घरों में लगे गमलों के पौधों का अचानक सूखने लगना, पत्तियों का पीला पड़ना या उनका विकास रुक जाना बागवानी के शौकीनों के लिए आम परेशानी बन जाता है। इस स्थिति से निपटने के लिए कई लोग तुरंत बाजार की ओर रुख करते हैं और रासायनिक या महंगी खाद खरीद लाते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि पौधों की खोई हुई हरियाली लौटाने और उन्हें जरूरी पोषण देने के लिए घर के भीतर ही कई बेहतरीन विकल्प मौजूद रहते हैं। रोजमर्रा के भोजन की तैयारी में इस्तेमाल होने वाली साधारण चीजें जैसे आलू, प्याज, लहसुन, केला, दाल, चावल और पनीर बनाने के बाद बचा पानी बहुत असरदार तरल खाद में बदले जा सकते हैं। इनके सही इस्तेमाल से न केवल पौधों की सेहत सुधरती है, बल्कि अनावश्यक खर्च भी बचता है।
प्याज और लहसुन के छिलकों से बनाएं पोषक अर्क
रसोई में सब्जी काटते वक्त प्याज और लहसुन के सूखे छिलकों को अमूमन बेकार समझकर कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाता है। इन साफ छिलकों को फेंकने के बजाय एक बर्तन में इकट्ठा करें और लगभग एक लीटर साफ पानी में भिगोकर कुछ समय के लिए छोड़ दें। जब छिलकों का अर्क पानी में उतर जाए, तब इस मिश्रण को अच्छी तरह छानकर छिलकों को अलग कर लें। छना हुआ पानी आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर तरल खाद का काम करता है, जिसे सीधे गमले की मिट्टी में डाला जा सकता है।
इस अर्क का उपयोग करते समय कुछ खास सावधानियों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। घोल को कभी भी बहुत अधिक गाढ़ा बनाकर पौधों की जड़ों में न डालें, बल्कि इसे हमेशा हल्का पतला ही रखें। इस तरल को पत्तियों के ऊपर छिड़कने के बजाय गमले की मिट्टी में डालना चाहिए। यदि गमले की मिट्टी पहले से बहुत अधिक गीली है, तो इस अर्क को डालने से बचें। जब ऊपर की सतह हल्की सूखी महसूस हो, तभी सीमित मात्रा में इसका प्रयोग करें। पहली बार इस्तेमाल करते वक्त थोड़ी मात्रा से शुरुआत करें और पौधे के पत्तों पर नजर रखें। यदि पत्तियां जलती हुई या खराब होती दिखें, तो इसका इस्तेमाल तुरंत बंद कर देना चाहिए।
उबले आलू का बचा हुआ पानी है खनिज तत्वों का स्रोत
सब्जी या चाट बनाने के लिए जब आलू उबाले जाते हैं, तो उसका बचा हुआ पानी पौधों के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकता है। आलू उबलने के दौरान पानी में कई प्रकार के प्राकृतिक खनिज घुल जाते हैं, जो पौधों की वृद्धि के लिए फायदेमंद होते हैं। लेकिन इस विधि में सबसे बुनियादी नियम यह है कि आलू उबालते समय पानी में बिल्कुल भी नमक न डाला गया हो। नमक युक्त पानी पौधों की नाजुक जड़ों और गमले की मिट्टी के संतुलन को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
बिना नमक वाले इस उबले पानी को पहले सामान्य तापमान पर पूरी तरह ठंडा होने दें, फिर ही इसे गमले की मिट्टी में डालें। गर्म पानी जड़ों को झुलसा सकता है। इसके अलावा, आलू के इस पानी को कई दिनों तक सहेजकर रखने के बजाय ताजा ठंडा होते ही इस्तेमाल करना चाहिए। बासी या सड़ा हुआ पानी पौधों में फंगस या दुर्गंध का कारण बन सकता है।
दाल और चावल धोने का पानी मिट्टी को देगा पोषण
भारतीय रसोई में रोजाना दाल और चावल पकाने से पहले उन्हें धोया जाता है। धोते वक्त निकलने वाले सफेद धुंधले पानी को नाली में बहाने के बजाय एक साफ बर्तन में एकत्रित कर लेना चाहिए। इस पानी में स्टार्च और कुछ महीन पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो गमले की मिट्टी के प्राकृतिक वातावरण और पौधों की सेहत के लिए सहायक बनते हैं।
दाल-चावल के पानी का प्रयोग हमेशा ताजा रहते ही करना चाहिए। अगर यह पानी कई दिनों तक किसी बर्तन में पड़ा रहा हो या उसमें से बदबू आने लगी हो, तो उसे पौधों में कभी नहीं डालना चाहिए। छोटे गमलों में जरूरत से ज्यादा पानी उड़ेलने की गलती न करें। मिट्टी की नमी के अनुसार हल्की और सीमित मात्रा से शुरुआत करना ही पौधों के लिए सबसे सुरक्षित तरीका है।
सूखे केले के छिलकों का पाउडर और पोटैशियम का घोल
फलों में केले के छिलके पौधों के लिए सबसे बेहतर प्राकृतिक पोषक तत्व माने जाते हैं, क्योंकि इनमें पोटैशियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। छिलकों का इस्तेमाल करने के लिए पहले उन्हें धूप में अच्छी तरह सुखा लें। पूरी तरह सूख जाने के बाद मिक्सी में पीसकर उनका बारीक पाउडर तैयार कर लें।
जब भी पौधों को पोषण देना हो, इस पाउडर की थोड़ी सी मात्रा को पानी में अच्छी तरह घोल लें। तैयार हल्के घोल को गमले की मिट्टी में डालें। ध्यान रखें कि यह घोल बहुत गाढ़ा न हो और न ही इसका बार-बार अनावश्यक प्रयोग किया जाए। पौधे की जरूरत को देखते हुए हल्की और संतुलित खुराक देना ही नए कल्ले और मजबूत जड़ें विकसित करने में मददगार साबित होता है।
पनीर का बचा हुआ पानी यानी व्हे का संतुलित प्रयोग
घर में जब दूध फाड़कर पनीर या छेना बनाया जाता है, तो नीचे एक हल्के पीले रंग का तरल बचता है जिसे तकनीकी रूप से व्हे कहा जाता है। इस पानी में प्रोटीन, कैल्शियम और कई खनिज तत्व मौजूद होते हैं। यह पोषक तत्वों का गाढ़ा स्रोत है, इसलिए इसका उपयोग सीधे पौधों पर नहीं करना चाहिए। इसे मिट्टी में डालने से पहले हमेशा सादे पानी में मिलाकर काफी हल्का और पतला कर लेना अनिवार्य है।
इसके साथ ही यह जांचना भी जरूरी है कि पनीर बनाते समय दूध में कोई नमक, चाट मसाला या अन्य तीखे मसाले न मिलाए गए हों। मसालों या नमक वाला पानी पौधों को सुखा सकता है। घरेलू तरल खादों का इस्तेमाल करते समय हमेशा यह नियम याद रखें कि शुरुआत कम मात्रा से करें। पर्याप्त धूप, सही मात्रा में नियमित पानी और उपजाऊ मिट्टी के साथ मिलकर ये घरेलू तरल खाद मुरझाते पौधों में तेजी से जान फूंक सकते हैं।


















