झारखंड के जमशेदपुर स्थित साकची के बाराद्वारी कुम्हारपाड़ा में दीपावली की तैयारियों के बीच चाक की गति इस बार कई सवालों और चिंताओं से घिरी है। अपने छोटे से कार्यस्थल पर पुराने गीतों की आवाज के बीच मिट्टी को आकार देते हेमंत कुमार पिछले करीब 45 वर्षों से इस पुश्तैनी हुनर को जीवित रखे हुए हैं। उनके दादा और पिता ने जिस परंपरा को जीवन भर सींचा, हेमंत उसे अपनी पहचान और पूर्वजों की अमानत मानते हुए आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन रोशनी के इस पावन पर्व पर दूसरों के घरों को जगमगाने वाले इन कारीगरों के अपने घरों में भविष्य को लेकर अनिश्चितता का अंधेरा गहरा रहा है। हेमंत को डर है कि मिट्टी की बढ़ती कीमतें, सरकारी मदद का अभाव और दिन-रात के पसीने के मुकाबले बेहद कम मुनाफा उनके बाद इस परंपरा की कड़ी को हमेशा के लिए तोड़ देगा।
दीपावली पर बढ़ती लागत और मौसम की मार
कुम्हारों के सामने सबसे बड़ा संकट निर्माण की लगातार बढ़ती लागत है। पहले जिस चिकनी मिट्टी को पाना आसान था, अब वही कच्चा माल हासिल करने के लिए भारी रकम चुकानी पड़ रही है। इसी तरह बर्तनों और दीयों को पकाने के लिए जरूरी लकड़ी तथा कोयले के दाम भी आसमान छू रहे हैं। चाक पर गीली मिट्टी को सटीक रूप देने, फिर उसे सुरक्षित सुखाने और भट्टी में सावधानीपूर्वक पकाने में कई हफ्तों का कड़ा परिश्रम लगता है। इसके विपरीत जब उत्पाद बाजार में पहुंचता है, तो खरीदार अक्सर मोलभाव करते हैं, जिससे लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। संजय कुमार ने बताया कि इस बार मिट्टी की कीमत करीब तीन गुना तक बढ़ गई है। इसके साथ ही आसमान में बादलों का डेरा और लगातार हो रही बारिश ने समस्या को और गंभीर बना दिया है, क्योंकि धूप के बिना गीली मिट्टी सूख नहीं पाती और भट्टी में पकाने से पहले ही उनके टूटने या विकृत होने का खतरा बढ़ जाता है।
सजावट और रंगाई में महिलाओं का योगदान
मिट्टी के बर्तनों और खिलौनों के निर्माण में कुम्हार परिवारों की महिलाओं की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। घर की महिलाएं अपनी माताओं और सासों से यह हुनर सीखकर दीयों और कलाकृतियों पर आकर्षक रंगों तथा डिजाइनों की नक्काशी करती हैं। पर्मिला देवी का कहना है कि वे पूरे समर्पण के साथ दिन-रात एक कर दीयों और पारंपरिक खिलौनों को सुंदर रूप देती हैं, ताकि त्योहार पर लोगों के पूजाघरों और चौखटों की शोभा बढ़ सके। हालांकि उनके मन में भी यह टीस साफ दिखाई देती है कि नई लड़कियां और बहुएं इस अत्यधिक श्रमसाध्य काम में अपना जीवन खपाने को तैयार नहीं हैं, जिससे यह घरेलू दस्तकारी धीरे-धीरे सिमटती जा रही है।
पुश्तैनी काम छोड़ निजी क्षेत्र की ओर युवाओं का रुख
जमशेदपुर के कुम्हार परिवारों की चौथी पीढ़ी अपनी संस्कृति और जड़ों का सम्मान तो करती है, मगर आर्थिक वास्तविकताएं उन्हें दूसरे रास्ते चुनने पर विवश कर रही हैं। आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर रहे युवा अब निजी कंपनियों, तकनीकी क्षेत्रों और अन्य नौकरियों में अपने करियर की तलाश कर रहे हैं, जहां निश्चित आय और काम के बेहतर अवसर मिलते हैं। सोनी प्रजापति के मुताबिक उनके परिवार में भी मिट्टी के काम का यह आखिरी साल साबित हो सकता है। उनका कहना है कि मिट्टी की अनुपलब्धता, भट्टी लगाने के लिए पर्याप्त खुली जगह की कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव ने स्थिति को असहनीय बना दिया है। जब दिन-रात खटने के बाद भी सम्मानजनक आमदनी और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती, तो नई पीढ़ी के लिए इस पेशे को अपनाना व्यावहारिक नहीं रह जाता।
अस्तित्व बचाने के लिए बुनियादी सुविधाओं की दरकार
जमशेदपुर में वर्तमान में करीब 70 से 80 कुम्हार परिवार अपनी आजीविका चलाने के लिए इसी चाक और मिट्टी पर पूरी तरह निर्भर हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश भर में स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और पारंपरिक मिट्टी के दीये जलाने की अपील करते रहे हैं, लेकिन धरातल पर इन कारीगरों को ठोस सहायता की कमी खल रही है। कारीगरों का स्पष्ट मानना है कि अगर उन्हें सस्ती दर पर कच्ची मिट्टी, रियायती ईंधन, बर्तन पकाने के लिए सुरक्षित स्थान और सीधे बाजार तक पहुंच जैसी सुविधाएं नहीं मिलीं, तो पारंपरिक चाक की यह धुरी हमेशा के लिए थम जाएगी। हेमंत कुमार के चाक पर घूमती गीली मिट्टी आज भी विरासत की गवाही दे रही है, पर यह सवाल अनुत्तरित है कि यह कला जीवित बचेगी या संग्रहालयों का हिस्सा बन जाएगी।



















