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मचान और मल्चिंग से करेले की उन्नत खेती, बोकारो के किसान ने 70 डिसमिल में कमाया सवा लाख से अधिक मुनाफाझारखंड
19 अक्तू॰ 2026, 11:00 am (9 घंटे पहले)· 0

मचान और मल्चिंग से करेले की उन्नत खेती, बोकारो के किसान ने 70 डिसमिल में कमाया सवा लाख से अधिक मुनाफा

बोकारो जिले के पेटरवार निवासी किसान शिवनाथ ने आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रयोग कर 70 डिसमिल जमीन पर महज 30 हजार रुपये लगाकर 1.40 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमाया है।

झारखंड के बोकारो जिले में पारंपरिक खेती से अलग हटकर आधुनिक तौर-तरीकों को अपनाने वाले किसान अब खेती को लाभ का सौदा बना रहे हैं। पेटरवार प्रखंड के रहने वाले किसान शिवनाथ ने अपनी सीमित कृषि भूमि पर वैज्ञानिक विधियों का इस्तेमाल करते हुए करेले की पैदावार से शानदार मुनाफा कमाया है। उन्होंने लगभग 70 डिसमिल जमीन पर मचान और मल्चिंग तकनीक का सहारा लेकर सब्जी उत्पादन शुरू किया, जिससे न केवल उनकी फसल की गुणवत्ता सुधरी है बल्कि पैदावार में भी भारी इजाफा हुआ है। उनकी इस सफलता को देखकर क्षेत्र के अन्य ग्रामीण और किसान भी आधुनिक तकनीकों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

मोबाइल वीडियो और प्रगतिशील किसानों से मिली नई राह

एक सामान्य कृषक परिवार की पृष्ठभूमि से आने वाले शिवनाथ पहले पारंपरिक पद्धति पर ही निर्भर थे। समय के साथ उन्होंने आसपास के जागरूक किसानों को उन्नत विधियों से खेती करते देखा। इसके अलावा उन्होंने अपने मोबाइल फोन पर कृषि तकनीक से जुड़े विभिन्न वीडियो देखे और विशेषज्ञों के सुझावों को समझा। डिजिटल माध्यमों से मिली इस जानकारी ने उन्हें जोखिम उठाकर नई प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने अपनी 70 डिसमिल जमीन पर करेले की व्यावसायिक खेती का खाका तैयार किया और खेत में मचान और प्लास्टिक मल्चिंग बिछाने का काम पूरा किया।

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अगस्त में रोपाई और 70 दिनों में तुड़ाई की शुरुआत

शिवनाथ ने बताया कि उन्होंने करेले की बुवाई अगस्त के महीने में की थी। करेले की उन्नत किस्मों के अनुसार पौधों की रोपाई के लगभग 60 से 70 दिनों के भीतर पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है। एक बार फसल तैयार होने के बाद तय समयांतराल पर फलों की लगातार तुड़ाई की जा सकती है, जिससे बाजार में नियमित आपूर्ति बनी रहती है। मचान विधि के कारण फल जमीन के संपर्क में नहीं आते, जिससे उनमें सड़न या दाग-धब्बे लगने का खतरा बहुत कम हो जाता है और फल लंबे व सीधे बढ़ते हैं।

लागत, उत्पादन और मुनाफे का पूरा गणित

उत्पादन लागत और लाभ के ब्योरे को साझा करते हुए किसान ने बताया कि 70 डिसमिल जमीन पर मचान तैयार करने, मल्चिंग शीट, बीज और अन्य प्रबंधन में कुल मिलाकर लगभग 30 हजार रुपये का खर्च आया। इस रकबे से लगभग 90 से 100 क्विंटल तक करेले की कुल पैदावार प्राप्त की जा सकती है। बाजार में करेले का थोक भाव आमतौर पर 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिलता है। यदि न्यूनतम औसत भाव 20 रुपये प्रति किलोग्राम भी माना जाए, तो 90 क्विंटल करेले की कुल बिक्री से करीब 1 लाख 80 हजार रुपये की सकल आय होती है। इस पूरी आमदनी में से 30 हजार रुपये की मूल लागत और ढुलाई व परिवहन का खर्च निकालने के बाद किसान को लगभग 1 लाख 40 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा आसानी से मिल जाता है।

पोषण की कमी और कीट प्रबंधन पर विशेष सतर्कता

सब्जी की फसल को सुरक्षित रखने के लिए शिवनाथ नियमित देखभाल को जरूरी मानते हैं। उनका कहना है कि करेले के पौधों में पोषक तत्वों की कमी या कीटों के हमले से पत्तियों का पीला पड़ना एक आम समस्या है। यदि पत्तियों में पीलापन आ जाए, तो पौधों का वानस्पतिक विकास रुक जाता है और फूल-फल की क्षमता प्रभावित होती है। इससे बचने के लिए मिट्टी की प्रकृति और फसल की आवश्यकता के अनुसार संतुलित खाद डालना आवश्यक है। साथ ही खेत की लगातार निगरानी करनी चाहिए और किसी भी कीट का प्रकोप दिखने पर तुरंत कृषि विशेषज्ञों से संपर्क कर अनुशंसित दवाओं का छिड़काव करना चाहिए। सही समय पर की गई यह देखभाल न केवल उपज की गुणवत्ता बनाए रखती है, बल्कि किसान की मेहनत और कमाई को भी सुरक्षित करती है।

सवाल-जवाब

शिवनाथ ने कितने बड़े रकबे पर करेले की खेती की है?
उन्होंने बोकारो के पेटरवार प्रखंड में लगभग 70 डिसमिल जमीन पर करेले की खेती की है।
70 डिसमिल में करेला उगाने में कुल कितनी लागत आई?
इस रकबे पर मचान, मल्चिंग और बुवाई प्रबंधन में करीब 30 हजार रुपये का कुल खर्च आया।
फसल लगाने के कितने दिनों बाद करेले की तुड़ाई शुरू हो जाती है?
किस्म के आधार पर बुवाई के लगभग 60 से 70 दिनों के भीतर करेले की पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है।
70 डिसमिल से कितना उत्पादन और शुद्ध मुनाफा मिला?
इस जमीन से लगभग 90 से 100 क्विंटल उत्पादन हुआ और लागत व परिवहन खर्च काटकर करीब 1.40 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा मिला।
करेले के पत्तों में पीलापन आने का मुख्य कारण क्या है?
मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी और कीटों के प्रकोप के कारण पत्तियों में पीलापन आ सकता है, जिसके लिए विशेषज्ञों की सलाह से उचित खाद और कीटनाशक का प्रयोग करना चाहिए।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·8 घंटे पहले

तीस हज़ार में मचान और मल्चिंग दोनों हो जाना थोड़ा मुश्किल लगता है, आजकल लेबर और प्लास्टिक के दाम बहुत बढ़ गए हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 घंटे पहले

रोहन भाई, सही कहा आपने। पर क्या सच में तीस हज़ार में सारा खर्च निकल गया होगा या कोई लागत छुपा ली गई है?

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