वृंदावन के जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम और उनसे जुड़े एक शिष्य की असामयिक मृत्यु के मामले ने बीते दिनों गहरा तूल पकड़ लिया था। इंटरनेट और विभिन्न चर्चा मंचों पर इस घटना को लेकर तरह-तरह के दावे किए जाने लगे थे और कुछ हलकों में इस पूरे प्रकरण की आंच सीधे प्रेमानंद महाराज तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही थी। अब इस संवेदनशील विषय पर विख्यात कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज ने अपना दृष्टिकोण सामने रखा है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि प्रेमानंद महाराज उच्च कोटि के संत और भगवान के अनन्य उपासक हैं, जिनकी तपस्या और निष्ठा पर किसी भी प्रकार का संदेह जताना पूरी तरह गलत है। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि शिष्य के इस दुखद अंत के पीछे उसका अपना व्यक्तिगत निर्णय था, जिसके लिए आश्रम या गुरु पर दोष मढ़ना कतई तर्कसंगत नहीं है।
गुरु की सीख और शिष्य के आचरण में स्पष्ट अंतर
चर्चा के दौरान जब अनिरुद्धाचार्य से आश्रम से जुड़े घटनाक्रम पर राय पूछी गई, तो उन्होंने सबसे पहले प्रेमानंद महाराज के प्रति अपना गहरा आदर भाव प्रकट किया। उन्होंने बताया कि वह स्वयं प्रेमानंद महाराज के केवल दूर से दर्शन करते हैं और उन्हें आध्यात्मिक जगत में बेहद आदरणीय मानते हैं। अनिरुद्धाचार्य के अनुसार, प्रेमानंद महाराज की साधना और भगवत भक्ति पूरी तरह निष्कलंक है। लेकिन जब बात किसी शिष्य के व्यक्तिगत आचरण की आती है, तो यह समझना जरूरी हो जाता है कि गुरु चाहे कितना भी महान हो, वह किसी व्यक्ति के भीतर चल रही कशमकश को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति के मन की गहराइयों में क्या विचार चल रहे हैं, यह जान पाना किसी बाहरी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। इसलिए गुरु के आध्यात्मिक कद और शिष्य के निजी कदमों को एक ही तराजू में नहीं तौला जाना चाहिए।
इंद्रिय नियंत्रण का भ्रामक तरीका और दुखद परिणाम
इस पूरे मामले में सबसे व्यथित करने वाला पहलू वह कदम था, जिसके तहत कथित रूप से शिष्य ने अपने ही निजी अंग को जानलेवा चोट पहुंचाई और बाद में उसकी जान चली गई। अनिरुद्धाचार्य ने इस पर विचार रखते हुए कहा कि आखिर उस व्यक्ति ने इतना भयावह कदम क्यों उठाया, इसका वास्तविक और प्रामाणिक उत्तर केवल वही दे सकता था। चूंकि अब वह इस संसार में नहीं है, इसलिए उसके सटीक कारणों की पुष्टि करना नामुमकिन है। अनिरुद्धाचार्य ने अनुमान जताते हुए कहा कि संभवतः वह अपनी शारीरिक इच्छाओं और वासनाओं पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रहा था, परंतु इस प्रक्रिया में उसने एक घातक और गलत रास्ता चुन लिया। उन्होंने स्पष्ट रेखा खींचते हुए समझाया कि सनातन परंपरा में संत सदैव शिष्यों को मन और इंद्रियों पर संयम बरतने का उपदेश देते हैं, न कि अपने ही शरीर को आघात पहुंचाने या नष्ट करने का। कोई भी सच्चा मार्गदर्शक अपने अनुयायी को स्वयं को पीड़ा देने की शिक्षा नहीं देता। ऐसा प्रतीत होता है कि शिष्य ने संयम के आध्यात्मिक संदेश का गलत अर्थ निकाल लिया और अपनी जान गंवा बैठा।
अलग आवास और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व की दलील
अपनी बात को और स्पष्ट करने के लिए अनिरुद्धाचार्य ने एक व्यावहारिक उदाहरण सामने रखा। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का कोई शिष्य या परिचित मानसिक तनाव, अवसाद अथवा किसी उलझन के चलते अपने साथ कोई अनहोनी कर लेता है, तो केवल जान-पहचान या रिश्ते के आधार पर दूसरे व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कानून और नैतिकता दोनों के अनुसार किसी के व्यक्तिगत कृत्य की जवाबदेही उसी पर होती है। इसके साथ ही उन्होंने एक महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख करते हुए बताया कि जिस शिष्य की मृत्यु हुई, वह प्रेमानंद महाराज के साथ आश्रम परिसर में नहीं रहता था, बल्कि अपने अलग अपार्टमेंट में निवास कर रहा था। जब एक व्यक्ति अलग परिवेश में स्वतंत्र रूप से रह रहा था और उसने एकांत में कोई घातक कदम उठाया, तो केवल एक आध्यात्मिक संबंध की दुहाई देकर प्रेमानंद महाराज को कटघरे में खड़ा करना सर्वथा निराधार है।
विवादों का दौर और संतों की गरिमा
बातचीत के सिलसिले में अनिरुद्धाचार्य ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि किस तरह एक मसला शांत होते ही दूसरा विवाद खड़ा कर दिया जाता है। उन्होंने इस पूरे प्रकरण के अलावा विराट कोहली से जुड़े पुराने विवाद का भी संक्षेप में उल्लेख किया, जिसका जिक्र समाज में संतों को लेकर बनने वाली धारणाओं के संदर्भ में हुआ था। अनिरुद्धाचार्य का मानना है कि संतों के जीवन और उनकी भक्ति साधना को केवल किसी एक अनपेक्षित घटना की छाया में नहीं देखा जाना चाहिए। अंततः किसी भी घटना की सच्चाई और कानूनी जवाबदेही निष्पक्ष जांच और ठोस साक्ष्यों पर ही निर्भर करती है, न कि इंटरनेट पर उठने वाले सतही सवालों और भ्रामक आरोपों पर।



















