शारदीय नवरात्र के पावन दिनों में झारखंड के पलामू जिले में स्थित हैदरनगर का सिद्धपीठ देवी मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा और आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है। नौ दिनों के इस उत्सव में माता के दर्शन और विशेष आराधना के लिए हर रोज हजारों की संख्या में भक्त मंदिर प्रांगण पहुंच रहे हैं। केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से भी बड़ी तादाद में श्रद्धालु यहां हाजिरी लगा रहे हैं। मंदिर में आने वाले भक्त चुनरी, सिंदूर और नारियल अर्पित कर अपने घर-परिवार के लिए सुख, शांति और समृद्धि की कामना कर रहे हैं। क्षेत्रीय परंपराओं में यह गहरा विश्वास है कि इस पावन स्थल पर निष्कपट भाव से की गई हर प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है।
संतान प्राप्ति और कष्ट निवारण की मान्यता
मंदिर के मुख्य पुजारी त्यागी दास के अनुसार इस सिद्धपीठ की ख्याति के पीछे संतान सुख से जुड़ी जनआस्था एक प्रमुख वजह है। इलाके में यह मान्यता लंबे समय से चली आ रही है कि जिन दंपतियों को लंबे समय तक संतान का सुख नहीं मिल पाता, वे इस पावन दरबार में आकर विशेष मन्नत मांगते हैं। इसके अतिरिक्त कई लोग परिवार में चल रही अशांति, घरेलू समस्याओं और भूत-प्रेत से जुड़ी कथित व्याधियों से मुक्ति पाने के उद्देश्य से भी मां की चौखट पर माथा टेकते हैं। मुख्य पुजारी बताते हैं कि नवरात्र के दिनों में ऐसे मन्नतधारियों की आमद काफी बढ़ जाती है। हालांकि संतान प्राप्ति और अन्य बाधाओं से मुक्ति से जुड़े ये सभी विचार पूरी तरह से स्थानीय लोक मान्यताओं और आस्था पर आधारित हैं।
1887 से सज रहा ऐतिहासिक मेला
हैदरनगर के इस पावन स्थल पर नवरात्र के दौरान लगने वाले मेले का इतिहास भी बहुत समृद्ध है। यहां वर्ष 1887 से लगातार चैत्र और शारदीय नवरात्र के पावन पलों पर विशाल मेले का आयोजन होता आ रहा है। गुजरे 137 से अधिक वर्षों में इस स्थल की प्रसिद्धि लगातार बढ़ती चली गई, जिसके चलते यह स्थानीय स्तर से उठकर कई पड़ोसी राज्यों के श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल बन गया। उत्सव के दौरान पूरे इलाके में भक्ति और उल्लास का अद्भुत माहौल रहता है। दर्शनार्थी गर्भगृह में शीश नवाने के बाद बाहर लगे मेले में परिवार के साथ खरीदारी और आनंद उत्सव में शरीक होते हैं।
कच्चे कमरे से भव्य गुंबदनुमा मंदिर तक का सफर
इस सिद्धपीठ के निर्माण और विकास की गाथा भी बेहद दिलचस्प है। स्थानीय निवासियों की पुरानी स्मृतियों के अनुसार, बहुत पहले यहां केवल एक साधारण कच्चा कमरा हुआ करता था, जिसमें छोटी मां की पावन प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती थी। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ भक्तों के सहयोग से इस स्थल का कायाकल्प शुरू हुआ। प्रसिद्ध संत व्यास नागा बाबा के कार्यकाल के दौरान इस तीर्थ के बुनियादी ढांचे का सर्वाधिक विस्तार हुआ। उनके पश्चात मुनी बाबा ने एक लंबे अरसे तक यहां मुख्य रूप से पूजा-अर्चना का दायित्व संभाला और परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्तमान समय में यह स्थल एक भव्य गुंबदनुमा मंदिर का रूप ले चुका है। मुख्य मंदिर परिसर के भीतर ही राम-जानकी मंदिर, भगवान शिव और माता पार्वती का मंदिर तथा एक अत्यंत विशाल व प्राचीन पीपल का वृक्ष भी मौजूद है, जिसकी छाया में भक्त शांति का अनुभव करते हैं।
साझी विरासत और सद्भाव का संगम
हैदरनगर के इस सिद्धपीठ की सबसे अनुपम विशेषता यह है कि यह धार्मिक सौहार्द और परस्पर भाईचारे की जीती-जागती मिसाल पेश करता है। मुख्य मंदिर परिसर के दायरे में ही विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिरों के साथ-साथ जिन्न बाबा की मजार भी कायम है। एक ओर जहां हिंदू पुजारी पूरे विधि-विधान से मां भगवती की अर्चना और आरती संपन्न कराते हैं, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम मौलवियों की मौजूदगी में जिन्न बाबा की मजार पर फातेहा पढ़ने और चादरपोशी करने की पावन रीत भी निभाई जाती है। दोनों समुदायों का यह मिलाप सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने के साथ यह संदेश देता है कि आस्था सीमाओं और मतभेदों से परे होती है।
चीनी की मिठाई का भोग और पूजन विधान
सिद्धपीठ में आने वाले श्रद्धालुओं की पूजा विधि में भी एक खास नियम देखने को मिलता है। मां के दरबार में नारियल, सिंदूर और चुनरी चढ़ाने के साथ-साथ चीनी से तैयार की गई विशेष मिठाई को मुख्य प्रसाद के तौर पर अर्पित किया जाता है। नवरात्र के पावन दिनों में दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु इस पावन प्रसाद को ग्रहण कर अपने घरों को ले जाते हैं, ताकि परिवार के सभी सदस्यों को मां का आशीर्वाद मिल सके। इस प्रकार पलामू का यह सिद्धपीठ मंदिर अपनी सदियों पुरानी ऐतिहासिक निरंतरता, धार्मिक आस्था और गंगा-जमुनी तहजीब को आज भी पूरी निष्ठा के साथ संजोए हुए है।




















