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छपवा चौक पर कलाकारी का जलवा, अनोखे डिजाइनों वाले पान बेचकर हर महीने कमाते हैं 30 हजार रुपयेजीवनशैली
19 सित॰ 2026, 11:02 pm (34 मिनट पहले)· 0

छपवा चौक पर कलाकारी का जलवा, अनोखे डिजाइनों वाले पान बेचकर हर महीने कमाते हैं 30 हजार रुपये

पूर्वी चंपारण के सुगांव निवासी रामाकांत मिश्र पिछले 20 वर्षों से छपवा चौक पर विभिन्न आकृतियों के पान तैयार कर रहे हैं, जिससे उन्हें इलाके में खास पहचान और अच्छी आमदनी मिल रही है।

बिहार के चंपारण अंचल में पान की पारंपरिक परंपरा को एक नया और कलात्मक रूप देकर अपनी खास पहचान बनाई जा रही है। पूर्वी चंपारण जिले के सुगौली प्रखंड स्थित सुगांव गांव के मूल निवासी रामाकांत मिश्र पिछले दो दशकों से छपवा चौक पर अपनी दुकान चला रहे हैं। आम तौर पर मिलने वाले सामान्य तिकोने बीड़े से अलग, वे पान के पत्तों को बेहद दुर्लभ, आकर्षक और विशिष्ट आकृतियों में मोड़कर ग्राहकों के सामने पेश करते हैं। उनकी इसी विशेष रचनात्मकता ने उन्हें पश्चिम चंपारण और आसपास के समूचे इलाके में मशहूर बना दिया है, जिसके दम पर वे हर महीने 30,000 रुपये तक की सम्मानजनक कमाई कर रहे हैं।

गुझिया के आकार वाले पान की सबसे भारी मांग

रामाकांत मिश्र की दुकान पर बिकने वाले पानों में सबसे ज्यादा लोकप्रियता उस पान को मिली है, जिसकी बनावट पारंपरिक भारतीय मिठाई गुझिया से मेल खाती है। अपनी इस रचनात्मक सोच की शुरुआत के बारे में बात करते हुए वे स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने सबसे पहले यह विशिष्ट आकार गुझिया मिठाई में ही देखा था। वहीं से उनके दिमाग में यह विचार कौंधा कि क्यों न पान के पत्तों को भी ठीक इसी तरह तराशा जाए। आज स्थिति यह है कि उनकी दुकान पर सबसे अधिक संख्या में ग्राहक इसी गुझियानुमा पान की मांग करते हैं। इस खास बनावट वाले पान को चखने और खरीदने के लिए नियमित तौर पर लोगों की लंबी कतारें लगी रहती हैं।

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अशोक के पेड़ जैसी अनूठी बनावट और किसानों की पसंद

उनकी रचनात्मकता की सूची में एक और बेहद दिलचस्प नमूना शामिल है, जिसकी बनावट अशोक के पेड़ के सदृश दिखाई देती है। छपवा चौक के आसपास का ग्रामीण इलाका खेती-किसानी के लिए काफी उपजाऊ माना जाता है। रामाकांत मिश्र के अनुसार, इस पूरे कृषि क्षेत्र के स्थानीय किसान विशेष रूप से इस पेड़ जैसी बनावट वाले पान के मुरीद हैं। इसे तैयार करने का तरीका भी सामान्य पानों से काफी भिन्न और जटिल होता है। पत्तों को व्यवस्थित रूप से मोड़कर पेड़ जैसा स्वरूप दिया जाता है, जिसे खाने के बाद ग्राहक कारीगर के हुनर की सराहना किए बिना नहीं रह पाते।

मजाक में शुरू हुआ चक्रनुमा पान और पंडित जी का किस्सा

दुकान पर मिलने वाले डिज़ाइनों में एक गोल चक्रनुमा पान भी शामिल है, जिसकी शुरुआत के पीछे एक दिलचस्प वाकया जुड़ा है। रामाकांत मिश्र बताते हैं कि एक बार उन्होंने अपने एक परिचित पंडित जी को हंसी-मजाक के दौरान पान के पत्ते को गोल चक्र की शक्ल में लपेटकर दे दिया था। वह अप्रत्याशित प्रयोग पंडित जी को इतना अधिक पसंद आया कि तब से वे जब भी दुकान पर आते हैं, केवल इसी चक्रनुमा पान की मांग करते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि यदि चक्र के आकार का पान न मिले, तो वे कोई दूसरा पान खाना पसंद ही नहीं करते।

बीस साल की लगन और हुनर से बनी आत्मनिर्भर पहचान

विभिन्न प्रकार के दुर्लभ और पहले कभी न देखे गए डिजाइनों की वजह से दूर-दराज के लोग भी खास तौर पर उनकी दुकान तक पहुंचते हैं। रामाकांत मिश्र का मानना है कि बीस साल की लगातार मेहनत और सामान्य काम में कुछ नया जोड़ने की सोच ने उन्हें पूरे इलाके में एक अलग रुतबा दिलाया है। अपनी इस अनोखी विधा के चलते वे न केवल अपने ग्राहकों को स्वाद और कला का अनूठा संगम देते हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी एक सफल और आत्मनिर्भर जीवन बिता रहे हैं।

सवाल-जवाब

रामाकांत मिश्र कहां के रहने वाले हैं?
वे मूल रूप से पूर्वी चंपारण जिले के सुगौली प्रखंड के अंतर्गत सुगांव गांव के रहने वाले हैं।
वे कितने समय से और कहां अपनी पान की दुकान चला रहे हैं?
वे पिछले 20 सालों से छपवा चौक पर अपनी पान की दुकान चला रहे हैं।
पान बेचकर वे हर महीने कितना पैसा कमा रहे हैं?
अपनी इस अनोखी कलाकारी के दम पर वे हर महीने लगभग 30,000 रुपये की कमाई कर रहे हैं।
उनकी दुकान पर सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला पान कौन सा है?
उनकी दुकान पर सबसे अधिक मांग गुझिया के आकार वाले पान की है, जिसके लिए ग्राहकों की लाइन लगती है।
गुझिया जैसी आकृति वाले पान का विचार उन्हें कैसे आया?
उन्होंने इस बनावट को सबसे पहले गुझिया मिठाई में देखा था और वहीं से पान को यह आकार देने का विचार आया।
अशोक के पेड़ जैसी बनावट वाला पान कौन लोग ज्यादा खाते हैं?
छपवा के आसपास के उपजाऊ कृषि क्षेत्रों के किसान इस पेड़नुमा पान को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं।
चक्रनुमा पान की शुरुआत कैसे हुई थी?
रामाकांत मिश्र ने पहली बार एक पंडित जी को मजाक में चक्रनुमा पान बनाकर दिया था, जो उन्हें इतना पसंद आया कि वे हमेशा वही खाने लगे।
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