रेड सिग्नल्स पर तालियां बजाकर जीवन यापन करने वाले या शादियों और आयोजनों में नाच-गाकर चंद पैसे कमाने वाले किन्नर समुदाय के लोगों को किसी पेशेवर सुरक्षाकर्मी की तरह आपदा के समय लोगों की जान बचाते देखना वाकई एक अनूठा और सुखद बदलाव है। कभी समाज के एक वर्ग द्वारा अपमानजनक शब्दों का सामना करने वाली इन महिलाओं को आज कोल्हापुर में बेहद सम्मान की नजर से देखा जाता है। आज हालात यह हैं कि स्थानीय लोग उनके सामने हाथ जोड़कर उनका अभिवादन करते हैं और उनकी बहादुरी के लिए उन्हें धन्यवाद देते नहीं थकते हैं, और इस बड़े बदलाव के केंद्र में है वहां की विशेष ट्रांसवुमेन रेस्क्यू स्क्वाड।
कोल्हापुर में उठी बदलाव की यह अनूठी लहर
कोल्हापुर में अपनी पहचान को छिपाकर किसी तरह जीवन गुजारने को विवश किन्नर समुदाय के लोगों के लिए प्रशासन ने एक अनूठी पहल की है। यहां की डिस्ट्रिक्ट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने सड़कों पर ताली बजाकर और मांगकर गुजारा करने वाली 15 ट्रांसवुमन को चुना और उन्हें आपदा राहत तथा बचाव कार्यों के लिए पूरी तरह से प्रशिक्षित किया। अब ये सभी ट्रांसवुमन इस पूरे इलाके में बाढ़ और अन्य आपातकालीन संकटों के दौरान दूसरों की हिफाजत करने में किसी जांबाज सैनिक की तरह मुस्तैदी से अपनी सेवाएं दे रही हैं।
भेदभाव और संघर्ष से भरा रहा है इनका शुरुआती सफर
इन 15 ट्रांसवुमन के जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा अंधेरे और सामाजिक उपेक्षा में ही बीता है। बचपन के दिनों से ही इन्हें समाज के भीतर भीषण भेदभाव का सामना करना पड़ा। अपने ही परिवारों से कड़ा विरोध मिलने और आजीविका के कोई अन्य साधन न होने के कारण इन्हें अनगिनत संघर्षों से दो-चार होना पड़ा। इनमें से लगभग हर सदस्य को अपना पैतृक घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। पेट पालने के लिए कई लोगों को अपनी मूल पहचान को छिपाकर अलग-अलग जगहों पर काम करना पड़ा, लेकिन आज कोल्हापुर की तंग गलियों और सड़कों पर आम लोग इनकी तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। इस बदलाव की मुख्य वजह वहां का स्थानीय प्रशासन है, जिसने इन महिलाओं को अपनी काबिलियत साबित करने का एक बेहतरीन मौका दिया है।
कठिन प्रशिक्षण के बाद तैयार हुई यह विशेष टीम
कुछ समय पहले डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने इन ट्रांसवुमन के लिए एक विशेष और rigorous ट्रेनिंग प्रोग्राम की शुरुआत की थी। इस व्यापक प्रशिक्षण शिविर के दौरान इन्हें तैराकी के गुर सिखाए गए, फर्स्ट एड देने के तौर-तरीके बताए गए, विभिन्न आधुनिक रेस्क्यू तकनीकों से अवगत कराया गया, रस्सियों के सहारे पानी से लोगों को सुरक्षित बाहर खींचना सिखाया गया और किसी भी आपातकालीन स्थिति से तुरंत निपटने के उपाय बताए गए। इस पूरी प्रक्रिया ने उन्हें एक आम नागरिक से बदलकर प्रशिक्षित आपदा मित्र बना दिया।
बाढ़ और आपदाओं के समय सबसे आगे रहती है यह टीम
अब ये सभी 15 ट्रांसवुमन उस आधिकारिक रेस्क्यू स्क्वाड का एक अहम और सक्रिय हिस्सा बन चुकी हैं। जब भी जिले में भारी बाढ़ का संकट आता है या कोई दुर्घटना घटित होती है, तो यह टीम सबसे आगे खड़ी नजर आती है। उफनते पानी में फंसे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना, घायलों को तुरंत अस्पताल या सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना और प्रभावित इलाकों में राहत सामग्री का वितरण करना अब इनके दैनिक कार्यों का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। अपनी बहादुरी के दम पर यह स्क्वाड अब तक आपदाओं के दौरान सैकड़ों लोगों की जान बचा चुकी है और उन्हें सुरक्षित राहत मुहैया करा चुकी है।
