बिहार के प्रमुख कपड़ा केंद्र भागलपुर में हथकरघा कारीगर अपने ऐतिहासिक हुनर को नई ऊर्जा के साथ बाजार में उतार रहे हैं। अस्सी के दशक में बेहद लोकप्रिय रही कांथा स्टिच कढ़ाई को साड़ियों पर फिर से जीवंत किया जाने लगा है। एक दौर में हाशिए पर जा चुकी यह हस्तकला अब समकालीन फैशन जगत में अपनी खास पहचान बना चुकी है। वर्तमान दौर में जब विंटेज शैलियों और पुराने फैशन का आकर्षण तेजी से बढ़ा है, तब हाथ की इस पारंपरिक कढ़ाई वाली साड़ियों की चाहत बिहार, पश्चिम बंगाल तथा विदेशी खरीदारों के बीच काफी बढ़ गई है।
खादी कॉटन और तसर सिल्क पर सुई-धागे का जादू
हथकरघा बुनकर अब्दुल्ला ओवैसी बताते हैं कि यह सूक्ष्म कारीगरी प्रमुख रूप से खादी कॉटन और पारंपरिक तसर सिल्क के कपड़ों पर की जा रही है। कांथा स्टिच पूरी तरह से सुई और धागे की मदद से हाथों द्वारा तैयार की जाने वाली शिल्प कला है। खादी कॉटन के आधार पर तैयार होने की वजह से इन साड़ियों की सबसे प्रमुख खासियत यह है कि यह परिधान गर्मियों के साथ-साथ सर्दियों के मौसम में भी पहनने के लिए बेहद आरामदायक साबित होता है। मौसम के अनुकूल होने का यह गुण इन साड़ियों को ग्राहकों के बीच और अधिक पसंदीदा बना रहा है।
निर्माण का जटिल सफर और पांच दिन की मेहनत
एक साड़ी को पूरी तरह से पहनने योग्य तैयार करने में लगभग 4 से 5 दिनों का समय लग जाता है। इस निर्माण की पूरी प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुजरती है जो काफी श्रमसाध्य है। सबसे पहले पारंपरिक लूम पर कच्चे धागों के माध्यम से सादे कपड़े की बुनाई की जाती है। इसके पश्चात कारीगर सुई और धागे की सहायता से कपड़े पर अत्यंत बारीक कांथा डिजाइन उकेरते हैं। कढ़ाई पूरी हो जाने के बाद कपड़े को रंगा जाता है और अंत में जरूरी फिनिशिंग देकर बाजार के लिए तैयार किया जाता है। पूरी प्रक्रिया हाथ से संचालित होने के कारण प्रत्येक साड़ी की बाजार दर ₹3,500 से ₹4,000 के मध्य रखी गई है।
स्थानीय महिलाओं को रोजगार और बाजार में मांग
विरासत से जुड़ी इस हस्तकला की वापसी ने भागलपुर क्षेत्र की स्थानीय महिलाओं के लिए आजीविका के बड़े साधन खोल दिए हैं, जिससे उन्हें बड़े पैमाने पर काम मिल रहा है। ऐतिहासिक रूप से बंगाल और बिहार के सांस्कृतिक परिधानों में इस शिल्प की व्यापक मांग रही है। मौजूदा समय में शिल्प प्रेमियों के बीच इस उत्पाद का रुझान इतना प्रबल है कि पश्चिम बंगाल के प्रमुख बाजारों से इसके लिए अग्रिम बुकिंग दर्ज कराई जा रही है। पुरानी सांस्कृतिक धरोहर का यह पुनरुद्धार जहां ऐतिहासिक पहचान को सहेज रहा है, वहीं बुनकर परिवारों को आर्थिक संबल भी पहुंचा रहा है।


















