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टाटा मेमोरियल की पपीता पत्ता रिसर्च विवादों में, जर्नल ने शुरू की जांचस्वास्थ्य
1 घंटे पहले· 2

टाटा मेमोरियल की पपीता पत्ता रिसर्च विवादों में, जर्नल ने शुरू की जांच

टाटा मेमोरियल अस्पताल की पपीते के पत्तों वाली रिसर्च पर आंकड़ों में हेरफेर के सवाल उठे हैं, जिसके बाद जिस मेडिकल जर्नल में यह पेपर छपा था, उसने खुद जांच शुरू कर दी है.

मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल के डॉक्टरों की एक रिसर्च इन दिनों मेडिकल जगत में बहस का विषय बनी हुई है. इस अध्ययन में दावा किया गया था कि पपीते के पत्तों के अर्क से बनी गोलियां कीमोथेरेपी करा रहे मरीजों में गिरते प्लेटलेट्स को दोबारा बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती हैं, लेकिन प्रकाशन के कुछ समय बाद ही इसके आंकड़ों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि जिस अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में यह पेपर छपा था, उसने खुद इसकी जांच शुरू कर दी है और पेपर पर एक चेतावनी नोटिस जोड़ दिया है.

रिसर्च में आखिर क्या दावा किया गया था?

कीमोथेरेपी कैंसर के इलाज का एक अहम हिस्सा है, लेकिन इसके दौरान अक्सर मरीजों के प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से गिर जाती है. प्लेटलेट्स कम होने से खून का थक्का जमने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और कई बार डॉक्टरों को कीमोथेरेपी की खुराक कम करनी पड़ती है या इलाज का पूरा शेड्यूल ही बदलना पड़ता है. टाटा मेमोरियल अस्पताल के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में ऐसे ही मरीजों को शामिल किया था, जो कीमोथेरेपी ले रहे थे और जिनके प्लेटलेट्स गिर रहे थे. शोधकर्ताओं का दावा था कि पपीते के पत्तों के अर्क से तैयार गोलियां इन मरीजों में प्लेटलेट्स की संख्या बढ़ाने में कारगर साबित हुईं. टीम ने यह भी कहा कि अगर आगे चलकर और अध्ययनों में भी यही नतीजे दोहराए जाते हैं, तो यह इलाज मरीजों के लिए एक सस्ता और आसानी से उपलब्ध विकल्प बन सकता है, क्योंकि पपीते के पत्तों का अर्क महंगी दवाओं के मुकाबले काफी किफायती माना जाता है.

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कोच्चि के डॉक्टर ने आंकड़ों पर क्यों उठाए सवाल?

यह रिसर्च सुर्खियों में आने के बाद कोच्चि के लीवर रोग विशेषज्ञ डॉ. साइरियक एबी फिलिप्स ने अध्ययन के आंकड़ों की बारीकी से समीक्षा की. उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरीके से मरीजों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, उससे नतीजे असल स्थिति से कहीं बेहतर दिखाई देने लगे. डॉ. फिलिप्स के मुताबिक, कुछ ऐसे मरीजों को अंतिम गणना से हटा दिया गया जिनमें प्लेटलेट्स को लेकर अपेक्षित सुधार नहीं दिखा था, जबकि जिन मरीजों की हालत में सुधार आया था, उन्हें आंकड़ों में बनाए रखा गया. उनका कहना है कि इस तरह की छंटाई से इलाज की सफलता दर वास्तविकता से कहीं ज्यादा और आकर्षक दिखने लगी, जबकि हकीकत में तस्वीर उतनी सकारात्मक नहीं रही होगी.

प्लेसीबो ग्रुप और नतीजे मापने के तरीके पर भी विवाद

आलोचना सिर्फ दवा लेने वाले मरीजों के आंकड़ों तक सीमित नहीं रही. यह भी सामने आया कि तुलना के लिए तैयार किए गए प्लेसीबो ग्रुप, यानी जिन मरीजों को असली दवा की बजाय एक बेअसर गोली दी गई थी, उनमें से भी कुछ ऐसे मरीजों को अंतिम विश्लेषण से बाहर रखा गया जिनकी हालत में सुधार देखा गया था. आलोचकों का कहना है कि अगर दोनों ही समूहों, यानी दवा लेने वालों और प्लेसीबो लेने वालों, दोनों के आंकड़ों में इस तरह की काट-छांट की जाए, तो पूरे अध्ययन के नतीजों पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है. इसके अलावा, क्लिनिकल ट्रायल शुरू करने से पहले ही यह तय कर लिया जाता है कि नतीजे किस दिन या किस पैमाने पर मापे जाएंगे, जिसे प्राइमरी एंडपॉइंट कहा जाता है. इस अध्ययन को लेकर यह भी आरोप लगा कि प्राथमिक मूल्यांकन का समय बीच में बदल दिया गया, जबकि वैज्ञानिक प्रक्रिया के मुताबिक ऐसा फैसला अध्ययन शुरू होने से पहले ही तय हो जाना चाहिए. इसी वजह से रिसर्च के तरीके पर भी सवाल खड़े हो गए हैं.

टाटा मेमोरियल के शोधकर्ताओं ने क्या सफाई दी?

अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. विकास ओस्तवाल ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मेडिकल जर्नल ने उनसे कुछ सवाल पूछे हैं और उनकी टीम इन सभी बिंदुओं पर विस्तार से जवाब तैयार कर रही है. उनके मुताबिक, प्रकाशन के बाद इस तरह के सवाल पूछा जाना वैज्ञानिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है और इससे घबराने की जरूरत नहीं है. डॉ. ओस्तवाल ने यह भी बताया कि उनके अनुभव में जिन मरीजों को यह दवा दी गई, उनमें कुछ ही दिनों के भीतर प्लेटलेट्स बढ़ते हुए नजर आए. हालांकि उन्होंने साफ कर दिया कि जब तक जर्नल की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक इंतजार करना ही सही रास्ता है.

दवा कंपनियों की फंडिंग को लेकर भी चर्चा

इस रिसर्च को लेकर एक और पहलू पर भी बहस छिड़ी है, वह है इसकी फंडिंग. अध्ययन को कुछ दवा कंपनियों से आर्थिक मदद मिली थी और ट्रायल में इस्तेमाल की गई गोलियां भी एक दवा कंपनी ने ही उपलब्ध कराई थीं. दिलचस्प बात यह है कि जिन कंपनियों ने इस रिसर्च को आर्थिक सहायता दी, उनमें से एक कंपनी बाजार में पहले से ही इसी तरह की दवा बेच रही है, यानी अगर रिसर्च के नतीजे सही साबित होते हैं तो उस कंपनी को सीधा फायदा मिल सकता है. हालांकि शोधकर्ताओं की टीम का कहना है कि अध्ययन के दौरान उनकी वैज्ञानिक प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र रही और उन्हें इस व्यावसायिक पहलू की कोई जानकारी नहीं थी.

मेडिकल जर्नल ने अब तक क्या कदम उठाए?

जिस अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में यह रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ था, उसने फिलहाल इस पेपर के साथ एक सार्वजनिक नोटिस जोड़ दिया है. जर्नल का कहना है कि अध्ययन के आंकड़ों की दोबारा और बारीकी से समीक्षा की जा रही है, और जब तक यह जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक पाठकों को इसके नतीजों को पूरी सावधानी के साथ ही देखना चाहिए. वैज्ञानिक समुदाय में इसे पारदर्शिता बनाए रखने की एक जरूरी और सामान्य प्रक्रिया माना जा रहा है, जिससे भविष्य में इस तरह के अध्ययनों पर भरोसा बना रहे.

आम मरीजों और परिवारों के लिए इसका मतलब क्या है?

इस पूरे विवाद का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पपीते के पत्तों का अर्क पूरी तरह असरदार है या पूरी तरह बेकार साबित हो चुका है. असल बात सिर्फ इतनी है कि इस खास रिसर्च के नतीजों की एक बार फिर बारीकी से जांच की जा रही है. जब तक यह वैज्ञानिक समीक्षा पूरी नहीं होती और दूसरे स्वतंत्र अध्ययन भी इसी तरह के नतीजे बार-बार नहीं दिखाते, तब तक इस दावे को अंतिम सच्चाई मानकर चलना जल्दबाजी होगी. इसलिए कैंसर के इलाज या प्लेटलेट्स से जुड़ी किसी भी समस्या में खुद से कोई फैसला लेने की बजाय हमेशा डॉक्टर की सलाह पर ही भरोसा करना सबसे सुरक्षित तरीका है.

सवाल-जवाब

टाटा मेमोरियल की इस रिसर्च में क्या दावा किया गया था?
दावा किया गया था कि पपीते के पत्तों के अर्क से बनी गोलियां कीमोथेरेपी करा रहे मरीजों में गिरते प्लेटलेट्स को बढ़ाने में मदद कर सकती हैं.
इस रिसर्च पर सवाल किसने उठाए?
कोच्चि के लीवर विशेषज्ञ डॉ. साइरियक एबी फिलिप्स ने अध्ययन के आंकड़ों की समीक्षा करने के बाद सवाल उठाए.
डॉ. फिलिप्स का मुख्य आरोप क्या है?
उनका आरोप है कि जिन मरीजों में सुधार नहीं हुआ उन्हें आंकड़ों से बाहर रखा गया, जबकि सुधार वाले मरीजों को शामिल रखा गया, जिससे सफलता दर बढ़ी-चढ़ी दिखी.
प्लेसीबो ग्रुप को लेकर क्या विवाद है?
प्लेसीबो ग्रुप में भी सुधार दिखाने वाले कुछ मरीजों को अंतिम विश्लेषण से बाहर रखा गया, जिससे नतीजों की तुलना पर सवाल उठे हैं.
टाटा मेमोरियल के शोधकर्ताओं ने क्या जवाब दिया?
प्रमुख शोधकर्ता डॉ. विकास ओस्तवाल ने कहा कि जर्नल के सवालों का जवाब दिया जा रहा है और यह जांच वैज्ञानिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है.
रिसर्च की फंडिंग को लेकर क्या चिंता है?
अध्ययन को दवा कंपनियों से आर्थिक मदद मिली थी और फंड देने वाली एक कंपनी बाजार में मिलती-जुलती दवा पहले से बेचती है.
क्या मेडिकल जर्नल ने कोई कार्रवाई की है?
जर्नल ने पेपर पर एक चेतावनी नोटिस जोड़ा है और आंकड़ों की दोबारा समीक्षा शुरू कर दी है.
क्या मरीजों को अभी पपीते के पत्तों का अर्क लेना चाहिए?
विशेषज्ञों की सलाह है कि जांच पूरी होने तक डॉक्टर की सलाह के बिना ऐसा कोई फैसला न लें.
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