भारतीय अर्थव्यवस्था की व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े अगस्त महीने के शुरुआती आंकड़े सामने आ गए हैं। जारी किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार देश के विनिर्माण यानी मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की रफ्तार में थोड़ा धीमापन देखा गया है, जबकि सेवा क्षेत्र और समग्र कारोबारी गतिविधियों में मजबूती दर्ज की गई है। एसएंडपी ग्लोबल और एचएसबीसी बैंक द्वारा शुक्रवार को साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में भारत का प्रारंभिक एचएसबीसी मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) घटकर 52.9 पर आ गया है, जो इससे पिछले महीने में 53.5 के स्तर पर था। मैन्युफैक्चरिंग में इस मामूली गिरावट के बावजूद 50 से ऊपर का अंक इस बात का संकेत है कि विनिर्माण क्षेत्र में विस्तार की प्रक्रिया लगातार बनी हुई है।
दूसरी ओर देश का सेवा क्षेत्र अगस्त के दौरान अधिक मजबूत स्थिति में दिखाई दिया है। आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत का एचएसबीसी सर्विसेज पीएमआई अगस्त में बढ़कर 54.5 के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले महीने 53.3 दर्ज किया गया था। सेवा क्षेत्र में आए इस उछाल के चलते देश का समग्र आर्थिक प्रदर्शन भी बेहतर हुआ है। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों को मिलाकर तैयार किया जाने वाला कंपोजिट पीएमआई अगस्त में बढ़कर 54.6 पर पहुंच गया, जो इससे पिछले आंकड़े में 54.3 के स्तर पर था। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी घटक मजबूत बने हुए हैं और देश में व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार लगातार जारी है।
दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि और विदेशी निवेश का प्रवाह
भारतीय अर्थव्यवस्था का पिछला रिकॉर्ड विश्व स्तर पर काफी सराहनीय रहा है। वर्ष 2006 से लेकर 2023 के बीच भारत की औसतन वृद्धि दर 6.13% रही है, जिसने इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में ला खड़ा किया है। इस मजबूत और निरंतर आर्थिक विस्तार ने दुनिया भर के विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया है। भारत में आने वाले इस पूंजी प्रवाह को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला भाग प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई है, जिसके तहत विदेशी कंपनियां देश में भौतिक परियोजनाओं, कारखानों और बुनियादी ढांचे में सीधे धन लगाती हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण माध्यम विदेशी अप्रत्यक्ष निवेश यानी एफआईआई का है, जिसमें विदेशी फंडों और वित्तीय संस्थानों द्वारा भारत के शेयर बाजार तथा बॉन्ड बाजार जैसे वित्तीय साधनों में निवेश किया जाता है। जब भी अंतरराष्ट्रीय निवेशक भारत में अपनी पूंजी लगाने का फैसला करते हैं, तो उन्हें भारतीय परिसंपत्तियों को खरीदने के लिए डॉलर बेचकर भारतीय रुपया (INR) हासिल करना होता है। इस प्रक्रिया से विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की मांग में भारी बढ़ोतरी होती है, जो भारतीय मुद्रा के मूल्य को सहारा प्रदान करती है। हालांकि इसके साथ ही भारतीय आयातकों द्वारा अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिकी डॉलर (USD) की मांग में होने वाले उतार-चढ़ाव भी रुपये की दैनिक विनिमय दर को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।
कच्चे तेल का आयात और भारतीय रुपये की विनिमय दर
भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती देश का ऊर्जा आयात बिल है। भारत अपनी आवश्यकता के कच्चे तेल और पेट्रोल का एक बहुत बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आयात करता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कच्चे तेल की खरीद-बिक्री मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर (USD) में ही की जाती है, इसलिए वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला कोई भी फेरबदल सीधे तौर पर भारतीय रुपये की विनिमय दर पर असर डालता है।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊपर जाती हैं, तो भारतीय तेल आयातकों को उतनी ही मात्रा में तेल खरीदने के लिए अधिक डॉलर का भुगतान करना पड़ता है। इससे बाजार में डॉलर की कुल मांग अचानक बढ़ जाती है। इस अतिरिक्त डॉलर मांग की भरपाई करने के लिए आयातकों को मुद्रा बाजार में अधिक मात्रा में भारतीय रुपये बेचने पड़ते हैं। बाजार में रुपये की आपूर्ति बढ़ने और डॉलर की मांग में उछाल आने के कारण भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होने लगता है। इस प्रकार कच्चे तेल की महंगी दरें सीधे तौर पर देश की मुद्रा पर मूल्यह्रास का दबाव बनाती हैं।
मुद्रास्फीति का प्रभाव और भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति
