खरीफ मौसम की प्रमुख फसल धान की अगेती और हाइब्रिड किस्मों की कटाई का काम इन दिनों जौनपुर तथा आसपास के इलाकों में तेजी से चल रहा है. खेतों से उपज समेटने के बाद किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दाने को सुरक्षित रखने की होती है. कई बार किसान अपनी कुल उपज का एक हिस्सा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर बेच देते हैं, जबकि परिवार की जरूरतों और भविष्य में बेहतर दाम मिलने की उम्मीद में एक बड़ा हिस्सा घरों या गोदामों में बचाकर रख लेते हैं. अगर इस उपज को सही ढंग से नहीं रखा गया, तो घुन और दूसरे कीट पूरी मेहनत पर पानी फेर सकते हैं.
नमी पर नियंत्रण ही है सुरक्षित भंडारण की पहली शर्त
अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी कदम कटाई के तुरंत बाद उसकी अच्छी तरह से सुखाई करना है. उप परियोजना निदेशक, आत्मा, डॉ. रमेश चंद्र यादव के मुताबिक किसानों को धान को धूप में सुखाकर उसमें नमी का स्तर 10 से 12 प्रतिशत के बीच लाना चाहिए. जब दानों में तय सीमा से अधिक नमी रह जाती है, तो फफूंद, घुन और अन्य सूक्ष्म जीवाणु तेजी से पनपने लगते हैं. इससे दाने सड़ने लगते हैं और बाजार में उनकी गुणवत्ता गिरने से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.
अनुदानित बखारी और बोरों के इस्तेमाल से मिलेगी मदद
फसल को सुरक्षित रखने के लिए कृषि विभाग की ओर से 50 प्रतिशत अनुदान पर बखारी (कंटेनर) और विशेष बोरे उपलब्ध कराए जाते हैं. विशेषज्ञ इन सरकारी रियायतों का लाभ उठाकर आधुनिक भंडारण साधनों का उपयोग करने की सलाह देते हैं. यदि किसान पारंपरिक बखारी में अनाज जमा कर रहे हैं, तो उन्हें जिंक फॉस्फाइड का इस्तेमाल करना चाहिए. इस दवा को एक सूती कपड़े में सुरक्षित बांधकर बखारी के ठीक बीच में रखना होता है. इसके बाद बखारी का ढक्कन लगाकर किनारों को गीली मिट्टी से पूरी तरह सील कर देना चाहिए ताकि हवा का आना-जाना बंद हो सके और दवा का असर भीतर बना रहे.
बोरों में भंडारण और कमरे के कीटाणुशोधन का सही तरीका
यदि किसान धान को जूट या प्लास्टिक के बोरों में भर रहे हैं, तो उन बोरों को पहले मैलाथियान दवा के घोल से उपचारित करना अनिवार्य है. इसके अलावा बोरों को कमरे की दीवार से सटाकर रखने के बजाय दीवार से कम से कम 2 फीट की दूरी पर चट्टे लगाकर रखना चाहिए, जिससे सीलन से बचाव हो सके. भंडारण कक्ष को कीटमुक्त करने के लिए कमरे में जिंक फॉस्फाइड का धुआं भी किया जाना चाहिए. इन वैज्ञानिक पद्धतियों का पालन करके किसान अपनी फसल को अगले साल तक बिना किसी खराबी के सुरक्षित रख सकते हैं और उचित दाम आने पर बेच सकते हैं.



