बदलाव के इस दौर पर क्या कहती हैं स्क्वाड की सदस्य
इस अनूठी स्क्वाड की एक सक्रिय सदस्य सोनल अपने अनुभव साझा करते हुए बताती हैं कि पहले लोग उन्हें देखकर मुंह फेर लेते थे, नफरत करते थे या उनका मजाक उड़ाया करते थे। लेकिन आज जब वे किसी संकट में फंसे व्यक्ति की जान बचाती हैं, तो वही लोग उन्हें दिल से धन्यवाद देते हैं और सम्मान में उनके आगे हाथ जोड़ते हैं। सोनल का कहना है कि यह सम्मान पाने का एहसास उनके लिए बेहद सुखद और संतोषजनक होता है। वहीं, इस टीम की एक अन्य सदस्य ने बताया कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए ट्रेनिंग के दौरान उन्हें बेहद कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी। शुरुआत में कई ऐसी महिलाएं थीं जिन्हें तैरना बिल्कुल नहीं आता था, लेकिन उन्हें गहरे पानी में उतारा गया और कड़ी ट्रेनिंग के बाद उन्होंने तैराकी में महारत हासिल कर ली। आज वे गहरे से गहरे पानी में भी पूरी निडरता के साथ राहत कार्य को अंजाम देती हैं, जिसे देखकर प्रशासनिक अधिकारी भी इनकी पीठ थपथपा रहे हैं।
समाज को जोड़ने की दिशा में प्रशासन का बड़ा कदम
डिजास्टर मैनेजमेंट से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का मानना है कि ट्रांसजेंडर समुदाय को समाज की मुख्यधारा के साथ जोड़ने का यह एक बेहद सफल और अनुकरणीय प्रयास है। जब समाज का कोई भी उपेक्षित व्यक्ति देश और समाज के लिए कोई सार्थक और उपयोगी काम करता है, तो समाज में उसकी पूरी पहचान ही बदल जाती है। आज कोल्हापुर में किन्नरों की पहचान केवल रेड सिग्नल पर ताली बजाकर भीख मांगने वालों की नहीं रही, बल्कि वे इलाके के साहसी और भरोसेमंद सिपाहियों के रूप में जाने जाने लगे हैं।
अभी भी बनी हुई हैं कुछ चुनिंदा चुनौतियां
भले ही इन महिलाओं को आपदा प्रबंधन का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण मिल चुका है और वे अपने काम को बेहद खूबी से अंजाम दे रही हैं, लेकिन उनके सामने अभी भी कई तरह की व्यावहारिक चुनौतियां बरकरार हैं। इन सभी ट्रांसवुमन का यह कहना है कि उन्हें ट्रेनिंग तो मिल गई है और वे अपनी सेवाएं भी दे रही हैं, लेकिन उनके लिए नियमित रोजगार और पुख्ता सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था होना अभी भी बहुत जरूरी है। उनकी यह पुरजोर मांग है कि सरकार उन्हें आधिकारिक और स्थायी रूप से जिला आपदा राहत टीम का हिस्सा बनाए। इसके साथ ही, उनका मानना है कि पूरे समाज में व्यापक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है ताकि ट्रांसजेंडर समुदाय के अन्य दबे-कुचले लोग भी आगे आ सकें और समाज में अपनी नई जगह बना सकें।
एक नई और प्रेरणादायक पहचान की ओर कदम
यह गाथा केवल कुछ लोगों के रेस्क्यू दल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की सबसे पिछड़ी और अंधेरी परत से निकलकर सामने आए किन्नर समुदाय की अदम्य इच्छाशक्ति और मजबूती की एक जीवंत कहानी है। अपनी कड़ी मेहनत और लगन के बल पर यह समुदाय अब समाज में मान-सम्मान, उचित अवसरों और बड़े बदलाव की एक नई इबारत लिख रहा है। कोल्हापुर में पहली बार किन्नर समुदाय के लोगों को इस तरह का ऐतिहासिक मंच प्रदान किया गया है। यदि इसी प्रकार के अवसर देश के अन्य हिस्सों में भी इन लोगों को प्रदान किए जाएं, तो पूरे समाज में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव आ सकता है। बाढ़ के उफनते पानी में छलांग लगाकर लोगों की जिंदगी बचाने वाली ये जांबाज ट्रांसवुमन आज अपनी मेहनत के बूते एक नई पहचान गढ़ने में पूरी तरह कामयाब हो रही हैं।



















