कथावाचन और धार्मिक प्रवचनों के माध्यम से देश भर में पहचान बना चुके अनिरुद्धाचार्य के जीवन में सेवा का मार्ग किसी पूर्व निर्धारित योजना के तहत शुरू नहीं हुआ था। अपनी आध्यात्मिक यात्रा और समाज सेवा के जुड़ाव पर चर्चा करते हुए उन्होंने उस मार्मिक अनुभव को साझा किया, जिसने उनके दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि कथावाचक बनने अथवा एक चर्चित चेहरे के रूप में उभरने का उन्होंने कभी अलग से कोई खाका तैयार नहीं किया था। उनका मानना है कि ईश्वर जिस मार्ग पर उन्हें आगे बढ़ाते गए, वे बस उसी दिशा में कदम बढ़ाते चले गए।
साल 2016 या 2017 का वह भावुक प्रसंग
अनिरुद्धाचार्य ने याद करते हुए बताया कि लगभग वर्ष 2016 अथवा 2017 के समय की बात है, जब एक असहाय वृद्ध महिला उनके पास पहुंची थी। उस बुजुर्ग महिला ने उनके सामने एक अत्यंत अप्रत्याशित और हृदयविदारक निवेदन रखा। उसने कहा कि जब उसकी सांसें थम जाएं, तो अनिरुद्धाचार्य ही उसकी चिता को मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार संपन्न करें। इस अजीबोगरीब आग्रह को सुनकर वे चौंक गए। उन्होंने तुरंत उस महिला से सवाल किया कि उसका तो खुद का बेटा मौजूद है, फिर वह अपने बेटे से अंतिम संस्कार कराने के बजाय किसी और से यह विनती क्यों कर रही है।
उपेक्षित मां का दर्द और रोटी-पानी का संकट
इस प्रश्न के उत्तर में उस वृद्ध मां ने अपनी जो व्यथा बताई, उसने अनिरुद्धाचार्य के मन को झकझोर कर रख दिया। महिला ने पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि जिस बेटे को उसने पाला-पोसा, वही बेटा उसे दो वक्त की रोटी और पीने का पानी तक नसीब नहीं होने देता। महिला का कहना था कि जब उसका सगा बेटा जीवित रहते ही उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं की परवाह नहीं करता और बुनियादी जरूरतों से वंचित रखता है, तो फिर उसके दुनिया से चले जाने के बाद वह उससे अंतिम संस्कार की उम्मीद कैसे बांध सकती है। बेटे के इस उपेक्षापूर्ण और कटु व्यवहार ने मां को पूरी तरह तोड़ दिया था।
सेवा के संकल्प का जन्म और गौरी गोपाल आश्रम
बुजुर्ग महिला की कही बातें अनिरुद्धाचार्य के अंतर्मन में गहरी छाप छोड़ गईं। उन्हें भीतर से यह अहसास हुआ कि शायद ईश्वर उनसे केवल कथाएं सुनवाने के अलावा भी कोई बड़ा सामाजिक कार्य कराना चाहते हैं। उन्हें लगा कि परमात्मा ने उन्हें ऐसी ही असहाय और तिरस्कृत माताओं के जीवन को सहारा देने के निमित्त चुना है, जिन्हें उनके अपने ही परिवारों और संतानों ने बेसहारा छोड़ दिया है। इसी एक विचार ने उनके जीवन के लक्ष्यों को नया मोड़ दे दिया और उन्होंने वृद्ध महिलाओं के कल्याण के लिए समर्पित रहने का दृढ़ संकल्प ले लिया।
300 से अधिक बुजुर्ग महिलाओं का आश्रय
इस संकल्प को मूर्त रूप देते हुए उन्होंने गौरी गोपाल आश्रम की स्थापना की और सेवा कार्य को अपनी दिनचर्या का अभिन्न अंग बना लिया। उन्होंने बताया कि गौरी गोपाल आश्रम में वर्तमान में 300 से अधिक ऐसी वृद्ध माताओं की देखरेख और सेवा की जाती है, जिनके पास सिर छिपाने के लिए कोई ठिकाना अथवा परिवार का सहारा नहीं बचा है। अनिरुद्धाचार्य का कहना है कि यह पूरा अभियान किसी बड़े व्यक्तिगत विचार या प्रचार की महत्वाकांक्षा से शुरू नहीं हुआ था, बल्कि एक दुखी और उपेक्षित मां के दर्द को महसूस करने के बाद उपजा था।



















