शिमला से लगभग 22 किलोमीटर दूर चीड़ के जंगलों के बीच बने जुब्बरहट्टी हवाई अड्डे पर विमानों की गड़गड़ाहट की जगह अब सन्नाटा पसरा हुआ है। यहां आखिरी उड़ान 27 अगस्त को भरी गई थी, जिसके बाद से खराब मौसम और घने कोहरे के कारण सेवाएं पूरी तरह रुकी हुई हैं। पहाड़ों को काटकर तैयार किए गए इस परिसर में फिलहाल सिर्फ सुरक्षा और तकनीकी कर्मचारी ही मौजूद हैं। 21 अक्टूबर 2016 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना की शुरुआत की थी, तब उन्होंने कहा था, 'मैं चाहता हूं कि हवाई चप्पल पहनने वाला व्यक्ति भी हवाई जहाज से यात्रा कर सके।' इस संकल्प के तहत पहली उड़ान 27 अप्रैल 2017 को शिमला से ही रवाना हुई थी। हालांकि, एक दशक बीतने के बाद छोटे शहरों को हवाई संपर्क से जोड़ने की इस महत्त्वाकांक्षी मुहिम को कई गंभीर जमीनी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
उड़ान योजना का एक दशक और 1.68 करोड़ यात्रियों का सफर
उड़ान यानी उड़े देश का आम नागरिक योजना का प्राथमिक उद्देश्य देश के उन दूरदराज और छोटे इलाकों को विमानन मानचित्र पर लाना था, जहां नियमित हवाई संपर्क या तो बिल्कुल नहीं था या बेहद सीमित था। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 30 जून 2026 तक इस योजना के अंतर्गत कुल 95 एरोड्रोम शामिल किए जा चुके थे। इनमें 76 पारंपरिक हवाई अड्डे, 17 हेलीपोर्ट और 2 जल एरोड्रोम शामिल रहे। योजना के तहत 677 चुनिंदा हवाई मार्गों की पहचान की गई थी, जिन पर संचालित 3.58 लाख उड़ानों के जरिए कुल 1.68 करोड़ मुसाफिरों ने यात्राएं पूरी कीं।
इस पूरी व्यवस्था का आर्थिक ढांचा यह तय करता था कि कम यात्री संख्या वाले क्षेत्रीय मार्गों पर विमानन कंपनियों को होने वाले घाटे की भरपाई सरकार वित्तीय सहायता के जरिए करे, ताकि आम यात्रियों को रियायती दरों पर सीटें मुहैया कराई जा सकें। इस मॉडल के तहत 9 ऑपरेटरों ने अपनी सेवाएं शुरू की थीं और सरकार ने उन्हें कुल 4,881 करोड़ रुपये की वित्तीय मदद उपलब्ध कराई। लेकिन 10 साल की इस अवधि के बाद स्थिति यह है कि योजना में शामिल 95 हवाई अड्डों में से 15 या तो पूरी तरह बंद हो चुके हैं अथवा वहां उड़ान योजना के तहत सेवाएं समाप्त हो चुकी हैं। मध्य प्रदेश का दतिया, गुजरात का भावनगर और हिमाचल प्रदेश का शिमला इस जमीनी हकीकत के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
दतिया हवाई अड्डा: शुरुआत के 11 महीने बाद ही छाया सन्नाटा
मां पीतांबरा शक्तिपीठ के लिए प्रसिद्ध मध्य प्रदेश के दतिया में 31 मई 2025 को एक नए हवाई अड्डे का उद्घाटन बड़े उत्साह के साथ किया गया था। रेलवे स्टेशन से महज 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस परिसर तक पहुंचने के लिए मुख्य मार्ग से मुड़ते ही शुरुआती 200 मीटर की सड़क तो साफ-सुथरी दिखती है, लेकिन आगे का रास्ता गड्ढों से भरा है और जगह-जगह मवेशी घूमते नजर आते हैं। सफाई कर्मियों का कहना है कि जब नियमित उड़ानों का संचालन होता था, तब व्यवस्थाएं ठीक रखी जाती थीं, लेकिन उड़ानें बंद होने के बाद अब मवेशियों को हटाने वाला भी कोई नहीं है।
