17 जुलाई की सुबह हरियाणा के जींद स्टेशन से एक ऐसी ट्रेन पटरी पर उतरेगी, जैसी अब तक देश में नहीं देखी गई। इसे चलने के लिए न डीजल चाहिए और न बिजली की तार। यह न धुआं छोड़ती है, न राख। इसमें से निकलती है तो सिर्फ पानी की बूंदें। यही है भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन, जो जींद और सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर का रास्ता तय करेगी, 682 यात्रियों को अपने साथ ले जाएगी और दुनिया की सबसे ताकतवर हाइड्रोजन ट्रेनों में गिनी जाएगी।
सवाल यह है कि भारत का यह प्रयोग इतना बड़ा क्यों है? आखिर हाइड्रोजन गैस की कहानी क्या है, और जिस गैस ने कभी एक हवाई जहाज को आग के गोले में बदल दिया था, क्या वही गैस आने वाले कल का ईंधन बन सकती है? आइए, इस पूरी कहानी को कदम दर कदम समझते हैं।
एक बुलबुले से शुरू हुई कहानी
यह किस्सा करीब 250 साल पहले लंदन की एक प्रयोगशाला में शुरू होता है। साल 1776 में हेनरी कैवेंडिश नाम के एक वैज्ञानिक ने जिंक धातु को एसिड में डाला। अचानक बर्तन में से बुलबुले उठने लगे। ये उस गैस के बुलबुले थे, जिसे उस समय तक किसी ने पहचाना नहीं था।
जब कैवेंडिश ने इस रंगहीन गैस में आग लगाई तो एक हल्की सी आवाज हुई और पानी की बूंदें बन गईं। इसी से पता चला कि पानी अपने आप में कोई एक चीज नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग गैसों से मिलकर बना है, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन। जरा सोचिए, जो पानी हम रोज पीते हैं, उसी में वह गैस मौजूद है जो आज एक ट्रेन को दौड़ा रही है।
गैस मिल गई, नाम कैसे पड़ा
गैस तो खोज ली गई थी, पर उसे कहा क्या जाए? यह काम एक फ्रांसीसी रसायनशास्त्री ने किया। उन्होंने ग्रीक भाषा के दो शब्द जोड़े, 'हाइड्रो' यानी पानी और 'जेनेस' यानी जन्मा हुआ। इस तरह हाइड्रोजन का शाब्दिक मतलब हुआ 'पानी से जन्मी'।
साल 1800 में दो अंग्रेज वैज्ञानिकों ने इसका उल्टा कर दिखाया। उन्होंने पानी में बिजली की धारा दौड़ाई और उसे हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन में तोड़ दिया। इसी प्रक्रिया को इलेक्ट्रोलिसिस कहा गया। आज दुनिया भर में हाइड्रोजन इसी तरीके से बनाई जा रही है।
'गैस बैटरी' से लेकर पहले फ्यूल सेल तक
अगला बड़ा सवाल यह था कि क्या हाइड्रोजन गैस को ईंधन की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है? साल 1838 में एक रसायनशास्त्री ने पाया कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिलाने पर सिर्फ पानी ही नहीं बनता, बल्कि ऊर्जा भी पैदा होती है। इसी सिद्धांत पर अंग्रेज वैज्ञानिक और जज विलियम ग्रोव ने एक चलती-फिरती मशीन बनाई, जिसे उन्होंने 'गैस बैटरी' नाम दिया। यह हाइड्रोजन की ऊर्जा को एक बैटरी में जमा कर सकती थी। यही दुनिया का पहला फ्यूल सेल था, और इसी वजह से ग्रोव को 'फादर ऑफ द फ्यूल सेल' कहा जाता है।
हिंडनबर्ग हादसा और हाइड्रोजन की बदनामी
हाइड्रोजन की कहानी में एक बड़ा हादसा भी जुड़ा हुआ है। साल 1937 में हाइड्रोजन गैस से भरा हिंडनबर्ग नाम का एक विशाल हवाई जहाज उतरते समय अचानक आग की लपटों में घिर गया।
