दुनिया के सबसे महंगे मसालों में शुमार और अपनी अनूठी खुशबू के लिए पहचाना जाने वाला केसर अब केवल कश्मीर की वादियों तक ही सीमित नहीं रहा है। बाजार में 3 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकने वाले इस बेशकीमती लाल सोने को अब आप अपने घर के गमलों में भी बेहद आसानी से उगा सकते हैं। बागवानी के शौकीन लोग अपनी बालकनी या छत पर ही शुद्ध केसर की पैदावार ले सकते हैं, जिसके लिए किसी बहुत बड़े खेत की जरूरत नहीं होती है बल्कि कुछ बुनियादी बातों और सही तकनीक का ध्यान रखना काफी होता है।
इस खास गार्डनिंग तकनीक को गहराई से समझने के लिए पंपोर के अनुभवी किसान गुलम मोहम्मद से बातचीत की गई है। पंपोर को भारत का केसर का कटोरा कहा जाता है, जहाँ की जलवायु इस फसल के अनुकूल मानी जाती है। जानकारों का यह मानना बिल्कुल गलत है कि केसर केवल बर्फीले इलाकों में ही पनप सकता है, क्योंकि सही समय पर थोड़ी सी देखरेख करके इसे किसी भी उपयुक्त स्थान पर गमले में तैयार किया जा सकता है।
घर पर केसर उगाने की शुरुआत करने के लिए सबसे पहला और अहम चरण सही सामग्री का चयन करना होता है। केसर किसी बीज के माध्यम से नहीं उगता है, बल्कि इसके लिए विशेष रूप से केसर बल्ब या कंद की आवश्यकता होती है। नर्सरी से खरीदारी करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि बल्ब पूरी तरह से स्वस्थ, ठोस और आकार में बड़े हों। जितने मजबूत और बड़े बल्ब होंगे, भविष्य में उतने ही अधिक और खूबसूरत बैंगनी रंग के फूल पौधे से प्राप्त होंगे।
रोपाई के लिहाज से सही महीने का चुनाव करना सफलता की कुंजी है। भारत में अगस्त से अक्टूबर के बीच का समय केसर के बल्ब जमीन या गमले में लगाने के लिए सबसे बेहतरीन माना जाता है। इसके अलावा, मिट्टी तैयार करते वक्त जल निकासी का विशेष ख्याल रखना जरूरी है ताकि पानी बिल्कुल न रुके। पॉटिंग मिक्स तैयार करने के लिए आधी सामान्य बगीचे की मिट्टी, तीस प्रतिशत वर्मीकंपोस्ट या पुरानी गोबर की खाद और बीस प्रतिशत महीन बालू रेत या कोकोपीट को अच्छी तरह मिला लेना चाहिए। यह मिश्रण जड़ों को मजबूती प्रदान करता है।
रोपाई का काम पूरा होने के बाद गमले को सही स्थान पर रखना बेहद आवश्यक होता है। केसर के पौधों को तेज और भरपूर धूप की आवश्यकता होती है, इसलिए इन्हें छत या बालकनी के ऐसे कोने में रखें जहाँ दिन में पांच से छह घंटे की सीधी धूप मिलती रहे। सिंचाई के मामले में बहुत सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि इन्हें अत्यधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। अधिक नमी से बल्ब सड़ सकते हैं, इसलिए जब ऊपरी एक इंच मिट्टी सूखी दिखे, तभी पानी का छिड़काव करें।
जैसे-जैसे ठंड का मौसम शुरू होता है और तापमान में गिरावट आती है, पौधों की ग्रोथ बहुत तेजी से होने लगती है। नवंबर से दिसंबर के बीच हरे पत्तों के बीच बेहद आकर्षक बैंगनी रंग के फूल खिलने लगते हैं। इन्हीं फूलों के केंद्र में लाल रंग के तीन बारीक धागे होते हैं, जिन्हें स्टिग्मा कहा जाता है और यही असली तथा शुद्ध केसर होता है। जब फूल पूरी तरह से खिलकर तैयार हो जाएं, तो सुबह के वक्त उन्हें बेहद नरमी के साथ पौधे से अलग कर लेना चाहिए।
फूल तोड़ने के बाद चिमटी की सहायता से उन तीनों लाल धागों को सावधानीपूर्वक बाहर निकाल लेना चाहिए। इसके पश्चात इन धागों को दो से तीन दिनों तक छांव में किसी साफ सूती कपड़े या बटर पेपर पर रखकर सुखाना चाहिए। जब ये पूरी तरह सूख जाएं, तो इन्हें एयरटाइट कांच की शीशी में सुरक्षित रख सकते हैं। घर पर उगाया गया यह शुद्ध केसर न केवल खाने का स्वाद और रंग बढ़ाता है, बल्कि मिलावटी उत्पादों से भी बचाता है।



















