छोटे बच्चों में शौच से जुड़े नियम और आदतें बड़ों की तरह तय नहीं होतीं, जिसकी वजह से वे अक्सर पेट साफ करने की जरूरत को नजरअंदाज कर देते हैं। जब बच्चे वेग आने के बावजूद मल को रोककर रखते हैं, तो धीरे-धीरे यह आदत एक गंभीर शारीरिक परेशानी में बदल जाती है। पेट के भीतर मल जमा रहने से वह कड़ा होता जाता है और फिर निकासी के दौरान तेज दर्द महसूस होता है। दर्द के इसी खौफ से बच्चे दोबारा टॉयलेट जाने से कतराने लगते हैं और एक बेहद कष्टदायक चक्रव्यूह में उलझ जाते हैं। माता-पिता के लिए इस पूरे सिलसिले को समझना और समय रहते सही कदम उठाना बेहद जरूरी है ताकि बच्चे को पुरानी कब्ज का सामना न करना पड़े।
स्कूल का संकोच और स्क्रीन की लत बनती है मुख्य वजह
फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. अर्जुन मारिया के अनुसार, बच्चों की दिनचर्या में पेट साफ करने का कोई तयशुदा वक्त नहीं होता। अक्सर बच्चे सुबह बिना पेट साफ किए ही स्कूल निकल जाते हैं। जब कक्षा के दौरान उन्हें हाजत महसूस होती है, तो वे झिझक या डर के मारे शिक्षक से अनुमति नहीं मांगते। उन्हें लगता है कि शिक्षक डांट देंगे या जाने से मना कर देंगे। यही हाल प्ले स्कूल में जाने वाले छोटे नौनिहालों का भी होता है, जो माहौल से अनजान होने के कारण मल रोक लेते हैं। जब वे छुट्टी के बाद घर लौटते हैं, तो अचानक पेट पर भारी दबाव बनता है और वे हड़बड़ाहट में टॉयलेट की तरफ दौड़ते हैं। कई बार घंटों रोके रखने की वजह से मल सख्त हो चुका होता है, जिससे निकासी में असहनीय पीड़ा होती है।
इसके अलावा डिजिटल गैजेट्स और टीवी का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भी इस आदत को बढ़ावा दे रहा है। मोबाइल पर पसंदीदा कार्टून या वीडियो देखने में मशगूल बच्चे इस डर से वॉशरूम नहीं जाते कि उनका कार्यक्रम छूट जाएगा। पहले स्कूल में समय न मिलने या डर की वजह से रोका और फिर घर पर स्क्रीन के चक्कर में टाल दिया, यह दोहरा रवैया पेट की आंतों में मल को पत्थर जैसा बना देता है।
नाभि के पास दर्द और टॉयलेट में लंबा वक्त कब्ज की निशानी
अभिभावक कुछ खास लक्षणों पर ध्यान देकर यह पकड़ सकते हैं कि बच्चा कब्ज से जूझ रहा है या मल दबा रहा है। डॉ. अर्जुन मारिया के मुताबिक, अगर बच्चा नाभि के आसपास हाथ रखकर पेट दर्द की शिकायत करे और शौच के तुरंत बाद उसका दर्द गायब हो जाए, तो यह स्पष्ट तौर पर कब्ज की ओर इशारा करता है। इसके अलावा यदि बच्चा एक से दो दिनों तक पेट साफ नहीं करता, अथवा वॉशरूम में आधा घंटा या एक घंटा बैठा रहता है और फिर भी बाहर नहीं निकलता, तो समझ लेना चाहिए कि उसकी आंतों में मल जमा है। मलत्याग के दौरान अत्यधिक जोर लगाना, कड़ा और सूखा मल आना अथवा मल के साथ खून की लकीरें दिखाई देना गंभीर कब्ज के पुख्ता संकेत हैं।
सख्त मल से छिल जाता है रास्ता, डर से और रोकते हैं बच्चे
