पहाड़ी क्षेत्रों में कुदरती तौर पर लहलहाने वाला सीताफल अब घरेलू बगीचों और छतों पर भी आसानी से लगाया जा सकता है। अक्सर लोग गमले में इसका पौधा तो लगा लेते हैं, लेकिन शिकायत रहती है कि फूल खिलने के बाद भी डालियों पर फल नहीं टिकते। बागवानी के जानकारों के अनुसार, इस पौधे की सही देखभाल न होने पर पत्तियां तो हरी-भरी रहती हैं मगर उपज नहीं मिल पाती। सिरोही के तपोवन से जुड़े बीके ललनभाई का कहना है कि घर में सही तकनीक और थोड़ी सूझबूझ अपनाकर इस पौधे से भरपूर और मीठे फल लिए जा सकते हैं।
मिट्टी का सही मिश्रण और गमले का चुनाव
सीताफल के स्वस्थ विकास की नींव उसकी मिट्टी पर टिकी होती है। गमले में पौधा रोपने के लिए हमेशा ऐसी भुरभुरी मिट्टी तैयार करनी चाहिए, जिससे फालतू पानी फौरन बाहर निकल जाए। इसके लिए सामान्य बगीचे की मिट्टी में अच्छी तरह से गली-सड़ी गोबर की खाद अथवा केंचुआ खाद यानी वर्मी कंपोस्ट मिलाना बेहतरीन रहता है। मिट्टी में हवा के संचरण और नमी के संतुलन को बनाए रखने के लिए थोड़ा कोकोपीट या साफ रेत मिलाना बहुत फायदेमंद साबित होता है।
शुरुआती दौर में नन्हें पौधे को रोपने के लिए 12 से 14 इंच चौड़ा गमला बिल्कुल मुफीद रहता है। जैसे-जैसे पौधा अपनी जड़ें फैलाए और बड़ा होने लगे, तब उसे 18 से 20 इंच के बड़े गमले में बदल देना चाहिए। गमले की तली में निकासी छेद होना बेहद अनिवार्य है ताकि बरसात का पानी उसमें जमा न रहे। जड़ों में रुका हुआ पानी पौधे को कमजोर बनाकर सड़ाने लगता है, जिससे उसकी पूरी बढ़त थम जाती है।
धूप की उपलब्धता और सिंचाई का सटीक तरीका
सीताफल को अच्छी तरह फलने-फूलने के लिए भरपूर प्राकृतिक रोशनी की दरकार होती है। पौधे को आंगन या छत पर ऐसे खुले स्थान पर रखना चाहिए जहां दिनभर सीधी धूप आती हो। छांव वाली जगह पर रखने से पौधे की शाखाएं तो बढ़ सकती हैं, लेकिन उसमें फल लगने की संभावना काफी कम हो जाती है।
सिंचाई के मामले में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि रोजाना जरूरत से अधिक पानी डालना पौधे के लिए बेहद घातक है। जब गमले की ऊपरी सतह की मिट्टी छूने पर सूखी नजर आए, तभी उसमें पानी देना चाहिए। बरसात के दिनों में जब हवा में पहले से नमी हो, तब सिंचाई एकदम सीमित कर दें। हालांकि जब पौधे पर कलियां खिल रही हों और छोटे फल बंध रहे हों, उस नाजुक दौर में गमले की मिट्टी में हल्की नमी लगातार बनी रहनी चाहिए।
संतुलित खाद और नियमित कटाई-छंटाई
पौधे की समग्र सेहत को दुरुस्त रखने के लिए समय-समय पर जैविक खाद का प्रयोग करना चाहिए। गमले में लगे बड़े पौधे को उसकी उम्र, मिट्टी की स्थिति और स्थानीय मौसम को देखते हुए ही पोषण देना उचित रहता है। जब पौधे पर फूल आने का समय हो, तब फास्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्वों की खुराक पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आवश्यकता से ज्यादा खाद झोंकने के बजाय पौधे की वास्तविक जरूरत को समझकर ही पोषण देना समझदारी है।
इसके साथ ही पौधे की कमजोर, उलझी हुई और सूखी टहनियों को समय पर काटकर अलग करते रहना चाहिए। छंटाई का उपयुक्त समय और तरीका पौधे की किस्म तथा स्थानीय आबोहवा के हिसाब से तय होता है। सही प्रूनिंग से पौधे में नई टहनियां तेजी से फूटती हैं, जिन पर नई कलियां और फल जल्दी आने लगते हैं।
हाथ से परागण की खास तकनीक
सीताफल के उत्पादन में सबसे दिलचस्प और पहेलीनुमा पहलू इसके फूलों का परागण तंत्र है। इसके एक ही फूल में नर और मादा दोनों जनन अंग मौजूद होते हैं, किंतु दोनों का सक्रिय समय अलग-अलग होता है। यही मुख्य वजह है कि ढेरों फूल आने के बावजूद फल बहुत कम बनते हैं या फूल गिर जाते हैं। इस पेचीदा समस्या से निपटने के लिए एक बारीक ब्रश की मदद से हाथ से परागण कराना बेहद कारगर उपाय है। इसके जरिए एक फूल के परागकणों को दूसरे उपयुक्त और सक्रिय फूल के मादा हिस्से तक पहुंचाकर आसानी से फल की स्थापना सुनिश्चित की जा सकती है।


















