वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव के दौरान अपना सब कुछ छोड़कर राजस्थान पहुंचे सोढ़ा घराने ने पांच दशक बाद अपनी खोई हुई प्रशासनिक और सामाजिक विरासत को एक नए रूप में हासिल कर लिया है. बाड़मेर जिले में नवसृजित छाछरो ग्राम पंचायत के चुनावी दंगल में 77 वर्ष की आयु पार कर चुके पदम सिंह ने जीत हासिल कर गांव की पहली सरपंची अपने नाम की. सीमा पार सिंध प्रांत के जिस कस्बे की सियासत में कभी इस परिवार का सिक्का चलता था, उसी मूल नाम पर राजस्थान में आबाद हुए राजस्व गांव में यह जीत विस्थापन के लंबे सफर का एक भावुक पड़ाव बन गई है.
चुनावी अखाड़े में शानदार जीत और नई शुरुआत
बाड़मेर की नवगठित छाछरो ग्राम पंचायत में 24 अक्टूबर को मतदान कराया गया था. वोटों की गिनती पूरी होने पर पदम सिंह के पक्ष में 950 मत दर्ज किए गए. उन्होंने अपने सीधे मुकाबले में उतरे धना राम को 338 मतों के अंतर से शिकस्त दी, जिन्हें कुल 612 वोट मिले थे. इस स्पष्ट जनादेश के साथ पदम सिंह इस नवसृजित ग्राम पंचायत की कमान संभालने वाले प्रथम जनप्रतिनिधि बन गए हैं. बुजुर्ग पदम सिंह आज भी अपनी पहचान के साथ पैतृक कस्बे छाछरो के नाम को जोड़े रखते हैं. उनके पुत्र पुष्पेंद्र सिंह ने बताया कि यह महज एक स्थानीय चुनाव की जीत नहीं है, बल्कि उस खोई हुई पारिवारिक प्रतिष्ठा और ऐतिहासिक पहचान का पुनर्जन्म है, जिसे उनके पूर्वजों को सीमा पार छोड़ना पड़ा था.
सिंध की सत्ता में गूंजता था परिवार का नाम
भारत आने से पहले सोढ़ा परिवार की पहचान पाकिस्तान के सिंध प्रांत स्थित छाछरो क्षेत्र के एक अत्यंत रसूखदार हिंदू जमींदार घराने के रूप में थी. प्रांतीय राजनीति में इस परिवार की जड़ें बहुत गहरी थीं. पदम सिंह के परदादा ठाकुर अखिराज सिंह सोढ़ा ने वर्ष 1937 में सिंध विधानसभा के सदस्य के तौर पर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था. उनके बाद उनके पुत्र ठाकुर लाल सिंह ने भी इसी विधायी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए विधानसभा में अपनी सीट सुरक्षित की थी. इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए परिवार के प्रमुख सदस्य लक्ष्मण सिंह सोढ़ा ने पाकिस्तान की संघीय सरकार में रेलवे उपमंत्री के अहम पद की जिम्मेदारी संभाली थी.
1971 का युद्ध और भारतीय सेना को दिया गया सहयोग
इस प्रतिष्ठित घराने की तकदीर में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब दिसंबर 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा. तारीख 7 दिसंबर 1971 को जब भारतीय सेना के जांबाज जवान छाछरो इलाके में दाखिल हुए, तब लक्ष्मण सिंह सोढ़ा और उनके भाई ने सैन्य अभियान में सीधी सहायता की. उन्होंने स्थानीय रेगिस्तानी रास्तों की बारीकियां समझाईं, मार्गदर्शक की भूमिका निभाई और पाकिस्तानी रक्षा मोर्चों से जुड़ी बेहद गोपनीय रणनीतिक जानकारियां उपलब्ध कराईं. इस साहसिक सैन्य कार्रवाई की कमान 10 पैरा कमांडो बटालियन के प्रमुख और जयपुर के तत्कालीन महाराजा सवाई भवानी सिंह के हाथों में थी. भारतीय सैनिकों को दिए गए इसी खुले सहयोग ने सीमा पार परिवार के अस्तित्व पर गहरा संकट खड़ा कर दिया, जिसके चलते उन्हें अपनी जन्मभूमि को अलविदा कहना पड़ा.
भुट्टो के प्रस्ताव और वापसी के दबाव को ठुकराया
युद्ध समाप्ति के बाद सोढ़ा परिवार के लिए पाकिस्तान में टिके रहना पूरी तरह असंभव हो गया और वे सीमा लांघकर भारत आ बसे. इस पलायन के बावजूद पाकिस्तान की शीर्ष सत्ता ने उन्हें वापस बुलाने की जोरदार कोशिशें कीं. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के संस्थापक और उस समय देश के राष्ट्रपति रहे जुल्फिकार अली भुट्टो ने लक्ष्मण सिंह सोढ़ा से खुद संपर्क साधा था. भुट्टो ने उन्हें पाकिस्तान लौटने पर पूरी राजकीय सुरक्षा, सम्मान और संरक्षण मुहैया कराने की औपचारिक पेशकश की थी. पुत्र पुष्पेंद्र सिंह के अनुसार, भुट्टो की पार्टी के कई कद्दावर राजनेताओं और असरदार मजहबी शख्सियतों ने भी वापसी के लिए संदेश भेजे. यहां तक कि परिवार को मनाने के मकसद से दो विशेष हेलिकॉप्टरों के जरिए प्रतिनिधिमंडल भी भारत भेजा गया, मगर लक्ष्मण सिंह ने अपनी सुरक्षा और स्वाभिमान को तरजीह देते हुए पाकिस्तान लौटने से साफ इनकार कर दिया.
राजस्थान में नए गांव की स्थापना और पहचान की वापसी
भारत में शरण लेने के बाद सोढ़ा परिवार ने मरुधरा की जमीन पर शून्य से अपनी जिंदगी का ताना-बाना बुनना शुरू किया. कई दशकों के अनवरत प्रयासों और संघर्षों के उपरांत वर्ष 2024 में राजस्थान सरकार ने आधिकारिक तौर पर 'छाछरो' नाम से एक नए राजस्व गांव के गठन को अपनी हरी झंडी दी. अब उसी पैतृक नाम वाले गांव की पहली पंचायत के मुखिया के रूप में पदम सिंह का चुना जाना इस विस्थापित परिवार के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ है. पांच दशक पहले जो नाम सरहद पार छूट गया था, वही नाम अब बाड़मेर की प्रशासनिक व्यवस्था में शान से दर्ज हो चुका है. सिंध के सत्ता गलियारों से निकलकर राजस्थान की धरातलीय पंचायत तक पहुंचा यह सफर साबित करता है कि पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी अपनी जड़ों और स्वाभिमान की लौ कभी बुझती नहीं है.



















