झारखंड के जमशेदपुर शहर में रहने वाली करीब 85 वर्ष की सुमित्रा त्रिपाठी बढ़ती उम्र की बंदिशों को पीछे छोड़कर स्वस्थ और सक्रिय जीवनशैली की एक अनूठी मिसाल पेश कर रही हैं। आधुनिक दौर में जहां बहुत से युवा शारीरिक श्रम और गतिविधियों से कतराते हैं, वहीं इस उम्र में भी वह अपने दैनिक कार्य खुद करने में विश्वास रखती हैं। उनकी यह अनुशासित जीवनशैली और आत्मनिर्भरता दर्शाती है कि सही आदतों से सेहत को लंबे समय तक दुरुस्त रखा जा सकता है।
भोर के 3 बजे से शुरू होती है सक्रिय दिनचर्या
सुमित्रा त्रिपाठी की सुबह किसी भी आम इंसान से काफी पहले, भोर में 3 बजे ही शुरू हो जाती है। जागने के तुरंत बाद वह सबसे पहले भगवान के अर्चन के लिए ताजे फूल तोड़ने का कार्य करती हैं। इसके बाद वह घर की रसोई में हाथ बंटाते हुए सब्जी काटना, नहाना और खुद को दिनभर के कार्यों के लिए तैयार करने जैसे काम स्वयं निपटाती हैं। इसके उपरांत वह पूरी श्रद्धा और एकाग्रता के साथ पूजा-अर्चना में लीन हो जाती हैं, जिसमें नियमित रूप से दुर्गा पाठ और हनुमान चालीसा का पाठ शामिल है।
पौष्टिक आहार और शाम की सैर का नियम
अपने स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए वह अपने आहार पर खास ध्यान देती हैं। उनके दैनिक खानपान में सूखे मेवे, ताजे मौसमी फल, मखाना, दूध, मलाई और खोवा जैसी पौष्टिक चीजें शामिल रहती हैं। दिनभर के घरेलू कामों से निवृत्त होकर वह शाम के वक्त रोजाना टहलने के लिए निकलती हैं। रात का भोजन भी वह बिल्कुल सादा रखती हैं, जिसमें दूध के साथ रोटी या चावल शामिल होता है। इसके बाद वह रात को करीब 10 बजे तक सोने चली जाती हैं, जिससे उनकी नींद का चक्र पूरी तरह नियमित बना रहता है।
दवाओं से दूरी और आध्यात्मिक सम्बल
इस उम्र में भी उन्हें किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं है और उन्हें दवाओं पर कोई पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। हालांकि, हर इंसान की शारीरिक क्षमता और जरूरतें अलग होती हैं, इसलिए उनकी यह दिनचर्या उनकी निजी जीवनशैली पर आधारित है। पति के निधन के पश्चात जब उन्हें एकाकीपन महसूस हुआ, तब उन्होंने आध्यात्मिकता का सहारा लिया। उन्होंने ईश्वर को ही अपने जीवन का केंद्र मान लिया और अपना ज्यादातर समय उपासना में लगाना शुरू कर दिया।
परिवार के साथ आत्मनिर्भर जीवन
वर्तमान में वह अपनी बेटी, दामाद और दो नातियों के साथ एक भरे-पूरे परिवार में बेहद प्रसन्नता से रह रही हैं। 85 वर्ष की उम्र में भी दूसरों पर निर्भर न रहना, एक तय समय सारिणी का कड़ाई से पालन करना और परिवार का स्नेह पाना उनके जीवन का मुख्य आधार है। उनकी यह जीवन यात्रा यह सीख देती है कि जीवन में अनुशासन, सकारात्मक दृष्टिकोण और परिवार का साथ हो तो उम्र महज एक आंकड़ा बनकर रह जाती है।





















