झारखंड के पलामू जिले में नकदी फसल के तौर पर स्ट्रॉबेरी की बागवानी का नया दौर शुरू हो रहा है। स्थानीय किसान अक्टूबर के महीने में खेतों की तैयारी और रोपाई का काम तेज कर रहे हैं। पारंपरिक फसलों के मुकाबले बेहद कम समय में फल देने वाली यह बागवानी किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का एक बड़ा जरिया बन रही है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक अगर खेत में पौधों की उचित दूरी, बेड निर्माण, ड्रिप व सिंचाई, पोषण और प्लास्टिक मल्चिंग का सही तालमेल रखा जाए, तो करीब पांच महीने के चक्र में यह फसल भरपूर मुनाफा दे सकती है।
रोपाई का सही तरीका और पौधों की आवश्यक संख्या
खेत में पौधों की बसाहट और कतार प्रबंधन स्ट्रॉबेरी की बेहतर उपज के लिए सबसे बुनियादी कदम है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार पौधों को हमेशा ऊंची मेढ़ यानी उभरे हुए बेड बनाकर लगाना चाहिए। इसमें पौधे से पौधे के बीच की दूरी लगभग 25 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए, जबकि कतार से कतार यानी लाइन से लाइन का फासला करीब 40 सेंटीमीटर निर्धारित किया गया है। इस माप के अनुसार एक एकड़ रकबे में 12 हजार से लेकर 20 हजार पौधे तक रोपे जा सकते हैं। किसान अपने खेत की बनावट, मिट्टी की स्थिति और बनाए गए बेड के आकार के आधार पर पौधों की कुल संख्या तय कर सकते हैं।
दो महीने में शुरू होगी तुड़ाई और मार्च तक जारी रहेगी आवक
अक्टूबर के पहले पखवाड़े या पूरे महीने में की गई रोपाई के बाद सामान्य परिस्थितियों में तकरीबन 50 से 60 दिनों के भीतर पौधों पर फल तैयार होने लगते हैं। अनुकूल मौसमी मिजाज और संतुलित पोषण मिलने पर फलों की तुड़ाई का यह सिलसिला मध्य मार्च तक लगातार जारी रहता है। इस पूरी अवधि में किसान मंडी की मांग और दैनिक खपत के आधार पर नियमित अंतराल में पके हुए फल तोड़कर बाजार भेज सकते हैं। इससे किसानों को लगातार पांच महीनों तक नियमित नकदी प्रवाह और बेहतर कमाई का अवसर मिलता है।
फलों की तुड़ाई का 75 फीसदी वाला पैमाना
स्ट्रॉबेरी एक बेहद नाजुक फल है, इसलिए इसकी तुड़ाई के समय का निर्धारण बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए। डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार जब फल की बाहरी सतह लगभग 75 प्रतिशत लाल रंग पकड़ ले और करीब 25 प्रतिशत हिस्सा हल्का हरा रहे, तभी उसे पौधों से अलग करना सबसे मुफीद होता है। इस अवस्था में तोड़े गए फल परिवहन के दौरान दबकर खराब नहीं होते और मंडी तक पहुंचते-पहुंचते उनकी ताजगी व चमक बरकरार रहती है। यदि किसान फल के शत-प्रतिशत लाल होने का इंतजार करेंगे, तो पेटियों में पैकिंग और ढुलाई के वक्त फल गलने या दागदार होने का जोखिम काफी बढ़ जाता है।
मल्चिंग तकनीक से नमी संरक्षण और खरपतवार पर रोक
स्ट्रॉबेरी की व्यावसायिक बागवानी में प्लास्टिक मल्चिंग का इस्तेमाल बेहद अनिवार्य माना जाता है। बेड के ऊपर मल्चिंग शीट बिछाने से खेत में अवांछित घास और खरपतवार पनपने की समस्या में भारी कमी आती है, जिससे निराई-गुड़ाई का खर्च घट जाता है। इसके अतिरिक्त मल्चिंग से मिट्टी के भीतर नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है और पानी का वाष्पीकरण रुकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि लटकते हुए फल गीली मिट्टी के सीधे संपर्क में नहीं आते, जिससे उनमें फफूंद लगने या सड़न की आशंका खत्म हो जाती है। साथ ही मल्च के नीचे पौधों की जड़ों को सांस लेने और पोषण खींचने के लिए एक आदर्श तापमान मिलता रहता है।
विंटर डॉन किस्म का चयन और संभावित कमाई का गणित
व्यावसायिक उत्पादन के दृष्टिकोण से विंटर डॉन प्रभेद को इस क्षेत्र के किसानों के लिए सबसे मुफीद माना गया है। यह किस्म स्थानीय जलवायु में बेहतर अनुकूलन दर्शाती है और उच्च गुणवत्ता वाले चमकदार फल देती है। उन्नत कृषि पद्धतियों और वैज्ञानिक प्रबंधन का पालन करके किसान एक एकड़ के खेत से लगभग 5 से 6 लाख रुपये तक की सकल आमदनी का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। हालांकि अंतिम शुद्ध लाभ फसल के कुल उत्पादन, उस समय मिलने वाले थोक व फुटकर बाजार भाव, रोपे गए पौधों की तादाद और जुताई, खाद व मजदूरी पर आई वास्तविक लागत पर निर्भर करेगा।



















