दांपत्य जीवन में आपसी अनुराग और सामंजस्य के साथ एक-दूसरे की भावना को समझना और बराबरी का भाव रखना बेहद आवश्यक माना जाता है। वैवाहिक रिश्तों को लेकर अक्सर यह भ्रांति देखने को मिलती है कि जिस रिश्ते में विवाद नहीं होते, केवल वही सफल है। इस तरह का दृष्टिकोण पति-पत्नी के रिश्ते में अनावश्यक तनाव पैदा करता है। कई बार लोग अपने रिश्ते की तुलना बाहर दिखने वाले दूसरे युगलों से करने लगते हैं, जिससे मनमुटाव बढ़ता है। हकीकत में किसी भी रिश्ते में मतभेद होना स्वाभाविक है, और समझदार जोड़े अपने विवादों को सूझबूझ से सुलझाते हैं।
परफेक्ट साथी खोजने के बजाय कमियों को स्वीकारें
इन्फोसिस के सह-संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति की पत्नी, विख्यात लेखिका और समाजसेविका सुधा मूर्ति अक्सर युवाओं को दांपत्य जीवन में समझदारी बरतने की प्रेरणा देती हैं। उनका मानना है कि किसी भी शादी को टिकाऊ बनाने के लिए साथी का सर्वगुण संपन्न या त्रुटिहीन होना जरूरी नहीं है। रिश्ते की मजबूती एक-दूसरे की कमियों को अपनाने और मिलकर आगे बढ़ने में निहित होती है। यदि कोई व्यक्ति किसी आदर्श साथी की खोज में रहता है या अपने जीवनसाथी को पूरी तरह बदलने का प्रयास करता है, तो यह वैवाहिक रिश्ते के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
विवाद स्वाभाविक हैं, उन्हें संभालने का तरीका मायने रखता है
पति-पत्नी के बीच समय-समय पर नोकझोंक और विचार भिन्नता होना एकदम सामान्य प्रक्रिया है। सुधा मूर्ति के अनुसार, यदि कोई युगल यह कहे कि उनके बीच कभी कोई मतभेद या बहस नहीं हुई, तो यह बात अप्राकृतिक लगती है। असल मुद्दा बहस होना या न होना नहीं है, बल्कि उस स्थिति को दोनों पक्ष किस तरह से संभालते हैं, यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। समझदारी इसी में है कि छोटी-मोटी असहमति को रिश्ते पर हावी न होने दिया जाए।
एक के नाराज होने पर दूसरे का शांत रहना जरूरी
क्रोध और आवेश की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुधा मूर्ति एक व्यावहारिक नियम अपनाने की सलाह देती हैं। उनके मुताबिक, दोनों साझेदारों को एक ही समय पर उत्तेजित या क्रोधित नहीं होना चाहिए। यदि एक व्यक्ति किसी बात पर नाराज हो जाए, तो दूसरे को संयम बरतते हुए शांत हो जाना चाहिए। उन्होंने अपने स्वयं के वैवाहिक जीवन का दृष्टांत रखते हुए बताया कि जब नारायण मूर्ति गुस्से में होते हैं, तो वह खामोश रहकर स्थिति को संभालती हैं। ठीक इसी प्रकार, जब उन्हें गुस्सा आता है, तो उनके पति धैर्य बनाए रखते हैं। इस आपसी तालमेल के कारण कोई भी मामूली बात गंभीर विवाद का रूप नहीं ले पाती।
घरेलू जिम्मेदारियों का निष्पक्ष बंटवारा
आधुनिक समय में दोनों साझेदारों के कामकाजी होने की स्थिति पर विचार रखते हुए सुधा मूर्ति ने स्पष्ट किया कि जब पति और पत्नी दोनों नौकरीपेशा हैं, तो घर-गृहस्थी के दायित्व भी दोनों को मिलकर उठाने चाहिए। भोजन तैयार करना, संतानों की परवरिश करना और घर की दैनिक व्यवस्थाओं को देखना केवल महिला की एकल जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। दोनों का सक्रिय सहयोग ही घर के माहौल को सुखद बनाए रख सकता है।
तुलना करने की प्रवृत्ति से बचें और सम्मान दें
सुधा मूर्ति के अनुसार, परस्पर आदर, सहयोग और विवेकशीलता ही एक सुदृढ़ और आनंदमय दांपत्य की सच्ची बुनियाद है। उन्होंने विशेष रूप से यह उल्लेख किया कि पति द्वारा अपनी पत्नी की कार्यशैली की तुलना अपनी मां से करना अनुचित है। पुराने दौर में अधिकांश महिलाएं पूर्णकालिक रूप से घर की देखरेख करती थीं, जबकि वर्तमान समय में बहुत-सी महिलाएं अपने पेशेवर दायित्वों को भी संभालती हैं। ऐसी बदली हुई परिस्थितियों में उनसे पुरानी पारंपरिक अपेक्षाएं रखना सही नहीं है।



















