यूनाइटेड किंगडम के केंद्रीय बैंक में मौद्रिक नीति तय करने वाली समिति की सदस्य कैथरीन मान ने बृहस्पतिवार को दो टूक कहा कि बैंक ऑफ इंग्लैंड को अपनी मुख्य बैंक दर में बढ़ोतरी करने की सख्त जरूरत है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि वित्तीय बाजार में बढ़ते जोखिम प्रीमियम को वास्तविक मौद्रिक नीतिगत फैसलों का विकल्प मान लेना गलत रणनीति है। उनके मुताबिक जब वित्तीय स्थितियां केवल महंगाई के बढ़ते जोखिम और भविष्य की नीतिगत अनिश्चितता की वजह से सख्त होती हैं, तो उससे केंद्रीय बैंक को कोई राहत या संतुष्टि नहीं मिलनी चाहिए। नीति निर्माताओं को बाजार के उतार-चढ़ाव के सहारे बैठने के बजाय खुद सीधे कदम उठाकर दरें बढ़ानी होंगी ताकि मुद्रास्फीति पर वास्तविक नियंत्रण पाया जा सके।
कैथरीन मान का यह रुख पारंपरिक रुख से कहीं अधिक सख्त और आक्रामक माना जा रहा है। नीतिगत भाषणों के विश्लेषणात्मक पैमाने पर उनके इस संबोधन को 10 में से 9.4 अंक दिए गए, जो उनके सामान्य ऐतिहासिक औसत 8.1 अंक से काफी ऊंचा है। यह उछाल साफ संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक के भीतर दरें बढ़ाने को लेकर अब असामान्य रूप से मजबूत संदेश तैयार हो रहा है। कैथरीन मान ने यह भी स्वीकार किया कि मार्च के महीने में मध्य पूर्व में पैदा हुए झटके को लेकर बैंक ऑफ इंग्लैंड अपनी प्रतिक्रिया और नीतिगत रुख को शायद पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाया था। इसके अलावा अप्रैल में किसी आधारभूत पूर्वानुमान का जारी न होना भी बाजार में अनिश्चितता बढ़ाने की एक बड़ी वजह बना। इन कमियों को खुले तौर पर सामने रखकर उन्होंने यह साफ कर दिया कि भविष्य में केंद्रीय बैंक अपनी साख और स्पष्टता को फिर से मजबूत करने के लिए अधिक निर्णायक कदम उठा सकता है, जिसका सीधा असर ब्रिटिश पाउंड की स्थिति पर देखा जा रहा है।
केंद्रीय बैंक का दायित्व और मुद्रास्फीति नियंत्रण की रूपरेखा
यूनाइटेड किंगडम की संपूर्ण मौद्रिक व्यवस्था का संचालन बैंक ऑफ इंग्लैंड के हाथों में है। इस केंद्रीय बैंक का सर्वोपरि लक्ष्य देश के भीतर कीमतों में स्थिरता बनाए रखना है, जिसके तहत वार्षिक मुद्रास्फीति की दर को 2 प्रतिशत के तय दायरे में सीमित रखना अनिवार्य होता है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बैंक मुख्य उधारी दरों में बदलाव का प्राथमिक साधन अपनाता है। बैंक ऑफ इंग्लैंड जिस दर पर वाणिज्यिक बैंकों को ऋण उपलब्ध कराता है और जिस दर पर वाणिज्यिक बैंक आपस में पूंजी का लेन-देन करते हैं, वही दर देश की पूरी अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों की सामान्य दिशा निर्धारित करती है। इस पूरी प्रक्रिया का बहुत गहरा प्रभाव ब्रिटिश मुद्रा पाउंड स्टर्लिंग के अंतरराष्ट्रीय मूल्य पर पड़ता है।
जब भी अर्थव्यवस्था में महंगाई की रफ्तार 2 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य से ऊपर निकल जाती है, तो बैंक ऑफ इंग्लैंड तुरंत ब्याज दरों में इजाफा करने का फैसला करता है। ब्याज दरें बढ़ने से आम नागरिकों और व्यावसायिक उद्यमों दोनों के लिए कर्ज हासिल करना काफी महंगा हो जाता है, जिससे उपभोग और उधारी में कमी आती है। यह परिस्थिति पाउंड स्टर्लिंग के लिए अनुकूल मानी जाती है क्योंकि ऊंची ब्याज दरों के कारण दुनिया भर के वैश्विक निवेशक बेहतर रिटर्न की उम्मीद में यूके के बाजारों में अपना पैसा लगाना पसंद करते हैं। इसके विपरीत जब महंगाई लक्ष्य से नीचे फिसलने लगती है, तो यह आर्थिक सुस्ती का प्रतीक होता है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को घटाकर कर्ज सस्ता करता है ताकि कंपनियां नए निवेश करें और रोजगार पैदा हों, हालांकि कम ब्याज दरें आमतौर पर पाउंड स्टर्लिंग के मूल्य को कमजोर करती हैं।
मात्रात्मक सहजता और परिमाणात्मक सख्ती की प्रक्रिया
अत्यंत असामान्य और गंभीर आर्थिक संकटों के समय बैंक ऑफ इंग्लैंड मात्रात्मक सहजता यानी क्वांटिटेटिव ईजिंग का सहारा लेता है। यह एक ऐसा असाधारण नीतिगत कदम है जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब महज ब्याज दरों में कटौती करने से संकटग्रस्त वित्तीय प्रणाली में तरलता का संचार नहीं हो पाता। मात्रात्मक सहजता के अंतर्गत केंद्रीय बैंक नए पैसे का सृजन करता है और उससे बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों से सीधे सरकारी बांड या उच्च श्रेणी के कॉरपोरेट बांड खरीदता है। इस बड़े पैमाने की बांड खरीद से वित्तीय प्रणाली में धन का प्रवाह तेज होता है, लेकिन मुद्रा की आपूर्ति बहुत अधिक बढ़ जाने की वजह से पाउंड स्टर्लिंग पर नकारात्मक दबाव पड़ता है और वह कमजोर होता है।
