यूरोपीय सेंट्रल बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री लेन ने अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति और मौद्रिक नीति को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऊर्जा संकट के कारण बढ़ी महंगाई ही ब्याज दरों के फैसलों को प्रभावित करने वाला मुख्य कारक रही है। ऊर्जा की लागत उच्च स्तर पर बनी हुई है, लेकिन अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में इसका प्रभाव किस सीमा तक पहुंचेगा, इसे लेकर स्थिति अब भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। दीर्घकालिक ब्याज दरों सहित व्यापक वित्तीय स्थितियां केंद्रीय बैंक के नीतिगत फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके अलावा आर्थिक वृद्धि को गति देने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI के समर्थन की भूमिका को भी देखा जा रहा है। आने वाले वर्षों के राजकोषीय सहयोग पर चर्चा करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि 2027 और 2028 में अर्थव्यवस्था को मिलने वाला सरकारी नीतिगत समर्थन 2026 की तुलना में काफी अलग रहने वाला है।
मुद्रास्फीति और नीतिगत फैसलों के बीच केंद्रीय बैंक का असमंजस
सामान्य परिस्थितियों में जब मुद्रास्फीति अपने निर्धारित लक्ष्य से लगभग दोगुनी रफ्तार से भाग रही होती है, तो केंद्रीय बैंक का सबसे स्वाभाविक कदम ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी करना होता है। वर्तमान में हालात काफी जटिल बने हुए हैं। इस समय बॉन्ड बाजार पहले से ही सख्ती का एक बड़ा हिस्सा खुद ही संभाल रहा है, जिससे केंद्रीय बैंक के सामने नीतियों को संतुलित करने की एक गहरी दुविधा पैदा हो गई है। जब बॉन्ड यील्ड पहले से ही बढ़े हुए स्तर पर हों, तो नीतिगत दरों को अत्यधिक आक्रामक तरीके से बढ़ाने से आर्थिक मंदी का जोखिम गहरा जाता है। ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतों के बीच बाकी अर्थव्यवस्था में उसके असर की अनिश्चितता ने इस डर को कुछ हद तक सीमित किया है, जिससे दरों में बहुत जल्दबाजी में भारी वृद्धि की जरूरत पर सवाल उठ रहे हैं।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर की मजबूती का अन्य मुद्राओं पर दबाव
वैश्विक वित्तीय बाजारों में फिक्स्ड इनकम बाजार में लगातार गिरावट का सिलसिला देखा जा रहा है, जिसने अमेरिकी बॉन्ड यील्ड को कई वर्षों के उच्च स्तर के करीब बनाए रखा है। इस स्थिति ने पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के साथ मिलकर अमेरिकी डॉलर को मजबूती दी है। हालांकि अक्टूबर में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदें कमजोर पड़ी हैं, फिर भी डॉलर अपना मजबूत रुख बनाए रखने में सफल रहा है। इसका सीधा असर अन्य प्रमुख वैश्विक मुद्राओं पर देखा गया है। एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान AUD/USD में गिरावट दर्ज की गई, जिससे पिछले सप्ताह छूए गए दो महीने के निचले स्तर से पिछले दो दिनों से जारी रिकवरी की चाल थम गई। ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा को इस महीने RBA द्वारा संभावित दर वृद्धि की उम्मीदों से कुछ सहारा जरूर मिल सकता है, जो इसके लिए सहायक साबित हो सकता है।
जापानी येन और सोने की चाल पर वैश्विक हलचल
यूरोपीय सुबह के शुरुआती घंटों में USD/JPY की दर 158.00 के स्तर से ऊपर निकल गई। यह उछाल तब देखने को मिला जब बैंक ऑफ जापान यानी BoJ द्वारा सख्त रुख अपनाने की अटकलों और सरकार द्वारा मुद्रा बाजार में संभावित हस्तक्षेप के जोखिम के बावजूद जापानी येन में कोई खास मजबूती नहीं दिखी। भू-राजनीतिक अस्थिरता और ऊंची अमेरिकी यील्ड के चलते डॉलर अपने वार्षिक उच्च स्तर के करीब टिका हुआ है, जिसने इस मुद्रा जोड़ी को निरंतर समर्थन प्रदान किया। सोने के बाजार में भी नरमी का रुख बना रहा। यूरोपीय सत्र की शुरुआत तक सोना मामूली इंट्राडे नुकसान के साथ कारोबार कर रहा था, हालांकि यह 4,100 डॉलर के स्तर से ऊपर टिके रहने में कामयाब रहा, जो मंगलवार को ही छुए गए दो महीने के निचले स्तर के करीब है। डॉलर की मजबूती सर्राफा की मांग को सीमित कर रही है, लेकिन फेडरल रिजर्व द्वारा अक्टूबर में दर वृद्धि की घटती संभावनाएं सोने में और अधिक तेज गिरावट को रोकने में मदद कर रही हैं।
यूरोप में राजनीतिक संकट और आगामी दिशा
आर्थिक संकेतकों के मोर्चे पर किसी बड़े प्रथम श्रेणी के आंकड़े का अभाव होने के कारण निवेशकों का पूरा ध्यान यूरोपीय बाजार और पश्चिम एशिया के राजनीतिक घटनाक्रमों पर टिका हुआ है। विशेष रूप से फ्रांस में आने वाले दिनों की राजनीतिक दिशा बेहद अहम रहने वाली है। वहां समाजवादी गुट और मरीन ले पेन की नेशनल रैली के रुख पर सबकी नजरें हैं कि क्या वे बजट के मुद्दे पर मौजूदा सरकार को गिराने के लिए तैयार हैं। फ्रांस में बजट को लेकर सरकार गिरने का कोई भी संकेत पूरे यूरोपीय संघ के वित्तीय माहौल और बॉन्ड यील्ड्स को हिला सकता है। यूरोप में ऊर्जा लागत, बॉन्ड बाजार की सख्ती और राजनीतिक अनिश्चितता का यह त्रिकोण आने वाले समय में केंद्रीय बैंक के ब्याज दर फैसलों को काफी हद तक निर्धारित करेगा।