मुद्रास्फीति यानी महंगाई का भारतीय रुपये के मूल्य पर एक जटिल और बहुआयामी प्रभाव पड़ता है। एक स्तर पर देखा जाए तो बढ़ती हुई मुद्रास्फीति यह दर्शाती है कि अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ गई है, जिससे रुपये की क्रय शक्ति या समग्र आंतरिक मूल्य कम होने लगता है। हालांकि, जब मुद्रास्फीति का स्तर भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के निर्धारित 4% के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर निकल जाता है, तो केंद्रीय बैंक को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
आरबीआई महंगाई को नियंत्रण में लाने के लिए अपनी नीतिगत ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है, ताकि बाजार में ऋण की उपलब्धता को महंगा और सीमित किया जा सके। जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, विशेष रूप से वास्तविक ब्याज दरें (जो कि nominal ब्याज दर और मुद्रास्फीति दर के बीच का अंतर होती हैं), तो भारतीय वित्तीय बाजार अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक हो जाते हैं। विदेशी निवेशक बेहतर रिटर्न हासिल करने के लिए अपना धन भारत में लाने लगते हैं, जिससे रुपये की मांग बढ़ती है और मुद्रा मजबूत होती है। इसके विपरीत यदि मुद्रास्फीति कम रहती है, तो यह रुपये के मूल्य को स्थिर समर्थन दे सकती है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप ब्याज दरों में कटौती का चक्र शुरू हो सकता है, जिसका रुपये पर कुछ हद तक नकारात्मक दबाव भी पड़ सकता है।
व्यापार घाटा और बाजार की अस्थिरता का मुद्रा पर असर
भारत का हालिया व्यापारिक इतिहास यह दर्शाता है कि देश लगातार व्यापार घाटे यानी ट्रेड डेफिसिट की स्थिति में बना रहा है। इसका तात्पर्य यह है कि भारत द्वारा विदेशों से किए जाने वाले वस्तुओं का कुल आयात, देश द्वारा किए जाने वाले निर्यात के मुकाबले अधिक रहता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार का अधिकांश लेन-देन अमेरिकी डॉलर में निष्पादित होने के कारण, आयात की अधिक मात्रा लगातार डॉलर की मांग को बनाए रखती है।
कुछ विशेष अवधियों के दौरान, जैसे कि त्योहारी सीजन में कच्चे माल की भारी मांग या आयात ऑर्डरों के एक साथ आने से, मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इन चरणों में भारतीय आयातकों द्वारा डॉलर जुटाने के लिए बड़े पैमाने पर रुपये की बिक्री की जाती है, जिससे रुपया दबाव में आ जाता है और इसकी विनिमय दर में गिरावट दर्ज की जाती है। इसके अतिरिक्त, जब भी वैश्विक या घरेलू वित्तीय बाजारों में अस्थिरता और अनिश्चितता का माहौल बनता है, तो निवेशक सुरक्षित संपत्ति माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर का रुख करते हैं। बाजार की इस उथल-पुथल के समय भी डॉलर की मांग में तेज उछाल आता है, जिसका नकारात्मक असर भारतीय रुपये की सेहत पर पड़ता है।
USD/INR का लाइव बाजार डेटा और तकनीकी विश्लेषण
वित्तीय बाजार के ताजा सत्र में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये (USD/INR) की विनिमय दर 95.73 पर कारोबार करती हुई देखी गई है, जो कि इसके पिछले बंद स्तर 95.50 के मुकाबले +0.24% की बढ़त दर्शाती है। इस मुद्रा जोड़ी का 52 हफ्तों का कारोबार दायरा 85.86 से 97.05 के बीच दर्ज किया गया है। ट्रेडिंग वॉल्यूम की बात करें तो यह इसके 20-दिवसीय औसत के 1.00x स्तर पर बना हुआ है, जो बाजार में सामान्य भागीदारी को दर्शाता है।
तकनीकी संकेतकों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि 14-दिवसीय रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) वर्तमान में 53 के स्तर पर है, जो न तो अत्यधिक खरीदे गए (overbought) और ना ही अत्यधिक बेचे गए (oversold) क्षेत्र का संकेत देता है। एमएसीडी (MACD) इंडिकेटर -0.02 पर है, जो इसके सिग्नल स्तर -0.05 के ऊपर है और इसका हिस्टोग्राम 0.03 के साथ बुलिश रुख दिखा रहा है। मूविंग एवरेज पर नजर डालें तो 20-दिवसीय ईएमए 95.58, 50-दिवसीय ईएमए 95.48 और 200-दिवसीय ईएमए 92.95 पर स्थित है। 50-दिवसीय ईएमए का 200-दिवसीय ईएमए से ऊपर होना (गोल्डन क्रॉस) दीर्घकालिक तेजी के रुझान की पुष्टि करता है।
बोलिंजर बैंड्स (20,2) के अनुसार मूल्य 94.88 के निचले बैंड और 96.16 के ऊपरी बैंड के भीतर ट्रेड कर रहे हैं, जिसका मध्य स्तर 95.52 है। एवरेज डायरेक्शनल इंडेक्स (ADX) 24 के स्तर पर है, जो बाजार में किसी मजबूत ट्रेंड के बजाय सीमित दायरे की गतिविधि का संकेत देता है। स्टोकेस्टिक इंडिकेटर की फास्ट लाइन 90 और सिग्नल लाइन 85 पर बनी हुई है। बाजार की दैनिक अस्थिरता को मापने वाला एटीआर (ATR 14) 0.48 पर है, जिसे स्टॉप-लॉस बफर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। आगामी सत्र के लिए मुख्य पिवट प्वाइंट 95.70 पर है, जबकि ऊपर की तरफ रेजिस्टेंस R1 95.76 और R2 95.78 पर तथा नीचे की तरफ सपोर्ट S1 95.67 और S2 95.62 पर देखा जा रहा है। 20-दिवसीय दायरा ~94.80 के सपोर्ट और ~96.57 के रेजिस्टेंस को दर्शाता है।



















