सड़क किनारे सफर करते हुए अक्सर कई तरह के स्थानीय पकवान देखने को मिलते हैं, लेकिन राजस्थान के करौली में इन दिनों एक बेहद अनोखी मिठाई चर्चा का विषय बनी हुई है। नेशनल हाईवे-23 से गुजरने वाले मुसाफिरों की नजर सड़क किनारे ठेलों पर सजी एक विशालकाय, पहाड़ जैसी आकृति वाली मिठाई पर टिक जाती है। करीब तीन दशक पुरानी परंपरा से जुड़ी इस पारंपरिक मिठाई का नाम पंचमेवा है, जिसे उत्तर प्रदेश से आए व्यापारी अनोखे अंदाज में तैयार कर राहगीरों को परोस रहे हैं। दुकानों और भीड़भाड़ वाले बाजारों के बजाय सीधे राजमार्ग के किनारे की जा रही इस बिक्री ने स्थानीय निवासियों के साथ दूरदराज से आने-जाने वाले वाहन चालकों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है।
सड़क किनारे ठेलों पर 9 से 10 व्यापारियों का डेरा
करौली जिले से गुजरने वाले नेशनल हाईवे-23 पर पिछले लगभग एक सप्ताह से यह मिठाई बेची जा रही है। उत्तर प्रदेश से आए करीब 9 से 10 विक्रेता अलग-अलग स्थानों पर अपने ठेले लगाकर इस पारंपरिक मिष्ठान की बिक्री कर रहे हैं। सफर के दौरान जैसे ही वाहन सवार इस विशालकाय मिठाई को देखते हैं, वे उत्सुकता के चलते गाड़ियां रोक लेते हैं। कई लोग इसे केवल देखने और इसके बनने का तरीका जानने के लिए रुकते हैं, जबकि बहुत से राहगीर इसका स्वाद चखने के बाद अपने गंतव्य के लिए पैक भी करवा रहे हैं। सड़क किनारे इस तरह का बड़ा ढांचा सजाकर बेचना ही इस व्यापार की सबसे बड़ी रणनीति साबित हो रही है।
मेवों और सूजी से तैयार होती है पारंपरिक मिष्ठान
इस मिठाई की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण इसमें शामिल की जाने वाली सामग्री और इसका बनाने का विशेष तरीका है। उत्तर प्रदेश के सजानपुर से करौली पहुंचे व्यापारी राजीव सिंह, जो पिछले करीब 10 सालों से इस काम में जुटे हैं, बताते हैं कि पंचमेवा को तैयार करने में कई तरह के मेवों और पारंपरिक घटकों का इस्तेमाल होता है। इसे बनाने की मुख्य सामग्री में नारियल का बुरादा, छुहारा, इलायची, बादाम, किशमिश, चेरी और मूंगफली शामिल हैं। इसके साथ ही इसमें सूजी और शक्कर को मिलाकर खास अनुपात में पकाया जाता है। सभी चीजों को एक साथ गूंथकर और जमाकर इसे एक बड़ा टीले या पहाड़ जैसा रूप दिया जाता है, जो दूर से ही लोगों को आकर्षित करता है।
दो से तीन दिन की कड़ी मेहनत में बनती है एक खेप
व्यापारी राजीव सिंह के अनुसार, इस मिठाई की एक पूरी खेप तैयार करने में करीब दो से तीन दिन का लंबा वक्त लगता है। उनका कहना है कि इस मिठाई का स्वाद लगभग 20 से 30 साल पुरानी मिष्ठान परंपरा का हिस्सा है। मेवों को सही अनुपात में पकाने और उन्हें विशाल आकार में सुरक्षित बांधकर रखने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। यही वजह है कि इसका पहाड़ जैसा भारी-भरकम आकार इसे बाजार की आम मिठाइयों की तुलना में बिल्कुल अलग और अनूठा बनाता है।
हाईवे किनारे बिक्री का अनोखा मॉडल
पंचमेवा को बेचने के लिए किसी पक्की दुकान का सहारा नहीं लिया जाता। व्यापारी अखिलेश सिंह का कहना है कि उनकी बिक्री का तरीका पारंपरिक हलवाई की दुकानों से बिल्कुल जुदा है। वे देश के अलग-अलग राज्यों और नेशनल हाईवे के किनारों पर जाकर ठेले लगाते हैं। हाईवे पर लंबा सफर करने वाले मुसाफिर अक्सर कुछ नया और ताजा खाने की तलाश में रहते हैं। जब उनकी नजर इतने बड़े आकार की मिठाई पर पड़ती है, तो वे कौतूहलवश रुकते हैं और पूछताछ करते हैं। अखिलेश सिंह के मुताबिक, यही भारी-भरकम बनावट और हाईवे का खुला माहौल उनके कारोबार का सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका है। करौली में इस समय लगभग 10 ठेलों पर यह मिठाई स्थानीय लोगों और राहगीरों के बीच खूब पसंद की जा रही है।


