सरकारी स्तर पर इस हवाई अड्डे को गैर-संचालित घोषित किया जा चुका है, हालांकि कभी-कभार वीआईपी विमान यहां उतरते रहते हैं। हवाई अड्डे के आसपास 2 किलोमीटर के दायरे में ज्यादातर खाली जमीन और इक्का-दुक्का दुकानें ही नजर आती हैं। स्थानीय होटल संस्कृति पैलेस के संचालक अनुराग गगौरीया बताते हैं कि जब हवाई अड्डे का निर्माण हुआ था, तब स्थानीय कारोबारियों को उम्मीद जगी थी कि शहर में पर्यटकों और मेहमानों की आमद बढ़ेगी जिससे होटल व्यवसाय रफ्तार पकड़ेगा, मगर कुछ ही दिनों में सेवाएं ठप हो गईं।
दतिया से जो उड़ानें शुरू की गई थीं, वे राजधानी भोपाल और पर्यटन स्थल खजुराहो के लिए थीं। स्थानीय स्तर पर भोपाल जाने के लिए पहले से ही कई ट्रेनें और बसें उपलब्ध हैं, जबकि दतिया के व्यापारियों का एक बड़ा कारोबारी हिस्सा इंदौर से जुड़ा हुआ है। दुर्भाग्य से इंदौर के लिए कोई सीधी उड़ान नहीं दी गई। स्पष्ट रूप से हवाई अड्डा तो बना दिया गया, लेकिन कनेक्टिविटी तय करते समय स्थानीय यात्रियों और व्यापारियों की व्यावहारिक जरूरतों को नजरअंदाज किया गया।
एयर ट्रैफिक कंट्रोलर नितिन ठाकरान के अनुसार, फ्लाईबिग एयरलाइन ने 31 मई 2025 को यहां से अपनी विमान सेवा शुरू की थी, लेकिन लगभग पांच महीने संचालन के बाद इसे बंद कर दिया गया। शुरुआत में अनुमानित यात्री संख्या मिलने की उम्मीद थी, परंतु हकीकत में 19 सीटों वाला छोटा विमान भी आधा ही भर पाता था। पूरे संचालन काल के दौरान यहां से केवल 1,050 यात्रियों ने ही सफर किया। विमानन कंपनी ने अचानक सेवाएं रोक दीं और इसके आधिकारिक कारणों की स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी। इसके बाद स्काईहॉप एयरलाइन को संचालन का अनुबंध मिलना था और 7 अगस्त से उड़ानें दोबारा शुरू होने की बात कही गई थी, लेकिन वे सेवाएं अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी हैं।
भावनगर: रखरखाव पर 18 करोड़ रुपये खर्च, आमदनी सिर्फ 4 करोड़
गुजरात के भावनगर हवाई अड्डे की कहानी एक अलग वित्तीय असंतुलन को सामने लाती है। यहां का हवाई अड्डा तकनीकी रूप से चालू स्थिति में है, लेकिन उड़ान योजना के तहत मिलने वाली नियमित रियायती उड़ानों का सिलसिला टूट चुका है। हवाई अड्डा निदेशक तपन कुमार नायक के अनुसार, स्पाइसजेट उड़ान योजना के तहत सेवाएं दे रही थी और इस क्रम में आखिरी उड़ान 10 जून 2025 को संचालित हुई थी।
नियमों के तहत सरकार ने पहले तीन वर्षों के लिए विमानन कंपनी को वित्तीय सब्सिडी दी थी। जैसे ही तीन साल की यह अवधि पूरी हुई और सब्सिडी मिलनी बंद हुई, एयरलाइन ने अपना संचालन बंद कर दिया। वर्तमान समय में भावनगर से एक व्यावसायिक उड़ान संचालित हो रही है, लेकिन वह उड़ान योजना का हिस्सा नहीं है। परिचालन के वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले वित्तीय वर्ष में हवाई अड्डे के संचालन और रखरखाव पर लगभग 18 करोड़ रुपये का खर्च आया, जबकि इस अवधि में हवाई अड्डे की कुल कमाई महज 4 करोड़ रुपये दर्ज की गई।
शिमला: यात्रियों की कमी से ज्यादा भारी पड़ी भौगोलिक परिस्थितियां
