मानसून का मौसम केवल खेतों में फसल की रोपाई के लिए ही नहीं, बल्कि घर की छत, किचन गार्डन और आंगन में ताजी सब्जियां उगाने के लिए भी एक बेहतरीन अवसर माना जाता है। खासकर बेल वाली फसलों को अगर जमीन पर फैलाने के बजाय ऊपर उठाकर मचान का सहारा दिया जाए, तो बेहद सीमित जगह में भी बंपर पैदावार हासिल की जा सकती है। खेती-किसानी के जानकार अंशुमान सिंह के मुताबिक, बारिश के इस सीजन में लौकी, तोरई या गिलकी, करेला, खीरा और सेम जैसी सब्जियों को मचान विधि से आसानी से उगाया जा सकता है। इसके अलावा, जरूरत के हिसाब से मचान के ऊपर ग्रीन शेड या शेड नेट का इस्तेमाल करके पौधों को भारी बारिश और सीधी धूप के कड़े असर से भी बचाया जा सकता है।
मचान तैयार करने के लिए जरूरी सामान
घर की छत या छोटे किचन गार्डन में मचान का ढांचा तैयार करने के लिए बहुत ज्यादा महंगे या जटिल उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती है। खेत, खुले बैकयार्ड या छत पर बांस, लोहे के पाइप या मजबूत जीआई पाइप की मदद से एक ढांचा खड़ा किया जाता है। इसके ऊपरी हिस्से पर नायलॉन की मजबूत रस्सी, प्लास्टिक कोटेड वायर, जीआई वायर या फिर विशेष ट्रेलिस नेट बांधा जाता है, जिस पर बेलें आसानी से अपनी पकड़ बना सकें। टेरेस पर रखे गमलों या ग्रो बैग्स के दोनों किनारों पर मजबूत पाइप गाड़कर ऊपर जालीनुमा व्यवस्था बनाई जा सकती है। यह ढांचा इतना मजबूत होना चाहिए कि वह हरी-भरी बेलों, लटकते फलों और बारिश के दौरान नमी के कारण बढ़ने वाले अतिरिक्त वजन को आसानी से सहन कर सके।
खेत, बगिया और टेरेस पर मचान बनाने की विधि
खुले खेतों या बड़ी बगिया में दो से तीन मीटर की निश्चित दूरी पर मजबूत बांस या खंभे जमीन में गाड़ दिए जाते हैं, जिन्हें ऊपर की तरफ से पाइप या तारों की मदद से आपस में कस दिया जाता है। इसके बाद इनके ऊपर ट्रेलिस नेट या मजबूत रस्सियों का जाल बिछाया जाता है। पौधों को मचान के ठीक नीचे या उसकी परिधि के पास लगाया जाता है, और शुरुआती दिनों में बेलों को हल्के हाथों से सहारा देकर जाल तक पहुंचाया जाता है। अगर आप टेरेस गार्डनिंग कर रहे हैं, तो भारी और स्थायी ढांचा बनाने के बजाय हल्के लेकिन टिकाऊ पाइपों और नेट का चयन करना बेहतर रहता है। इस दौरान यह बात विशेष रूप से ध्यान रखनी चाहिए कि गमलों या ग्रो बैग्स में पानी बिल्कुल न रुके, क्योंकि मानसून में लगातार जलभराव होने से पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं।
लौकी और तोरई की खेती के लिए बेहतरीन विकल्प
मानसून के समय का आर्द्र वातावरण और नमी लौकी की बेल के विकास के लिए बहुत ही अनुकूल साबित होती है। जब लौकी की बेल को मचान पर चढ़ाया जाता है, तो उसका फैलाव ऊपर की तरफ होता है और फल सुरक्षित रूप से जमीन से ऊपर लटकते रहते हैं। यही फायदा तोरई या गिलकी की फसल में भी मिलता है। मिट्टी के सीधे संपर्क में न आने के कारण फल सड़ने की संभावना काफी हद तक कम हो जाती है। इन दोनों ही लोकप्रिय फसलों में आमतौर पर पहली तुड़ाई करीब 50 से 70 दिनों के भीतर शुरू हो जाती है, जिससे घर की जरूरतें आसानी से पूरी होने लगती हैं।
करेला और खीरा उगाने के खास टिप्स
बरसात के दिनों का गर्म और उमस भरा मौसम करेले की बेल को तेजी से बढ़ाने में मदद करता है। मचान पर इस बेल को फैलाने से पौधे को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, जिससे कीटों से बचाव होता है और फलों की पहचान तथा तुड़ाई का काम भी आसान हो जाता है। यदि सही देखभाल की जाए, तो करेले की पहली फसल लगभग 45 से 60 दिनों के अंदर तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके अलावा, अगर आप कम से कम समय में ताजी सब्जी पाना चाहते हैं, तो खीरा एक शानदार विकल्प है। मानसून की अनुकूल परिस्थितियों के बीच खीरे की पहली तुड़ाई लगभग 40 से 50 दिनों में शुरू हो जाती है। मचान पर उगाने से खीरे मिट्टी से दूर रहते हैं और हवा मिलने के कारण उनकी सेहत भी अच्छी रहती है।
सेमी की फसल और अन्य जरूरी सावधानियां
सेमी उन बेल वाली सब्जियों में गिनी जाती है, जो बहुत तेजी से बढ़ती हैं और इन्हें मचान पर आसानी से फैलाया जा सकता है। मौसम और किस्म के मुताबिक इसकी फलियां लगभग 50 से 70 दिनों में तोड़े जाने के लिए तैयार हो जाती हैं। समय-समय पर लगातार तुड़ाई करते रहने से पौधे में नई शाखाएं और फलियां आने में काफी मदद मिलती है। इसके साथ ही, टेरेस या बैकयार्ड में मचान के ऊपर ग्रीन शेड का उपयोग करते समय इस बात का ध्यान रखें कि उसे पूरी तरह पैक न किया जाए, बल्कि हवा का संचार लगातार बना रहना चाहिए। पौधों को कीटों से सुरक्षित रखने के लिए हर 15 दिन के अंतराल पर नीम ऑयल का छिड़काव नियमित रूप से करते रहें और जल निकासी का पुख्ता प्रबंध रखें।


















