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पलामू के कृषि वैज्ञानिक ने दी धान में संतुलित खाद डालने की सलाह, जानें सही अनुपात और समयझारखंड
21 सित॰ 2026, 2:06 pm (1 मिनट पहले)· 0

पलामू के कृषि वैज्ञानिक ने दी धान में संतुलित खाद डालने की सलाह, जानें सही अनुपात और समय

धान की भरपूर पैदावार के लिए अंधाधुंध यूरिया डालने के बजाय नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश का सही अनुपात जरूरी है। क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि वैज्ञानिक ने तीन चरणों में खाद देने का पूरा समय चक्र समझाया है।

धान की खेती में अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए मिट्टी को सही पोषण देना सबसे बुनियादी जरूरत मानी जाती है। झारखंड के पलामू जिले में किसान बड़े पैमाने पर धान की बुवाई करते हैं और बेहतर उपज की उम्मीद में उर्वरकों का सहारा लेते हैं। इसके बावजूद कई बार खेतों में खाद का सही और संतुलित उपयोग नहीं हो पाता, जिससे पौधों के विकास और अंतिम उत्पादन दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलता है। इस समस्या से निपटने के लिए पलामू जिले के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चियांकी के कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने संतुलित पोषण प्रबंधन के वैज्ञानिक तौर-तरीकों की जानकारी साझा की है।

धान की फसल के लिए प्रमुख पोषक तत्वों का संतुलित अनुपात

फसल की शुरुआती बढ़वार से लेकर बालियों में दाना भरने तक नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश की अहम भूमिका रहती है। डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, धान की खेती में नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश का एक तय संतुलित अनुपात अपनाना बेहद आवश्यक है। सामान्य मानक के तहत चार हिस्सा नत्रजन, दो हिस्सा फास्फेटिक उर्वरक और एक हिस्सा पोटाशिक उर्वरक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि खेतों में उर्वरक डालने से पहले मिट्टी की जांच कराना और स्थानीय स्तर पर मिलने वाली कृषि सलाह के आधार पर सही मात्रा निर्धारित करना सबसे बेहतर तरीका साबित होता है।

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यूरिया की अधिकता और पोटाश की अनदेखी से नुकसान

अक्सर अधिक पैदावार लेने की होड़ में किसान नत्रजन यानी यूरिया की बहुत अधिक मात्रा खेतों में डाल देते हैं, जबकि फास्फोरस और पोटाश की मात्रा को नजरअंदाज कर दिया जाता है। कृषि वैज्ञानिक का कहना है कि कई खेतों में पोटाश का प्रयोग पर्याप्त मात्रा में बिल्कुल नहीं होता। जब फसल को नत्रजन के साथ संतुलित रूप से पोटाश और फास्फोरस नहीं मिलता, तो पौधे कमजोर होने लगते हैं। पौधों की मजबूती घटने से दाना बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और फसल में कीट व रोगों का प्रकोप तेजी से बढ़ सकता है।

लागत नियंत्रण और मिट्टी की मांग के अनुसार प्रयोग

बिना योजना और आवश्यकता से अधिक महंगे रासायनिक खादों का छिड़काव करने से किसानों की खेती की कुल लागत काफी बढ़ जाती है। केवल अधिक खाद डालने की मानसिकता छोड़कर अगर किसान मिट्टी की वास्तविक जरूरत के आधार पर संतुलित उर्वरक दें, तो खाद पर होने वाले खर्च का सदुपयोग सुनिश्चित होता है। इससे न केवल अनावश्यक आर्थिक बोझ कम होता है, बल्कि धान की गुणवत्ता और कुल पैदावार में भी स्पष्ट सुधार देखा जा सकता है।

तीन चरणों में नत्रजन देने का सही समय चक्र

उर्वरक की सही मात्रा के साथ-साथ उसे खेत में डालने का समय भी पैदावार तय करने में निर्णायक साबित होता है। डॉ. प्रमोद कुमार ने नत्रजन को एक साथ डालने के बजाय तीन अलग-अलग चरणों में बांटकर प्रयोग करने की सलाह दी है। पहले चरण के अंतर्गत रोपाई के 15 से 20 दिन के भीतर नत्रजन की एक तिहाई मात्रा दी जानी चाहिए। इसके बाद दूसरे चरण में फसल के 30 से 35 दिन के होने पर नत्रजन की दूसरी खुराक देनी चाहिए। वहीं तीसरा चरण 40 से 50 दिन के बीच आता है, जब नत्रजन की तीसरी खुराक डाली जाती है। इस समयावधि का पालन करने से पौधों की बढ़वार सुचारू रूप से होती है और बालियों में दानों का भराव बेहतर होने से कुल उत्पादन बढ़ता है।

सवाल-जवाब

धान की खेती में पोषक तत्वों का संतुलित अनुपात क्या होना चाहिए?
धान की फसल के लिए चार हिस्सा नत्रजन, दो हिस्सा फास्फेटिक उर्वरक और एक हिस्सा पोटाशिक उर्वरक का संतुलित अनुपात सबसे उपयुक्त माना जाता है।
खेतों में जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने से क्या नुकसान होता है?
यूरिया की अधिकता और पोटाश की कमी से पौधे कमजोर हो जाते हैं, दाना बनने में बाधा आती है और कीट व बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
नत्रजन को कितने चरणों में और कब-कब डालना चाहिए?
नत्रजन को तीन खुराकों में बांटकर पहले 15 से 20 दिन, फिर 30 से 35 दिन और अंत में 40 से 50 दिन के बीच देना चाहिए।
उर्वरक की सही मात्रा तय करने का सबसे अच्छा उपाय क्या है?
कृषि वैज्ञानिक के अनुसार केवल अनुमान पर खाद डालने के बजाय पहले मिट्टी की जांच कराना और स्थानीय कृषि सलाह लेना सबसे बेहतर तरीका है।
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