बिहार के दरभंगा जिले में टावर चौक की शाम हमेशा से चहल-पहल और भीड़भाड़ से भरी रहती है, लेकिन इस हलचल के केंद्र में एक ऐसा जायका मौजूद है जो हर किसी का ध्यान खींच लेता है। बाजार घूमने आने वाले स्थानीय निवासी हों या बाहर से आए पर्यटक, चौक पर मिलने वाली पारंपरिक कुल्हड़ लस्सी हर किसी की पहली पसंद बनी हुई है। शहर में यह आम धारणा बन चुकी है कि अगर कोई दरभंगा आकर टावर चौक की इस लस्सी का स्वाद न चखे, तो उसकी यात्रा अधूरी मानी जाती है।
छोटी सी मेज से शुरू हुआ दशकों पुराना सफर
टावर चौराहे के एक कोने में एक छोटी सी साधारण टेबल से लस्सी परोसने की शुरुआत हुई थी, जो आज दशकों बीत जाने के बाद भी उसी सादगी से जारी है। दुकान भले ही किसी आलीशान प्रतिष्ठान जैसी न दिखती हो, लेकिन इसके स्वाद की शोहरत पूरे इलाके में फैली हुई है। सूरज ढलते ही यहां ग्राहकों का हुजूम जुटना शुरू हो जाता है। भीड़ को सुचारू रूप से संभालने के लिए दुकान संचालक ने एक व्यवस्थित टोकन सिस्टम लागू किया हुआ है, जिसके तहत ग्राहकों को पहले पर्ची लेनी पड़ती है और फिर अपनी बारी आने का धीरज से इंतजार करना पड़ता है।
गर्मी के दिनों में बढ़ती मांग और ₹50 की कीमत
मौसम में गर्माहट आते ही इस ठंडी लस्सी की मांग कई गुना बढ़ जाती है। चिलचिलाती धूप और उमस से थके-हारे लोगों को यह घूंट न केवल तुरंत ठंडक पहुंचाता है, बल्कि ताजगी का गहरा अहसास भी कराता है। इस प्रीमियम स्वाद और भरपूर सामग्री के बावजूद एक कुल्हड़ की कीमत केवल ₹50 रखी गई है। टोकन लेने के बाद अपनी बारी की प्रतीक्षा करने वाले शौकीनों का कहना है कि लस्सी का पहला घूंट गले से नीचे उतरते ही सारा इंतजार और थकान पूरी तरह सार्थक लगने लगती है।
देसी सामग्री और मिट्टी के कुल्हड़ की सोंधी महक
इस पेय की लोकप्रियता का सबसे बड़ा राज इसकी शुद्ध और पारंपरिक तैयारी में छिपा हुआ है। इसे तैयार करने के लिए सबसे पहले गाढ़ी दही का आधार बनाया जाता है, जिसमें गाढ़ी मलाई और क्रीम का गहरा मिश्रण तैयार किया जाता है। इसके बाद लस्सी की ऊपरी सतह को काजू, पिस्ता, बारीक कटे बादाम और सुगंधित केसर के धागों से खूबसूरती से सजाया जाता है। इसे पारंपरिक मिट्टी के कुल्हड़ में परोसा जाता है, जिससे लस्सी में सोंधी मिट्टी की महक समा जाती है और इसका देसी स्वाद कई गुना बढ़ जाता है।
शहर की खान-पान संस्कृति का अटूट हिस्सा
दफ्तर से घर लौटते कामकाजी लोग, कक्षाओं के बाद दोस्तों संग आए कॉलेज छात्र और शाम को खरीदारी के लिए निकले परिवार इस दुकान पर सहज ही रुक जाते हैं। एक बेहद सीमित जगह से शुरू हुआ यह छोटा सा कारोबार अब टावर चौक की पहचान का अनिवार्य अंग बन चुका है। दरभंगा के निवासियों के लिए यह महज एक पेय पदार्थ नहीं है, बल्कि उनकी रोजमर्रा की शाम और शहर की मीठी यादों से जुड़ा एक आत्मीय अनुभव है।


















