खेती को अधिक सुलभ और उत्पादक बनाने के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियों में निरंतर नए प्रयोग किए जा रहे हैं। इसी क्रम में जहानाबाद में आयोजित कृषि प्रदर्शनी मेले के दौरान हल्दी उत्पादन का एक अनूठा मॉडल सामने आया है। इस नई व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें फसल उगाने के लिए पारंपरिक मिट्टी की आवश्यकता पूरी तरह खत्म हो जाती है। जिस प्रकार मशरूम की खेती नियंत्रित वातावरण में प्लास्टिक बैग के भीतर की जाती है, ठीक उसी तर्ज पर अब वर्मी कंपोस्ट की मदद से हल्दी उगाने का सफल तरीका तैयार किया गया है।
कृषि विज्ञान केंद्र गंधार का नया मॉडल
इस नवाचार को कृषि विज्ञान केंद्र गंधार के कृषि प्रसार एक्सपर्ट डॉक्टर निराला ने पेश किया है। उन्होंने बताया कि केंद्र में किसानों की लागत घटाने और पैदावार बढ़ाने के लिए लगातार नई तकनीकों पर अनुसंधान चलता रहता है। आम तौर पर किसान हल्दी की बुवाई सीधे खेतों की मिट्टी में करते आए हैं, लेकिन इस नए मॉडल ने साबित किया है कि जैविक खाद के आधार पर बिना मिट्टी भी इसकी बेहतर फसल ली जा सकती है। यह तकनीक न केवल जमीन की बाध्यता को खत्म करती है, बल्कि पैदावार की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में सुधार लाती है।
मशरूम की तरह प्लास्टिक बैग में लटकेगी फसल
डॉक्टर निराला के अनुसार, इस तकनीक की कार्यप्रणाली काफी सरल और व्यावहारिक है। जिस तरह प्लास्टिक की थैलियों में वर्मी कंपोस्ट भरकर उन्हें हवा में लटकाकर मशरूम उपजाया जाता है, हल्दी के लिए भी वही प्रक्रिया अपनाई जाती है। किसान आसानी से वर्मी कंपोस्ट तैयार कर सकते हैं और फिर उसे मजबूत प्लास्टिक बैग में भर सकते हैं। इसके बाद इन बैगों में हल्दी के बीज रोपे जाते हैं। पौधों की देखभाल और सिंचाई की जरूरतें भी सामान्य खेती की तरह ही रहती हैं, जिससे किसानों को किसी जटिल प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता।
डेढ़ गुना अधिक पैदावार और जगह की भारी बचत
इस जैविक विधि से हल्दी तैयार होने में उतना ही समय लगता है जितना सामान्य मिट्टी में लगता है, लेकिन लाभ कई गुना बढ़ जाते हैं। डॉक्टर निराला ने स्पष्ट किया कि वर्मी कंपोस्ट बैग में उगाई गई हल्दी से मिट्टी के मुकाबले 1.5 गुना अधिक उपज हासिल की जा सकती है। चूंकि इन थैलियों को वर्टिकल तरीके से या कम जगह में व्यवस्थित किया जा सकता है, इसलिए बहुत बड़े खेत की जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही, खरपतवार निकालने और जुताई जैसी भारी शारीरिक मेहनत से भी मुक्ति मिल जाती है।
ट्रायल और किसानों को प्रशिक्षण
जिले में इस विधि को बढ़ावा देने के लिए शुरुआती स्तर पर कुछ चुनिंदा स्थानों पर प्रायोगिक ट्रायल शुरू किए गए हैं। स्थानीय किसानों को इस नई तकनीक को अपनाने के लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि इस मॉडल को अपनाकर कम लागत और सीमित संसाधन वाले किसान भी अपनी आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर सकते हैं। डॉक्टर निराला ने किसानों से अपील की है कि वे केंद्र पर आकर वैज्ञानिकों से इस पूरी तकनीक की बारीकियों को समझें और इसे अपने स्तर पर लागू करें।



