हाइड्रोजन बेहद हल्की गैस है। हिंडनबर्ग में इसका इस्तेमाल जहाज को हवा में उठाने के लिए किया गया था, ठीक किसी गुब्बारे की तरह। किसी वजह से जहाज की पूंछ के पास आग लगी, और चूंकि हाइड्रोजन बहुत जल्दी आग पकड़ती है, इसलिए कुछ ही सेकंड में पूरा जहाज लपटों में डूब गया। इस हादसे के बाद पूरी परियोजना बंद कर दी गई और हाइड्रोजन को 'खतरनाक' मान लिया गया।
दुनिया फिर हाइड्रोजन की ओर क्यों लौटी
असली मोड़ आया साल 1973 में, जब मध्य पूर्व के देशों ने अचानक तेल की सप्लाई रोक दी। तब दुनिया को समझ आया कि पूरी तरह तेल पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। यहीं से हाइड्रोजन को एक गंभीर विकल्प के तौर पर देखा जाने लगा।
साल 1998 में छोटे से देश आइसलैंड ने ऐलान किया कि वह 2030 तक दुनिया की पहली पूरी तरह हाइड्रोजन आधारित अर्थव्यवस्था बनना चाहता है। साल 2018 में जर्मनी ने दुनिया की पहली कमर्शियल हाइड्रोजन यात्री ट्रेन चलाई। जापान, चीन और अमेरिका ने भी हाइड्रोजन ट्रेनें शुरू कीं। 17 जुलाई 2026 को शुरू हो रही भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन जर्मनी की उस पहली हाइड्रोजन ट्रेन से करीब पांच गुना लंबी है। करीब 250 साल पहले लंदन की एक प्रयोगशाला में एक बुलबुले से शुरू हुआ सफर अब हरियाणा के जींद स्टेशन पर एक नए पड़ाव की ओर बढ़ रहा है।
ब्रह्मांड का सबसे हल्का तत्व
दसवीं क्लास में पढ़ी वह पीरियोडिक टेबल याद है, जिसमें दुनिया के सारे तत्व करीने से सजे होते हैं? उसी टेबल में हाइड्रोजन सबसे पहला तत्व है। इसके नाभिक में सिर्फ एक प्रोटॉन होता है, जिसकी वजह से यह सबसे हल्का तत्व है। यह पूरे ब्रह्मांड में सबसे ज्यादा मात्रा में पाया जाने वाला तत्व भी है, जो सूरज और तारों तक में मौजूद है।
लेकिन हाइड्रोजन के साथ एक पेच है। यह अकेले इतनी अस्थिर होती है कि खुद से टिक ही नहीं पाती। इसे हमेशा एक साथी चाहिए। यह साथी या तो कोई दूसरा हाइड्रोजन परमाणु हो सकता है या फिर कोई और तत्व। इसीलिए जब भी आप हाइड्रोजन गैस सुनते हैं, तो उसका मतलब असल में H₂ अणु होता है, कभी अकेला हाइड्रोजन परमाणु नहीं।
सबसे आम रूप में यह पानी यानी H₂O में ऑक्सीजन के साथ जुड़ी हुई मिलती है। अगर हमें शुद्ध हाइड्रोजन चाहिए, तो पहले उसे ऑक्सीजन से अलग करना पड़ता है। इसी प्रक्रिया को इलेक्ट्रोलिसिस कहते हैं। यह प्रयोग आप खुद प्रयोगशाला में भी कर सकते हैं।
फ्यूल सेल कैसे हाइड्रोजन को रफ्तार में बदलता है
लेकिन हाइड्रोजन गैस से ऊर्जा कैसे बनती है, और यह ट्रेनों और गाड़ियों को कैसे दौड़ाती है? सबसे समझदारी भरा तरीका है फ्यूल सेल का इस्तेमाल। फ्यूल सेल असल में एक तरह की बैटरी ही है। यह हवा में मौजूद ऑक्सीजन को हाइड्रोजन के साथ मिलाकर बिजली पैदा करता है। इस पूरी प्रक्रिया में बाहर निकलती है सिर्फ ऊर्जा और पानी की भाप। न धुआं, न कार्बन, और न कोई प्रदूषण। यही वजह है कि हाइड्रोजन ट्रेन को 'जीरो एमिशन' ट्रेन कहा जाता है।
हर हाइड्रोजन साफ नहीं होती
हालांकि यहां एक पेच है। हाइड्रोजन खुद भले प्रदूषण न फैलाए, पर जिस तरीके से इसे बनाया जाता है, वह अक्सर प्रदूषण फैलाता है। सबसे साफ तरीका वह तीसरा है, जिसमें सूरज या हवा से बनी बिजली का इस्तेमाल इलेक्ट्रोलिसिस के जरिए हाइड्रोजन बनाने में किया जाता है। भारत की हाइड्रोजन ट्रेन का लक्ष्य भी यही ग्रीन हाइड्रोजन इस्तेमाल करना है।
