अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में जापानी येन ने संकीर्ण दायरे में अपनी चाल स्थिर रखी है, जहां एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान यूएसडी/जेपीवाई (USD/JPY) 157.90 के आसपास घूमता रहा। बीते कारोबारी दिन में हल्की बढ़त दर्ज करने के बाद यह मुद्रा जोड़ी लगभग सपाट स्तर पर बनी हुई है। मुद्रा बाजार में एक तरफ जापान की घरेलू वित्तीय नीतियां दबाव बना रही हैं, तो दूसरी ओर केंद्रीय बैंक की भविष्य की योजनाओं को लेकर असमंजस बना हुआ है। इसके साथ ही भू-राजनीतिक तनाव और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बॉन्ड बाजार की हलचल वैश्विक स्तर पर मुद्राओं की दिशा तय कर रही है।
जापान में कर कटौती और राजकोषीय संतुलन का फॉर्मूला
जापान की प्रधानमंत्री ताकाइची ने देश में कर कटौती लागू करने की योजना सामने रखी है। वित्तीय बाजारों को आश्वस्त करने के लिए सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि इन कर कटौतियों के लिए नए बॉन्ड जारी करके कर्ज नहीं जुटाया जाएगा। सरकार का यह कदम बिना अतिरिक्त उधारी बढ़ाए अर्थव्यवस्था को गति देने और साथ ही वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने की दोहरी रणनीति का हिस्सा है। वित्तीय बाजार इस बात पर करीब से नजर रख रहे हैं कि बिना नए ऋण पत्र जारी किए राजस्व की कमी की भरपाई किस तरह की जाएगी, क्योंकि इससे देश के संप्रभु ऋण बाजार पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ेगा।
बैंक ऑफ जापान की मौद्रिक नीति और ब्याज दरों पर असमंजस
घरेलू राजकोषीय घटनाक्रम के साथ ही बैंक ऑफ जापान (BoJ) के अगले कदमों को लेकर बाजार में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। केंद्रीय बैंक की सितंबर बैठक की राय के सारांश से यह बात स्पष्ट हुई है कि मुद्रास्फीति के 2% के तय लक्ष्य से ऊपर निकल जाने की चिंता लगातार बढ़ रही है। इस बढ़ती महंगाई के कारण चालू वर्ष के भीतर एक और ब्याज दर वृद्धि की संभावना पूरी तरह खुली हुई है। हालांकि, अक्टूबर और दिसंबर में होने वाली आगामी नीतिगत बैठकों के मद्देनजर बैंक ने यह साफ नहीं किया है कि दरों में अगला बदलाव किस सटीक समय पर किया जाएगा। नीति निर्माताओं के इस सख्त रुख के कारण येन को निचले स्तरों पर कुछ सहारा मिला है, जबकि संभावित बाजार हस्तक्षेप का जोखिम भी सटोरियों को आक्रामक सौदे करने से रोक रहा है।
एचएसबीसी का विश्लेषण: अमेरिकी महंगाई के पीछे कॉरपोरेट मुनाफा
वैश्विक वित्तीय संस्था एचएसबीसी (HSBC) के रणनीतिकारों ने अमेरिकी महंगाई की प्रकृति पर अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। आम तौर पर मुद्रास्फीति के लिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, कंप्यूटिंग लागतों में उछाल और व्यापारिक शुल्कों के लंबे समय से बने प्रभावों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। हालांकि, एचएसबीसी के अनुसार जब इस स्थिति को सकल मूल्य संवर्धित डिफ्लेटर के चश्मे से देखा जाता है, तो तस्वीर अलग नजर आती है। यह पैमाना मुनाफे, वेतन और गैर-श्रम लागतों से उत्पन्न होने वाली महंगाई को मापता है। इस विश्लेषण से संकेत मिलता है कि हेडलाइन मुद्रास्फीति में हालिया तेजी केवल उत्पादन लागत के दबावों से प्रेरित नहीं है, बल्कि इसके पीछे मुख्य रूप से कंपनियों के मुनाफे में हुई मजबूत वृद्धि जिम्मेदार रही है।
अमेरिकी डॉलर का वैश्विक प्रभाव और फेडरल रिजर्व की भूमिका
अमेरिकी डॉलर (USD) संयुक्त राज्य अमेरिका की आधिकारिक मुद्रा होने के साथ-साथ कई अन्य देशों में भी स्थानीय नोटों के समानांतर स्वतंत्र रूप से प्रचलन में है। वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार यह दुनिया की सबसे अधिक कारोबार की जाने वाली मुद्रा है, जिसकी वैश्विक विदेशी मुद्रा विनिमय टर्नओवर में 88% से अधिक हिस्सेदारी है और रोजाना औसतन 6.6 ट्रिलियन डॉलर का लेन-देन इसमें होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के समापन के बाद अमेरिकी डॉलर ने ब्रिटिश पाउंड की जगह लेते हुए दुनिया की प्रमुख आरक्षित मुद्रा का स्थान हासिल किया था। अपने इतिहास के लंबे हिस्से में डॉलर को सोने का समर्थन प्राप्त था, लेकिन 1971 के ब्रेटन वुड्स समझौते के खत्म होने के साथ ही गोल्ड स्टैंडर्ड समाप्त हो गया।