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के पास स्थित जुब्बरहट्टी हवाई अड्डे का सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है। हालांकि उड़ान योजना की ऐतिहासिक पहली उड़ान 27 अप्रैल 2017 को यहीं से रवाना हुई थी, लेकिन इसके बाद करीब छह वर्षों तक यहां नियमित हवाई सेवाएं शुरू ही नहीं हो सकीं। लंबे अंतराल के बाद 26 सितंबर 2022 को अलायंस एयर का एक विमान दिल्ली से पहली बार जुब्बरहट्टी पहुंचा था। इसके बावजूद परिचालन में नियमितता नहीं आ सकी।
वर्ष 2025 में मूसलाधार बारिश और भूस्खलन के चलते हवाई अड्डे का संचालन लगभग 10 महीनों तक निलंबित रहा। इसके बाद हिमाचल उच्च न्यायालय के दखल और आदेश पर 10 मई 2026 को हवाई सेवाएं फिर बहाल की गईं, लेकिन मानसून की दस्तक के साथ ही 24 जुलाई को घने कोहरे के कारण उड़ानों को दोबारा स्थगित करना पड़ा। यहां आखिरी विमान 27 अगस्त को उतरा था। हवाई अड्डा निदेशक ललित कुमार का कहना है कि यह हवाई अड्डा बंद नहीं है और मौसम साफ होते ही उड़ानों का परिचालन दोबारा शुरू किया जा सकता है।
शिमला में असल चुनौती यात्रियों की मांग की नहीं, बल्कि यहां की जटिल भौगोलिक बनावट की है। यहां टेबल-टॉप रनवे मौजूद है, जिसका निर्माण पहाड़ या ऊंची जमीन को काटकर समतल करके किया जाता है। रनवे के दोनों तरफ गहरी खाइयां होती हैं, जिसकी वजह से बड़े विमान यहां नहीं उतर सकते और उड़ान भरने तथा उतरने के दौरान पायलटों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है।
जुब्बरहट्टी हवाई अड्डे से पहली व्यावसायिक उड़ान वर्ष 1998 में शुरू हुई थी और अब तक इसके बुनियादी ढांचे पर लगभग 116 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, जबकि नवीनीकरण का काम अभी भी चल रहा है। स्थानीय निवासी मोहन वर्मा कहते हैं कि हवाई अड्डे से इलाके के लोगों को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन दिन में केवल एक उड़ान आने से कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ। इसके चलते महज चार-पांच ढाबे खुले और 8-10 टैक्सी चालकों को ही काम मिल सका। यह रोजगार भी तभी चलता है जब कोई विमान आता है, जबकि हर साल मानसून के दौरान ढाई से तीन महीने तक उड़ानें पूरी तरह बंद ही रहती हैं।
प्रयागराज ने दिखाया सकारात्मक रुख, यात्रियों का आंकड़ा 10 लाख पार
क्षेत्रीय संपर्क योजना की स्थिति हर जगह निराशाजनक नहीं है और उत्तर प्रदेश का प्रयागराज इसका एक मजबूत और सफल उदाहरण बनकर उभरा है। वर्ष 2024-25 के दौरान प्रयागराज हवाई अड्डे से 10.77 लाख यात्रियों ने हवाई यात्रा की, जबकि इससे पिछले वित्तीय वर्ष 2023-24 में यह संख्या 6.10 लाख दर्ज की गई थी। इस तरह महज एक साल के भीतर यात्रियों की तादाद में लगभग 76.4 प्रतिशत का जोरदार इजाफा देखा गया।
हवाई अड्डा निदेशक गणेश यादव इस सफलता के पीछे तीन मुख्य कारक बताते हैं
- धार्मिक पर्यटन का सतत प्रवाह: प्रयागराज में हर साल माघ मेले का भव्य आयोजन होता है। इसके अलावा हर छह साल में अर्धकुंभ और हर 12 साल में महाकुंभ का आयोजन किया जाता है। त्रिवेणी संगम की मौजूदगी के चलते देश-विदेश से श्रद्धालु साल भर यहां पहुंचते रहते हैं।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय की उपस्थिति: राज्य की प्रधान न्यायपालिका होने के कारण देशभर से न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता, सरकारी अधिकारी और वादी मुकदमों के सिलसिले में लगातार शहर आते-जाते हैं।
- राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियां: प्रदेश के प्रमुख केंद्रों में शुमार होने के कारण वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं और अन्य प्रमुख हस्तियों का निरंतर दौरा इस हवाई मार्ग पर यात्री दबाव बनाए रखता है।
हवाई अड्डे तैयार करना आसान, उड़ानों को टिकाए रखना असली चुनौती
देश के समग्र नागरिक उड्डयन ढांचे की बात करें तो वर्ष 2014 में भारत के भीतर कुल 74 हवाई अड्डे चालू हालत में थे। वर्ष 2026 तक यह संख्या बढ़कर 165 तक पहुंच चुकी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस समयावधि में विमानन से जुड़े बुनियादी ढांचे के विकास पर 1.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की भारी पूंजी का निवेश किया गया है।
इसके बावजूद, फरवरी 2026 में सरकार ने संसद के पटल पर आधिकारिक जानकारी दी कि उड़ान योजना के तहत शुरू किए गए 15 हवाई अड्डे वर्तमान में गैर-संचालित हो चुके हैं। इस सूची में दतिया, शिमला, भावनगर, पठानकोट, लुधियाना, पाकयोंग, कुशीनगर, अलीगढ़, आजमगढ़, चित्रकूट, श्रावस्ती और मुरादाबाद जैसे हवाई अड्डे शामिल हैं। इन 15 गैर-संचालित हवाई अड्डों के विकास और बुनियादी ढांचे पर अब तक लगभग 880 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
हवाई मार्गों का विश्लेषण भी इसी चिंताजनक तस्वीर की पुष्टि करता है। उड़ान योजना के तहत अलायंस एयर, स्पाइसजेट, इंडिगो, स्टार एयर, फ्लाईबिग, फ्लाई91 और इंडियावन जैसी प्रमुख विमानन कंपनियों ने अपनी सेवाएं शुरू की थीं। योजना की शुरुआत से लेकर अब तक कुल 669 मार्गों पर कभी न कभी उड़ानें प्रारंभ की गईं, लेकिन वर्तमान में इनमें से केवल 336 मार्गों पर ही विमान सेवाएं सुचारू हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि कुल शुरू किए गए मार्गों में से 333 रूट, यानी लगभग 50 फीसदी रास्ते बंद हो चुके हैं।
दिसंबर 2025 में सरकार द्वारा साझा किए गए विवरण के अनुसार, 151 हवाई मार्ग तो ऐसे थे जो अपने निर्धारित तीन साल का समय भी पूरा नहीं कर पाए और पहले ही बंद हो गए। इसके पीछे यात्रियों की बेहद कम संख्या, विमानों की अनुपलब्धता, खराब दृश्यता और विमानन कंपनियों द्वारा संचालन समेट लेने जैसे प्रमुख कारण बताए गए।
पूर्व पायलट और विमानन विशेषज्ञ डॉ. विपुल सक्सेना के अनुसार, उड़ान योजना के तहत बने हवाई अड्डों के बंद होने के पीछे दो बुनियादी वजहें हैं। पहली वजह यह कि छोटे शहरों से उतनी संख्या में लोगों ने हवाई यात्रा नहीं की जितनी उम्मीद योजना बनाते समय लगाई गई थी, जिसके चलते एयरलाइंस के लिए विमान उड़ाना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन गया। दूसरी अहम वजह यह है कि उड़ान योजना के नियमों के अनुसार सरकार विमानन कंपनियों को केवल पहले तीन साल तक ही वित्तीय सहायता और सब्सिडी प्रदान करती है। इस तीन साल की मियाद समाप्त होते ही कंपनियों को पूरा खर्च खुद वहन करना पड़ता है, और सब्सिडी हटते ही इन कम लाभ वाले मार्गों पर उड़ानों को जारी रखना एयरलाइंस के लिए बेहद मुश्किल साबित होता है।