जब मल बहुत अधिक कड़ा हो जाता है, तो बाहर निकलते समय वह गुदा मार्ग की नाजुक त्वचा को छील देता है। इस चीरे या खिंचाव के चलते बच्चों को भयानक जलन और चुभन होती है, जिससे वे रोने-चीखने लगते हैं। इसी दर्द से घबराकर वे आगे भी मल को अंदर दबाए रखने की कोशिश करते हैं। इस दर्दनाक स्थिति को तोड़ने के लिए माता-पिता को बच्चे की दिनचर्या नए सिरे से तय करनी होगी। सुबह स्कूल के तय समय से कम से कम एक घंटा पहले बच्चे को जगाने की आदत डालें। बिस्तर छोड़ते ही बच्चे को एक से दो गिलास सादा पानी पिलाएं। इसके बाद उसे दस मिनट या आधा घंटा दौड़ाएं ताकि पेट की आंतों में हलचल पैदा हो और प्राकृतिक दबाव बने, फिर उसे टॉयलेट सीट पर बैठाएं।
यही नियम दोपहर के खाने यानी लंच के बाद भी दोहराना चाहिए। चाहे बच्चे को हाजत महसूस हो रही हो या नहीं, उसे कम से कम दस मिनट के लिए टॉयलेट सीट पर जरूर बैठाएं। इसी तरह रात के भोजन के पश्चात भी दस मिनट के लिए सीट पर बैठने का नियम बनाएं। यह नियमित अभ्यास आंतों की जैविक घड़ी को दुरुस्त करने में मदद करता है।
मैदा और जंक फूड पर पूरी रोक, पानी और फल बढ़ाएं
आहार में गड़बड़ी कब्ज की सबसे बड़ी जड़ है। डॉ. अर्जुन मारिया सलाह देते हैं कि बच्चों की थाली से मैदा और तेज मिर्च-मसाले पूरी तरह हटा देने चाहिए। पिज्जा, चाऊमीन, बर्गर, पास्ता, कुरकुरे और चॉकलेट जैसी चीजों के सेवन पर पूरी तरह पाबंदी लगाना जरूरी है। इनके स्थान पर प्राकृतिक फाइबर से भरपूर चीजें दें, जिससे पेट में मल का सही भार और आयतन बन सके। रोजमर्रा के भोजन में सेब, संतरा, गाजर और खीरा प्रचुर मात्रा में शामिल करें। इसके साथ ही तरल पदार्थों की मात्रा बढ़ाएं और दिनभर में कम से कम पांच से छह गिलास पानी अवश्य पिलाएं।
शारीरिक निष्क्रियता भी आंतों को सुस्त बनाती है। बच्चे को दिन में कम से कम एक घंटा सक्रिय खेलकूद में व्यस्त रखें। वह पार्क में दौड़ लगा सकता है, मैदान में खेल सकता है, साइकिलिंग कर सकता है या फिर रस्सी कूद यानी स्किपिंग कर सकता है। जब पैर और शरीर सक्रिय रहते हैं, तो आंतों की गतिशीलता स्वतः तेज हो जाती है। यदि जीवनशैली और खानपान के इन बदलावों के बाद भी राहत न मिले, तो बाल रोग विशेषज्ञ दवाइयों का सहारा लेते हैं। ये दवाएं मल को मुलायम बनाती हैं और आंतों की चाल को तेज करती हैं ताकि बच्चा बिना किसी पीड़ा के पेट साफ कर सके।
लगातार दर्द और खून आने पर तुरंत पहुंचे अस्पताल
घरेलू तौर-तरीके हर स्थिति में कारगर नहीं होते। डॉ. अर्जुन मारिया के अनुसार, यदि ऊपर बताए गए खानपान, व्यायाम और टॉयलेट रूटीन से बच्चे की स्थिति में सुधार न आए, तो बिना देर किए उसे अस्पताल ले जाना चाहिए। बार-बार पेट दर्द होना और शौच के समय चीखना इस बात का प्रमाण है कि बच्चा दर्द के चक्रव्यूह में उलझ चुका है। मल रोके रखने से गुदा मार्ग फैलता और चौड़ा होता जाता है, जिससे वहां और ज्यादा मल इकट्ठा होने लगता है। ऐसे में चिकित्सीय जांच और विशेष दवाओं के बिना आंतों का सामान्य होना नामुमकिन हो जाता है। इसके अलावा यदि अत्यधिक सख्त मल की वजह से रास्ता अंदर से छिल गया हो, मस्सा या चीरा बन चुका हो, तो डॉक्टर को तुरंत दिखाकर उपचार कराना बेहद अनिवार्य है।





















