सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना और भक्ति के लिए बहुत खास माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु व्रत और पूजा-पाठ के साथ अपने खानपान में कई बड़े बदलाव करते हैं। हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग हमेशा सावन के महीनों में कुछ खास चीजों को खाने से मना करते हैं। इनमें पालक और चौलाई जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध, दही, बैंगन, प्याज और लहसुन शामिल हैं। इन खानपान की पाबंदियों के पीछे केवल धार्मिक मान्यताएं ही नहीं हैं, बल्कि बारिश के मौसम से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी गहरी समझ भी छिपी हुई है। मानसून के दौरान मानव शरीर का पाचन तंत्र स्वाभाविक रूप से कमजोर हो जाता है, इसलिए इस समय हल्का और सात्विक भोजन करने की सलाह दी जाती है।
पत्तेदार सब्जियों के परहेज का वैज्ञानिक और व्यावहारिक कारण
सावन के महीने में पालक, चौलाई और अन्य पत्तेदार सब्जियों को भोजन में शामिल न करने की सलाह दी जाती है। महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य के अनुसार, बारिश के दिनों में जमीन में नमी और पानी की मात्रा काफी बढ़ जाती है। इस सीलन और नमी की वजह से मिट्टी से कई प्रकार के कीड़े-मकोड़े और सूक्ष्म जीव बाहर निकल आते हैं। ये सूक्ष्म जीव पत्तेदार सब्जियों के पत्तों पर चिपक जाते हैं। बारिश के मौसम में इन बारीक कीड़ों को पत्तों से पूरी तरह साफ करना बहुत कठिन होता है। यदि इन सब्जियों को सही ढंग से धोया न जाए, तो सेहत बिगड़ने का खतरा रहता है। इसी वजह से हमारे पूर्वजों ने सावन में साग न खाने की परंपरा बनाई थी, जो आज भी प्रचलित है।
दूध और दही के इस्तेमाल पर पाबंदी की वजह
सावन में दूध का सेवन कम करने के पीछे धार्मिक और व्यावहारिक दोनों ही कारण मौजूद हैं। मानसून के मौसम में गाय और भैंस बाहर हरी घास और वनस्पतियां चरती हैं। इन वनस्पतियों पर छोटे-छोटे कीड़े और जीवाणु मौजूद हो सकते हैं, जिनका असर पशुओं के दूध पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा, धार्मिक मान्यताओं में सावन के महीने को भगवान शिव का महीना माना गया है, जिसमें दूध से भगवान शिव का अभिषेक करने की परंपरा है। यही कारण है कि लोग स्वयं दूध पीने के बजाय उसे शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। हमारे समाज में एक बहुत पुरानी कहावत भी प्रचलित है कि सावन में साग और भादो में दही नहीं खाना चाहिए। बारिश के दिनों में दही जैसी भारी और जल्दी खराब होने वाली चीजों से परहेज करना पेट के लिए फायदेमंद रहता है।
प्याज, लहसुन और तामसिक चीजों से दूरी
सावन का पूरा महीना सात्विकता और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। इस महीने में प्याज, लहसुन और मांसाहारी भोजन से पूरी तरह परहेज करने की धार्मिक परंपरा रही है। महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य का कहना है कि प्याज और लहसुन जैसे तामसिक भोजन से शरीर में आलस्य, भारीपन और सुस्ती बढ़ती है। जब शरीर में भारीपन रहता है, तो पूजा-पाठ, ध्यान और व्रत के नियमों का पालन करना कठिन हो जाता है। सात्विक और हल्का भोजन करने से शरीर हल्का रहता है और मन पूजा-पाठ में केंद्रित रहता है।
सावन के दौरान गुड़ खाने की सलाह
जहां एक तरफ सावन में कई चीजों पर रोक रहती है, वहीं गुड़ का सेवन बहुत फायदेमंद माना जाता है। आयुर्वेद में गुड़ के कई स्वास्थ्यवर्धक गुण बताए गए हैं। महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य के अनुसार, सावन के महीने में सीमित मात्रा में गुड़ का सेवन जरूर करना चाहिए। गुड़ पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने और शरीर को ऊर्जा देने में मदद करता है। हालांकि, हर व्यक्ति को अपनी शारीरिक आवश्यकता और सेहत की स्थिति के अनुसार ही इसका सेवन करना चाहिए।
मौसम के अनुकूल खानपान की प्राचीन परंपराएं
हमारे पूर्वजों ने मौसम के बदलाव को ध्यान में रखते हुए ही खानपान के नियम तय किए थे। सावन में साग, भादो में दही और अन्य महीनों में विशेष खाद्य पदार्थों से परहेज करने की परंपराएं इसी वैज्ञानिक समझ का हिस्सा हैं। यद्यपि आज के आधुनिक समय में बहुत से लोग इन नियमों का पालन नहीं करते हैं, लेकिन मानसून के दौरान ताजा, स्वच्छ और सुपाच्य भोजन करना हर किसी के स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी सिद्ध हो सकता है।



