योजना के जमीनी नतीजे भले ही अपेक्षा के अनुरूप न रहे हों, लेकिन सरकार इस दिशा में अपने कदम पीछे खींचने को तैयार नहीं है। नागरिक उड्डयन मंत्री के. राम मोहन नायडू के अनुसार, अगले 10 वर्षों के दौरान उड़ान योजना के तहत 120 और नए हवाई अड्डों का निर्माण किया जाएगा। बुनियादी ढांचे के इस अगले चरण के विस्तार पर सरकार 28,840 करोड़ रुपये की बड़ी धनराशि खर्च करने की योजना पर काम कर रही है।
वैश्विक स्तर पर क्षेत्रीय विमानन सब्सिडी के मॉडल
विशाल भौगोलिक क्षेत्रफल वाले अन्य देशों जैसे अमेरिका, कनाडा, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया में भी दूरदराज के क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़े रखने के लिए सरकारें हवाई संपर्क पर सब्सिडी देती हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका में 1978 में विमानन क्षेत्र के नियंत्रणमुक्ति कानून के बाद एसेंशियल एयर सर्विस की शुरुआत की गई थी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि छोटे शहरों का हवाई संपर्क पूरी तरह समाप्त न हो जाए।
कनाडा में सरकार एयर सर्विस सपोर्ट प्रोग्राम का संचालन करती है। कोविड महामारी के कठिन दौर में कनाडाई सरकार ने दूरस्थ इलाकों में विमान सेवाएं सुचारू रखने के लिए 18 महीनों के भीतर 17.4 करोड़ कनाडाई डॉलर, यानी करीब 1,199 करोड़ रुपये की विशेष आर्थिक मदद दी थी। ऑस्ट्रेलिया में रिमोट एयर सर्विस सब्सिडी के तहत कम आबादी वाले और सुदूर इलाकों में नियमित सेवाएं देने वाले एयर ऑपरेटरों को सीधे वित्तीय अनुदान दिया जाता है। इसी तरह ब्राजील के कानूनों में भी क्षेत्रीय विमानन को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी का स्पष्ट कानूनी प्रावधान रखा गया है।
भारत का उड़ान मॉडल भी इसी अंतरराष्ट्रीय पद्धति पर आधारित है। इसके तहत केंद्र और राज्य सरकारों के साझा सहयोग से एयरलाइंस की परिचालन लागत को कम किया जाता है। इस व्यवस्था में हवाई अड्डा संचालक विमानों से लैंडिंग और पार्किंग शुल्क नहीं लेते, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण टर्मिनल नेविगेशन और लैंडिंग शुल्क माफ रखता है, और केंद्र तथा संबंधित राज्य सरकारें विमान ईंधन पर लगने वाले विभिन्न करों में विशेष छूट प्रदान करती हैं।
विमानन मामलों के जानकार विपुल सक्सेना का कहना है कि जब सरकार इतने विशाल पैमाने पर बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं की नींव रखती है, तो उसका दृष्टिकोण तात्कालिक मुनाफे या वित्तीय लाभ तक सीमित नहीं होता। ठीक वैसे ही जैसे सड़क बनाते समय यह हिसाब नहीं लगाया जाता कि निवेश की गई पूरी लागत कितने वर्षों में वसूल होगी। हालांकि, उनका यह भी मानना है कि इस योजना को टिकाऊ बनाने के लिए यह गहन समीक्षा जरूर की जानी चाहिए कि नया हवाई अड्डा किस स्थान पर बने और वहां की भौगोलिक परिस्थितियों व मांग के अनुसार किस श्रेणी के विमानों का संचालन व्यावहारिक रहेगा।



