एक आम बिजली से चलने वाली ट्रेन को ऊपर लगी तारों से बिजली खींचनी पड़ती है। हाइड्रोजन ट्रेन को इनकी जरूरत ही नहीं पड़ती। यह अपनी बिजली खुद बनाती है।
जींद से सोनीपत के रास्ते पर क्या चलेगा
यह ट्रेन 89 किलोमीटर लंबे जींद सोनीपत रूट पर रोजाना दो राउंड ट्रिप लगाएगी, यानी कुल 356 किलोमीटर का सफर। इसमें करीब 300 किलोग्राम हाइड्रोजन खर्च होगी। ट्रेन कुल 440 किलोग्राम हाइड्रोजन अपने साथ लेकर चलती है।
वे चुनौतियां, जो हाइड्रोजन को आम ईंधन बनने से रोकती हैं
एक किलोग्राम हाइड्रोजन बनाने में करीब 50 यूनिट बिजली लगती है। जबकि एक किलोग्राम हाइड्रोजन में मौजूद ऊर्जा सिर्फ साढ़े तीन लीटर पेट्रोल के बराबर होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह एक महंगा सौदा है।
हाइड्रोजन को सामान्य वायुमंडलीय दबाव, जिसे एक बार कहते हैं, उससे 200 से 500 गुना ज्यादा दबाव पर रखना पड़ता है। यही वजह है कि रेलवे ने जींद में एक खास फ्यूलिंग सुविधा बनाई है, जो एक बार में 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन जमा कर सकती है।
इस फ्यूलिंग सेंटर पर एक चिलर प्लांट भी लगाया गया है, ताकि हाइड्रोजन को माइनस 15 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा रखा जा सके। इतने कम तापमान पर हाइड्रोजन तरल हो जाती है, जिससे उसे ट्रेन में भरना आसान हो जाता है। इस पूरे सिस्टम के केंद्र में है कनाडा की कंपनी बैलार्ड का बनाया फ्यूल सेल, जिसे इस तकनीक की दुनिया की अग्रणी कंपनियों में गिना जाता है।
तकनीक अभी बहुत नई है
हाइड्रोजन ट्रेन की तकनीक अभी बेहद नई है। फ्रांस की कंपनी एल्सटॉम ने इसे पहली बार साल 2016 में बर्लिन की एक प्रदर्शनी में दिखाया था। साल 2018 में जर्मनी ने दुनिया की पहली हाइड्रोजन यात्री ट्रेन उतारी। लेकिन साल 2024 के आखिर तक जर्मनी अपनी कई हाइड्रोजन ट्रेनें सेवा से हटा चुका था। उसने इनके बजाय बैटरी से चलने वाली ट्रेनों को तवज्जो देनी शुरू कर दी, क्योंकि वे सस्ती और ज्यादा सुविधाजनक हैं।
जापान ने साल 2022 में हाइड्रोजन ट्रेन का परीक्षण शुरू किया, पर अब तक इसे बड़े पैमाने पर नहीं चलाया। चीन और अमेरिका में भी यह तकनीक अभी छोटी दूरी के संचालन तक ही सीमित है। हाइड्रोजन बनाना और चलाना अब भी बैटरी तकनीक के मुकाबले महंगा पड़ता है।
कुल मिलाकर हाइड्रोजन कोई जादू की छड़ी नहीं है, बल्कि एक ऐसा ईंधन है जिसमें ताकत और चुनौतियां दोनों हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इस्तेमाल होने पर यह सिर्फ पानी छोड़ती है, कोई प्रदूषण नहीं। चुनौती यह है कि इसे बनाना, जमा करना और एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान नहीं है, और आज भी बनने वाली ज्यादातर हाइड्रोजन साफ नहीं होती।
क्या भारत बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन अपनाएगा
तो क्या भारत बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन ट्रेनें चलाएगा? अगर जींद सोनीपत रूट पर यह प्रयोग कामयाब रहा, तो आने वाले सालों में देश के कई हेरिटेज और पहाड़ी रूट, जैसे कालका शिमला, भी हाइड्रोजन की ओर बढ़ सकते हैं। ये वे रास्ते हैं, जहां बिजली की लाइन बिछाना मुश्किल है और डीजल इंजन का धुआं एक बड़ी चिंता बना हुआ है। लेकिन अगर यह प्रयोग नाकाम रहा या बहुत महंगा साबित हुआ, तो भारत भी जर्मनी की तरह इससे किनारा कर सकता है।





















