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राजस्थान में सावन की फुहारों के साथ घेवर की धूम, महिलाओं में सबसे ज्यादा क्रेजजीवनशैली
18 अग॰ 2026, 4:37 pm (72 दिन पहले)· 4

राजस्थान में सावन की फुहारों के साथ घेवर की धूम, महिलाओं में सबसे ज्यादा क्रेज

राजस्थान में बारिश और सावन के आते ही पारंपरिक घेवर की मांग तेजी से बढ़ जाती है। जालीदार बनावट और मीठी चाशनी वाले इस पकवान का तीज और रक्षाबंधन के त्योहारों से गहरा नाता है।

देशभर में अपनी अनूठी मिठास और जायके के लिए मशहूर राजस्थान के पकवान हर मौसम के साथ बदल जाते हैं। जैसे ही चिलचिलाती गर्मी विदा लेती है और आसमान में काले बादल छाते हैं, खान-पान की प्राथमिकताएं भी पूरी तरह बदल जाती हैं। इस सुहाने मौसम में ठंडी चीजों की जगह गर्म और पारंपरिक व्यंजनों की मांग बढ़ने लगती है, और जब बात बारिश के महीनों की हो तो एक खास मिठाई का जिक्र सबसे पहले जुबां पर आता है।

वह लोकप्रिय व्यंजन और कुछ नहीं बल्कि पारंपरिक घेवर है, जो अपनी मधुमक्खी के छत्ते जैसी अनोखी जालीदार बनावट और ऊपर से चढ़ी चाशनी की परत के लिए जाना जाता है। देखने में बेहद आकर्षक लगने वाला यह मिष्ठान खाने में भी उतना ही स्वादिष्ट होता है। सावन का महीना शुरू होते ही मिठाई की दुकानों पर इसकी बिक्री में अचानक भारी उछाल देखने को मिलता है, और महिलाओं के बीच तो इसका एक अलग ही क्रेज साफ नजर आता है।

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इसे राजस्थान की बारिश का पर्याय कहना गलत नहीं होगा। इस पारंपरिक मिठाई की असली खूबी इसकी खस्ता तासीर और वह जालीदार रूप है जो कारीगरों की कलाकारी से उभरता है। यही वजह है कि बरसात की फुहारों के बीच इसका आनंद लेना लोगों को सबसे ज्यादा भाता है और सावन के दिनों में मिठाई बाजारों की रौनक इसी से बढ़ती है।

करौली के प्रसिद्ध हलवाई विनोद गर्ग के अनुसार, इस मौसम में हवा की नमी और ठंडक घेवर की बनावट को और भी बेहतरीन बनाने में मदद करती है। यही मुख्य कारण है कि सावन की आहट के साथ ही बाजारों में हलवाई इस खास व्यंजन को तैयार करने में जुट जाते हैं। ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए बाजार में सादा घेवर के अलावा मलाई घेवर और मावे वाले घेवर की वेराइटी भी सबसे अधिक बिकती है।

घेवर का नाता राजस्थान में तीज और सावन जैसे पावन त्योहारों से बहुत पुराना और अटूट है। हरियाली तीज के खास अवसर पर महिलाएं एक-दूसरे का मुंह मीठा कराती हैं और मायके से ससुराल तक इसे उपहार के रूप में भेजने की परंपरा आज भी कई जगहों पर निभाई जाती है। सावन के दौरान जब हलवाइयों की दुकानें सजी होती हैं, तो उसकी सोंधी खुशबू राहगीरों को अपनी ओर खींच लेती है। तमाम लोग सालभर इस खास मौसम का इंतजार करते हैं ताकि वे बरसात के शुरू होते ही इसका लुत्फ उठा सकें।

इसकी एक और खूबी यह है कि इसका असली रूप और स्वाद सावन के मौसम में ही सबसे बेहतरीन निखर कर आता है। यही कारण है कि मिठाई कारोबारी भी इस खास सीजन का बेसब्री से इंतजार करते हैं। सावन, तीज और रक्षाबंधन के इर्द-गिर्द इसकी बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाती है, और यह महिलाओं की सबसे पसंदीदा मिठाइयों में शुमार रहता है।

इस व्यंजन का स्वाद और उपलब्धता काफी हद तक बारिश के मिजाज पर टिकी होती है, जिसके चलते इसे इस महीने का विशेष पकवान माना जाता है। हालांकि अब राजस्थान के बड़े शहरों में यह साल के बारह महीने मिलने लगा है, लेकिन करौली जैसे इलाकों में यह मुख्य रूप से बारिश के दिनों और विशेष तौर पर सावन के महीने में ही तैयार किया जाता है।

सवाल-जवाब

घेवर मुख्य रूप से किस मौसम में सबसे ज्यादा खाया जाता है?
घेवर मुख्य रूप से सावन और बारिश के मौसम में सबसे ज्यादा खाया और पसंद किया जाता है।
घेवर की बनावट के लिए कौन सा मौसम सबसे अच्छा माना जाता है?
मौसम में नमी और ठंडक होने पर घेवर की जालीदार बनावट और खस्तापन सबसे बेहतरीन आता है।
बाजार में घेवर की कौन-कौन सी किस्में सबसे ज्यादा बिकती हैं?
सादा घेवर के अलावा मलाई घेवर और मावे वाले घेवर की इस मौसम में सबसे ज्यादा मांग रहती है।
करौली के प्रसिद्ध हलवाई ने घेवर के बारे में क्या बताया है?
विनोद गर्ग ने बताया कि मौसम की ठंडक और नमी इसकी बनावट को बेहतर बनाती है जिससे सावन में कारीगर इसे बनाने में जुट जाते हैं।
घेवर का किन त्योहारों से गहरा रिश्ता है?
घेवर का सावन, हरियाली तीज और रक्षाबंधन के त्योहारों से बहुत पुराना रिश्ता है।
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