मिठाइयों की खरीदारी के लिए आमतौर पर ग्राहकों को हलवाई की दुकानों या व्यस्त बाजारों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, लेकिन झारखंड के जमशेदपुर शहर में एक विक्रेता ने इस पारंपरिक व्यवस्था को बिल्कुल बदलकर रख दिया है। शहर की गलियों में अपनी खास पहचान बना चुके 55 वर्षीय मोहम्मद कलीम पिछले 40 वर्षों से मिष्ठान भंडार को सीधे लोगों के दरवाजे तक पहुंचा रहे हैं। वह अपने ठेले पर 20 से भी अधिक किस्मों की मिठाइयां सजाकर रोजाना सुबह से रात तक शहर के विभिन्न इलाकों में घूमते हैं, जिससे स्थानीय निवासियों को घर के ठीक बाहर पसंदीदा स्वाद मिल जाता है।
सुबह छह बजे से रात आठ बजे तक का सफर
उम्र के 55वें पड़ाव में भी मोहम्मद कलीम की दिनचर्या बेहद अनुशासित और कठिन परिश्रम से भरी है। वह हर रोज सुबह करीब 6 बजे अपनी मिठाइयों से लदे ठेले को लेकर निकल पड़ते हैं और रात 8 बजे तक लगातार विभिन्न मोहल्लों में फेरी लगाते हैं। इस दौरान वह पैदल ही लगभग 25 से 30 किलोमीटर की दूरी नाप लेते हैं। किसी स्थायी दुकान के अभाव के बावजूद उन्होंने अपनी लगन और समय की पाबंदी से गलियों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
ठेले पर उपलब्ध हैं 20 से ज्यादा तरह की मिठाइयां
मोहम्मद कलीम के ठेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां किसी बड़े मिष्ठान प्रतिष्ठान की तरह विस्तृत वैरायटी मौजूद रहती है। उनके ठेले पर मुरब्बा, पेड़ा, लड्डू, मिल्क केक, मसूर पाक (मशहूर पाक), बर्फी, सोन हलवा और गाजर का हलवा मिलता है। इसके अतिरिक्त पारंपरिक और स्थानीय पसंद वाली मिठाइयां जैसे पलंगतोड़ मिठाई, अनरसा, शकरपाला और नमकीन में निमकी भी उनके पास हमेशा उपलब्ध रहती हैं। दो दर्जन के करीब इन पारंपरिक स्वादों के कारण लोगों को अलग-अलग सामान के लिए बाजार जाने की जरूरत नहीं पड़ती। चार दशकों से लगातार शुद्धता और स्वाद बनाए रखने की वजह से खरीदार आंख मूंदकर उन पर भरोसा करते हैं।
खुद तैयार करते हैं मिठाइयां, तय रूट से बंधे ग्राहक
मोहम्मद कलीम अपनी बिक्री के लिए अधिकांश मिठाइयां अपने हाथों से ही तैयार करते हैं। जिस मौसम या समय में जिस खास मिठाई की मांग अधिक देखी जाती है, वह उसी अनुपात में उसका निर्माण करते हैं और फिर ठेले पर सजाकर बिक्री के लिए निकलते हैं। पिछले 40 सालों से उनका समूचा परिवार इसी स्वरोजगार पर आश्रित है और इसी आजीविका से घर का भरण-पोषण हो रहा है। इतने वर्षों की निरंतरता का नतीजा है कि शहर में उनके ढेरों स्थायी ग्राहक बन चुके हैं, जो उनके ठेले की आहट पाते ही खरीदारी के लिए पहुंच जाते हैं।
प्रतिदिन 2000 से 3000 रुपये की बिक्री
कलीम का इलाकेवार रूट पूरी तरह से तय रहता है, जिससे स्थानीय बाशिंदों को पहले से ज्ञात होता है कि वह किस समय किस सड़क या नुक्कड़ से गुजरेंगे। कई लोग तो उन्हें रास्ते में आते देखकर ही रोक लेते हैं और पसंदीदा डिब्बे पैक करवा लेते हैं। दिनभर की कड़ी मशक्कत के बाद उनकी दैनिक बिक्री करीब 2000 से 3000 रुपये तक हो जाती है। हालांकि मौसम के मिजाज और मांग के बदलाव के चलते इस आमदनी में थोड़ा उतार-चढ़ाव भी दर्ज होता है। एक सीमित दायरे में दुकान बांधकर बैठने के बजाय पूरे शहर को अपना बाजार बनाने की उनकी यह पहल साबित करती है कि गुणवत्ता और सेवाभाव के दम पर ठेले का कारोबार भी मजबूत पहचान हासिल कर सकता है।



