वहीं दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने और महंगाई के दोबारा भड़कने की दशा में मात्रात्मक सख्ती यानी क्वांटिटेटिव टाइटनिंग लागू की जाती है। यह प्रक्रिया मात्रात्मक सहजता के बिल्कुल उलट काम करती है। जहां पहले केंद्रीय बैंक बांड खरीदकर नकदी डालता था, वहीं मात्रात्मक सख्ती के दौरान बैंक ऑफ इंग्लैंड नए बांड खरीदना पूरी तरह बंद कर देता है। इसके अलावा उसके पास पहले से मौजूद बांड्स के परिपक्व होने पर मिलने वाली मूल राशि का दोबारा निवेश भी रोक दिया जाता है। नकदी को समेटने की यह आक्रामक नीति मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करती है, जो आमतौर पर पाउंड स्टर्लिंग को मजबूती प्रदान करती है।
वैश्विक मुद्रा बाजारों में उतार-चढ़ाव और अमेरिकी डॉलर का दबदबा
ब्रिटेन में दरों को लेकर छिड़ी इस बहस के बीच वैश्विक मुद्रा बाजारों में बृहस्पतिवार को अमेरिकी डॉलर का जोरदार असर देखने को मिला। एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर की जोड़ी दो महीने के निचले स्तर के करीब सीमित दायरे में रही और 0.6900 के मध्य स्तर पर कारोबार करती नजर आई। यद्यपि अमेरिकी व्यक्तिगत उपभोग व्यय यानी पीसीई के आंकड़ों ने अक्टूबर में फेडरल रिजर्व द्वारा दरें बढ़ाए जाने की संभावनाओं को थोड़ा धीमा कर दिया है, फिर भी कच्चे तेल से भड़की महंगाई की आशंकाओं ने अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड को ऊंचे स्तर पर बनाए रखा है। दूसरी ओर अगस्त महीने में ऑस्ट्रेलिया का व्यापार अधिशेष तेजी से गिरकर 495 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर रह गया, जिससे ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा पर सीमित असर देखा गया।
वहीं जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर 158.00 के पार अपने साप्ताहिक दायरे के ऊपरी सिरे पर टिका रहा। नरम पीसीई आंकड़ों के बावजूद बहुवर्षीय उच्च स्तर पर बनी अमेरिकी बांड यील्ड और अमेरिका व ईरान के बीच चल रहे भू-राजनीतिक तनाव ने सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की मांग को मजबूत बनाए रखा है। डॉलर की यह व्यापक मजबूती बैंक ऑफ जापान के सख्त रुख और जापानी अधिकारियों द्वारा बाजार में संभावित हस्तक्षेप के जोखिमों को भी पीछे छोड़ रही है। इस बीच यूरोप की साझा मुद्रा यूरो पर भारी दबाव बना रहा, जहां यूरो बनाम अमेरिकी डॉलर की जोड़ी गिरकर 1.1312 पर आ गई जो मई 2025 के बाद का सबसे निचला स्तर है। यह गिरावट जनवरी के 1.2082 के शिखर से काफी नीचे है, हालांकि यूरोज़ोन में महंगाई का नया झटका यूरो को अप्रत्याशित सहारा दे सकता है। आगामी सितंबर गैर-कृषि पेरोल रिपोर्ट से पहले डॉलर अपने वार्षिक शिखर के निकट बना हुआ है और विश्लेषक इसके भविष्य के रुझान पर बंटे हुए हैं।
सोना और क्रिप्टोकरेंसी बाजार पर वित्तीय दबाव
अमेरिकी डॉलर के कड़े तेवर और अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिफल में आई उछाल ने कीमती धातुओं के बाजार पर भी कड़ा पहरा लगा रखा है। बृहस्पतिवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना लगभग स्थिर रहा और हाजिर सोना 0.26 प्रतिशत की मामूली बढ़त के साथ 4,167 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार करता दिखा। बढ़ते डॉलर के कारण सोने में शुरुआती सुधार के बाद नई तेजी दर्ज करने में भारी संघर्ष देखा गया।
डिजिटल संपत्तियों का बाजार भी इस व्यापक वित्तीय दबाव से अछूता नहीं रहा। दुनिया की सबसे बड़ी क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन 82,500 डॉलर के समर्थन स्तर और 85,000 डॉलर के प्रतिरोध स्तर के बीच एक संकरे दायरे में फंसी रही। इसी तरह इथेरियम पर भी लगातार बिकवाली का दबाव बना रहा, जो 2,700 डॉलर के नीचे कारोबार करता नजर आया जबकि 2,600 डॉलर का स्तर उसके लिए तात्कालिक सहारा बना हुआ है। वहीं रिपल भी फिसलकर अपने 1.50 डॉलर के महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे आ गया। वित्तीय बाजारों की यह पूरी तस्वीर दर्शाती है कि केंद्रीय बैंकों के नीतिगत फैसले और ऊर्जा की कीमतों से जुड़ी मुद्रास्फीति किस प्रकार सभी परिसंपत्ति वर्गों को गहरे संकट और अनिश्चितता में डाल रही हैं।


















