भी अपने भीतर पूरी तरह खींच लेती है। जब यह लता कड़वे नीम के संपर्क में आती है, तो इसके स्वास्थ्य लाभ साधारण पौधों की तुलना में कई गुना बढ़ जाते हैं।

सदाबहार बेल और इसके पारंपरिक नाम

औषधीय पौधों पर पिछले लगभग एक दशक से लगातार शोध और कार्य कर रहे विशेषज्ञ रविकांत पांडे का कहना है कि गिलोय एक बेहद लचीली और कभी न सूखने वाली लता है। जीवन शक्ति से भरपूर होने के कारण इसे हिंदी और आयुर्वेद की परंपरा में गुडुची के नाम से भी पुकारा जाता है। इसके अलावा इसके अमर स्वभाव और आरोग्य प्रदान करने की क्षमता के चलते इसे अमृतावली अथवा अमृता की संज्ञा भी दी गई है। यह जड़ी बूटी मानव शरीर की रक्षा प्रणाली को प्राकृतिक तरीके से सक्रिय और मजबूत करने के लिए पहचानी जाती है।

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पेड़ के गुणों को आत्मसात करने की अनोखी क्षमता

इस वनस्पति की सबसे अनूठी जैविक खूबी यह है कि यह जिस भी औषधीय वृक्ष पर चढ़ती है, उसके लाभकारी गुणों को अपने भीतर समाहित कर लेती है। नीम के विशाल पेड़ पर चढ़ने के बाद गिलोय केवल एक सामान्य लता नहीं रह जाती, बल्कि उसमें नीम के सभी कुदरती गुण भी घुलमिल जाते हैं। दोनों पौधों के इस आपसी तालमेल के कारण तैयार होने वाली बेल का महत्व पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में सबसे ऊपर माना गया है।

संक्रमण, मौसमी रोग और काढ़े के फायदे

नीम पर चढ़ी इस विशिष्ट गिलोय के तनों का काढ़ा बनाकर पीने से इंसानी शरीर को अनगिनत फायदे पहुंचते हैं। यह पेय शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता में तेजी से इजाफा करता है, जिससे मौसमी बदलावों के दौरान होने वाले सामान्य संक्रमणों से बचाव होता है। इसके अलावा, यदि नीम के सानिध्य में तैयार गिलोय का ताजा अर्क निकालकर नियमपूर्वक पिया जाए, तो डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया तथा लंबे समय से बने रहने वाले पुराने वायरल बुखार में प्रमाणित राहत मिलती है।

पोषक तत्वों का आदान-प्रदान और सुरक्षात्मक गुण

वैज्ञानिक दृष्टिकोण साझा करते हुए रविकांत पांडे ने बताया कि विभिन्न अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि गिलोय और नीम आपस में कई जरूरी पोषक तत्वों का आदान-प्रदान करते हैं। इस सहजीवी प्रक्रिया से तैयार होने वाले तत्व न केवल शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली को नई ताकत देते हैं, बल्कि प्राकृतिक रूप से एंटीफंगल और एंटी बैक्टीरियल ढाल की तरह भी कार्य करते हैं, जिससे शरीर कई प्रकार के रोगाणुओं से सुरक्षित रहता है।

सवाल-जवाब

गिलोय को अमृता या गुडुची क्यों कहा जाता है?
यह लता अत्यधिक जीवन शक्ति से भरी होती है और कभी सूखती नहीं है। इसके इसी अमर स्वभाव और रोग निवारक गुणों के कारण इसे अमृता और गुडुची कहा जाता है।
नीम के पेड़ पर चढ़ी गिलोय को सबसे बेहतर क्यों माना जाता है?
गिलोय जिस पेड़ पर चढ़ती है, उसके औषधीय गुणों को सोख लेती है। नीम पर चढ़ने से इसमें नीम के सभी कुदरती और रोगाणुरोधी गुण भी शामिल हो जाते हैं।
इसका काढ़ा या अर्क किन बीमारियों में प्रमाणित लाभ देता है?
यह पेय डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, लंबे समय से बने पुराने वायरल बुखार और सामान्य मौसमी संक्रमणों में विशेष रूप से फायदेमंद है।
वैज्ञानिक अध्ययनों में गिलोय और नीम के संबंध पर क्या पाया गया?
अध्ययनों के अनुसार दोनों पौधे आपस में कई पोषक तत्वों का आदान-प्रदान करते हैं, जिससे गिलोय में एंटीफंगल और एंटीबैक्टीरियल गुण विकसित होते हैं।
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