जीवन की सबसे भयानक त्रासदियों के बीच भी जब हौसला और पारिवारिक समर्थन बना रहे, तो बड़े से बड़ा मुकाम हासिल किया जा सकता है। झारखंड के कोडरमा जिले अंतर्गत सतगावां प्रखंड के डुमरी गांव की रहने वाली प्रगति कुमारी ने इस बात को सच साबित कर दिखाया है। बचपन में झेली गई एक गंभीर पारिवारिक क्षति के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई की राह नहीं छोड़ी और अकादमिक क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बनाई है।
पारिवारिक त्रासदी और पिता का अटूट संबल
प्रगति कुमारी के परिवार पर वर्ष 2004 में दुखों का गहरा संकट आया था, जब जमीन विवाद के चलते एक सामूहिक हत्याकांड में उनके दादा कपिलदेव प्रसाद यादव सहित परिवार के चार सदस्यों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इस भयावह घटना ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया था। ऐसी कठिन और दर्दनाक परिस्थितियों के बावजूद प्रगति के पिता प्रोफेसर नरेश कुमार ने अपनी बेटी के भविष्य को संवारने का संकल्प लिया और उनकी शिक्षा में कोई बाधा नहीं आने दी। पिता के इसी मार्गदर्शन और अदम्य साहस ने प्रगति को आगे बढ़ने की निरंतर प्रेरणा दी।
राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा में शानदार प्रदर्शन
प्रगति ने जून 2026 सत्र की विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा में अंग्रेजी विषय से उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। उन्होंने कुल 300 अंकों की इस परीक्षा में 184 अंक अर्जित किए, जो 91.29 प्रतिशत बनता है। इस शानदार उपलब्धि के साथ उन्होंने न केवल सहायक प्राध्यापक पद के लिए आवश्यक पात्रता हासिल कर ली है, बल्कि शोध प्रवेश के लिए भी अर्हता प्राप्त की है। प्रगति का मानना है कि जीवन में संघर्ष और विपरीत परिस्थितियां आती रहती हैं, परंतु लक्ष्य का पीछा करते समय अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोना चाहिए।
सफलता के तीन आधारभूत सिद्धांत
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे अभ्यर्थियों के लिए प्रगति ने तीन मुख्य गुणों को अनिवार्य बताया है, जिनमें धैर्य, पूर्ण समर्पण और निरंतरता शामिल हैं। उनका कहना है कि यदि किसी अभ्यर्थी को पहले प्रयास में अपेक्षित परिणाम न मिले, तो उसे निराश होकर रुकने के बजाय दोबारा दोगुनी लगन से जुटना चाहिए। एक शांत मानसिक स्थिति के साथ लगातार परिश्रम करना और अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहना ही अंतिम सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।
माता-पिता का निरंतर त्याग और भावुक पल
परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद सबसे पहले उनके पिता प्रोफेसर नरेश कुमार ने वेबसाइट पर परिणाम देखा। बेटी की इस उपलब्धि पर भावुक होकर उन्होंने कहा कि आपने मेरा नाम रोशन किया है, और मेरे वर्षों के संघर्ष और समर्पण का फल आज मुझे प्राप्त हुआ है। पिता के इन शब्दों ने परिवार के वर्षों पुराने संताप को अपार उल्लास में बदल दिया। परीक्षा की हर घड़ी में पिता प्रगति के साथ एक मार्गदर्शक के रूप में खड़े रहे।
वहीं उनकी मां स्वर्णलता ने घरेलू स्तर पर ऐसा शांत और सहायक वातावरण तैयार किया कि प्रगति को अन्य किसी चिंता का सामना नहीं करना पड़ा। तैयारी के दौरान मां उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखती थीं, यहां तक कि पानी की आवश्यकता होने पर भी मां खुद उनकी स्टडी टेबल तक पहुंचती थीं। परिवार के इसी निस्वार्थ सहयोग ने उन्हें अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान केंद्रित करने की ताकत दी।
गुमला से बीएचयू तक की शैक्षणिक यात्रा और अध्ययन पद्धति
प्रगति कुमारी की स्कूली शिक्षा की शुरुआत गुमला जिले के बसिया से हुई थी। इसके उपरांत उन्होंने रांची स्थित सेंट जेवियर कॉलेज से अपनी 12वीं की पढ़ाई पूरी की। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का रुख किया, जहां से उन्होंने अंग्रेजी विषय में स्नातक और स्नातकोत्तर दोनों डिग्रियां प्राप्त कीं।
अपनी तैयारी की रणनीति साझा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा में दो प्रश्नपत्र होते हैं। अक्सर छात्र विषय आधारित दूसरे प्रश्नपत्र पर अधिक ध्यान देते हैं, लेकिन पहले सामान्य प्रश्नपत्र को नजरअंदाज करना भारी भूल साबित हो सकता है। इसलिए दोनों प्रश्नपत्रों के लिए संतुलित समय देना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि किसी भी गंभीर अभ्यर्थी की स्टडी टेबल पर तीन महत्वपूर्ण चीजें अनिवार्य रूप से मौजूद होनी चाहिए, जिनमें पूरा पाठ्यक्रम, पिछले वर्षों के प्रश्न पत्रों का बैंक और नियमित रिवीजन की अध्ययन सामग्री शामिल है। इससे न केवल तैयारी की दिशा स्पष्ट रहती है, बल्कि कमजोर विषयों की पहचान कर उन्हें सुधारने में भी सहायता मिलती है।



