अमेरिकी डॉलर के मूल्य को प्रभावित करने वाला सबसे अहम कारक फेडरल रिजर्व (Fed) की मौद्रिक नीति है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक के पास मूल्य स्थिरता बनाए रखने यानी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और पूर्ण रोजगार को बढ़ावा देने के दो मुख्य अधिदेश हैं। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए फेडरल रिजर्व का मुख्य हथियार ब्याज दरों का समायोजन है। जब कीमतें बहुत तेजी से भागती हैं और महंगाई 2% के लक्ष्य से ऊपर चली जाती है, तो फेड ब्याज दरें बढ़ाता है, जिससे डॉलर को मजबूती मिलती है। इसके विपरीत, जब मुद्रास्फीति 2% से नीचे खिसक जाती है या बेरोजगारी दर बढ़ जाती है, तो फेडरल रिजर्व दरों में कटौती कर सकता है, जिससे डॉलर पर दबाव बनता है।
असाधारण नीतियां: क्वांटिटेटिव ईजिंग और क्वांटिटेटिव टाइटनिंग
अत्यधिक गंभीर आर्थिक परिस्थितियों में फेडरल रिजर्व अतिरिक्त डॉलर छापकर क्वांटिटेटिव ईजिंग (QE) लागू करने की क्षमता रखता है। यह एक गैर-मानक नीतिगत उपाय है, जिसके जरिए केंद्रीय बैंक संकट में फंसे वित्तीय तंत्र में ऋण के प्रवाह को बड़े पैमाने पर बढ़ाता है। जब बैंकों के बीच एक-दूसरे को कर्ज देने में हिचकिचाहट पैदा हो जाती है और ऋण व्यवस्था सूख जाती है, तब यह कदम उठाया जाता है। वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान क्रेडिट संकट से निपटने के लिए फेड ने इसी हथियार का इस्तेमाल किया था। इसके तहत केंद्रीय बैंक अतिरिक्त डॉलर छापकर मुख्य रूप से वित्तीय संस्थानों से अमेरिकी सरकारी बॉन्ड खरीदता है, जिससे आमतौर पर अमेरिकी डॉलर में कमजोरी आती है।
क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (QT) इसकी ठीक विपरीत प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत फेडरल रिजर्व वित्तीय संस्थानों से बॉन्ड खरीदना बंद कर देता है और परिपक्व होने वाले बॉन्ड की मूल राशि का पुनर्निवेश नहीं करता। बाजार से नकदी खींचने वाली यह प्रक्रिया आमतौर पर अमेरिकी डॉलर के लिए सकारात्मक और मजबूती प्रदान करने वाली मानी जाती है।
पश्चिम एशिया में तनाव और सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की मांग
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक संघर्ष के गहराने से वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ी है, जिसके चलते सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की मांग तेज हो सकती है। अमेरिकी बॉन्ड बाजार में जारी बिकवाली के कारण बॉन्ड यील्ड कई वर्षों के उच्चतम स्तर के करीब बनी हुई है। हालांकि फेडरल रिजर्व द्वारा अक्टूबर में दरें बढ़ाने की संभावना कमजोर पड़ी है, लेकिन यील्ड के ऊंचे स्तर और भू-राजनीतिक जोखिमों के चलते डॉलर अपनी मजबूती बनाए हुए है। यूएसडी/जेपीवाई (USD/JPY) 158.00 के स्तर से नीचे फंसा हुआ है क्योंकि बैंक ऑफ जापान के सख्त रुख और संभावित सरकारी हस्तक्षेप की आशंका डॉलर की बढ़त को सीमित कर रही है।
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर, सोना और यूरोपीय केंद्रीय बैंक की दुविधा
अन्य प्रमुख संपत्तियों पर नजर डालें तो ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (AUD/USD) में एशियाई सत्र के दौरान हल्की गिरावट दर्ज की गई, जिससे पिछले सप्ताह दो महीने के निचले स्तर से शुरू हुआ दो दिवसीय सुधार थम गया। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और भू-राजनीतिक अनिश्चितता डॉलर को बल दे रही है, लेकिन रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) द्वारा चालू महीने में एक और ब्याज दर वृद्धि की उम्मीद ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा को सहारा दे सकती है।
उधर सोने की कीमतों में भी कोई स्पष्ट तेजी देखने को नहीं मिली है और पीली धातु मंगलवार के एशियाई सत्र में 4,150 डॉलर प्रति औंस के नीचे स्थिर बनी रही। अक्टूबर में फेड द्वारा दर वृद्धि की संभावना घटने से गैर-ब्याज वाली संपत्तियों को समर्थन मिलता है, लेकिन डॉलर के मजबूत रुख ने सोने की बढ़त को रोक रखा है। निवेशक भविष्य के नीतिगत संकेतों के लिए बुधवार को जारी होने वाले एफओएमसी (FOMC) मिनट्स का इंतजार कर रहे हैं। इस बीच यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) के सामने भी असमंजस की स्थिति है। सामान्य तौर पर जब मुद्रास्फीति तय लक्ष्य से लगभग दोगुनी हो, तो दरें बढ़ाना सीधा उपाय होता है, लेकिन वर्तमान में बॉन्ड बाजार पहले ही सख्ती का एक बड़ा हिस्सा खुद पूरा कर रहा है, जिससे यूरोपीय नीति निर्माताओं के सामने कठिन चुनौती खड़ी हो गई है।


















