उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ की पहचान वहां के पारंपरिक खानपान से भी जुड़ी है, जिसमें कालिका मटन का नाम सबसे आगे आता है। अपने गहरे जायके और पकाने की अनोखी शैली के कारण यह पूरे पूर्वांचल में बेहद पसंद किया जाता है। मांसाहारी व्यंजनों के शौकीन जब भी इस क्षेत्र से गुजरते हैं, तो इस पारंपरिक मटन का स्वाद लेने जरूर रुकते हैं। कई राज्यों से लोग खासतौर पर इसका जायका चखने आजमगढ़ पहुंचते हैं। अगर आप भी होटल जैसा वही पारंपरिक स्वाद अपनी रसोई में आजमाना चाहते हैं, तो इसकी पूरी विधि और बारीकियों को समझना बेहद आसान है।
कालिका मटन की असली पहचान और पकाने का सिद्धांत
इस व्यंजन की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें पहले से तैयार ग्रेवी का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता। सामान्य तौर पर होटलों में ग्रेवी अलग से तैयार रहती है, लेकिन यहां मटन और उसकी तरी शुरुआत से अंत तक एक साथ पकते हैं। होटल संचालक लक्ष्मी चौहान के अनुसार, मटन के साथ ही सामग्री को धीमी गति से पकाया जाता है ताकि गोश्त का रस और मसालों का सोंधापन एकसार हो सके। इसमें किसी भी तरह के डिब्बाबंद या बाजारू पिसे मसालों के बजाय घर में भुने साबुत मसालों और शुद्ध सरसों के तेल का उपयोग किया जाता है।
तैयारी के लिए जरूरी सामग्री
इस प्रामाणिक मटन डिश को बनाने के लिए बेहद चुनिंदा और शुद्ध चीजों की आवश्यकता होती है। मुख्य सामग्री में शामिल हैं
- ताजा मटन: अच्छी गुणवत्ता वाला मटन, जिसे साफ करके तैयार रखा जाए।
- शुद्ध सरसों का तेल: पारंपरिक देसी स्वाद पाने के लिए सरसों का तेल अनिवार्य है।
- कटा हुआ ताजा प्याज: ग्रेवी को गाढ़ा आधार देने के लिए भरपूर मात्रा में बारीक या लच्छेदार कटा प्याज।
- बारीक कटा अदरक: ताजे अदरक के बारीक टुकड़े जो स्वाद को तीखापन और महक देते हैं।
- घर के भुने खड़े मसाले: साबुत मसालों को तवे या कड़ाही पर हल्का भूनकर ताजा पीसा जाता है।
कदम दर कदम पकाने की प्रामाणिक विधि
इस मटन को तैयार करने की प्रक्रिया धैर्य और सटीक आँच पर निर्भर करती है। सबसे पहले पकाने वाले बर्तन में ताजा मटन और कटी हुई प्याज को एक साथ डाला जाता है। लक्ष्मी चौहान बताते हैं कि प्याज और मटन को धीमी आंच पर घंटों तक लगातार पकाया जाता है। इस धीमी प्रक्रिया के दौरान प्याज पूरी तरह से गलकर मटन के साथ एक गाढ़ी, सोंधी ग्रेवी में तब्दील हो जाता है।
जब प्याज और मटन अच्छी तरह आपस में रच-बस जाएं, तब इसमें बारीक कटा हुआ ताजा अदरक और घर पर हल्के भुने खड़े मसालों का ताजा मिश्रण मिलाया जाता है। इसके बाद भी आंच को धीमा ही रखा जाता है और मटन को लगातार पकने दिया जाता है। इसे तब तक पकाया जाता है जब तक कि मटन पूरी तरह गल न जाए और मिश्रण से शुद्ध तेल अलग होकर ऊपर न तैरने लगे।
लकड़ी के चूल्हे का महत्व और देसी महक
कालिका मटन की सबसे बड़ी यूएसपी इसे पकाने का पारंपरिक माध्यम है। जहां आधुनिक खानपान पूरी तरह गैस चूल्हों पर निर्भर हो चुका है, वहीं आजमगढ़ में इसे लकड़ी के चूल्हे पर पकाने की परंपरा कायम रखी गई है। लक्ष्मी चौहान का कहना है कि लकड़ी की धीमी आंच और उससे उठने वाला धुआं मटन में एक खास देसी सोंधापन भर देता है, जो गैस पर नहीं मिल पाता। अगर संभव हो तो घर पर भी इसे अंगीठी या लकड़ी के चूल्हे पर बनाया जा सकता है। मटन के पूरी तरह तेल छोड़ने के बाद यह परोसने के लिए तैयार हो जाता है, जिसे गरमा-गरम रोटी या चावल के साथ परिवार के बीच परोसा जा सकता है।



















