अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में बुधवार के कारोबारी सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा दबाव के बावजूद 0.6970 के स्तर के आसपास संभलने का प्रयास करती नजर आई। शुरुआती गिरावट के बाद खरीदारी लौटने से विनिमय दर को थोड़ा सहारा जरूर मिला, फिर भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इसमें 0.19 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई। दिन के शुरुआती घंटों में कमजोर शुरुआत देखने को मिली थी, लेकिन बाद में भाव 0.6958 के करीब पहुंचते ही खरीदारों ने दिलचस्पी दिखाई। वैश्विक विनिमय पटल पर अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा की चाल मिली-जुली रही, जिसमें ब्रिटिश पाउंड के सामने यह सबसे अधिक कमजोर साबित हुई। इसके उलट, अमेरिकी डॉलर भी उत्तरी अमेरिकी सत्र में सामने आने वाले अहम रोजगार और व्यक्तिगत उपभोग व्यय आंकड़ों से पहले सतर्क चाल दिखा रहा है।
महंगाई की रफ्तार और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाएं
घरेलू मोर्चे पर अगस्त महीने के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जुड़े आंकड़ों ने बाजार की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाई है। जारी रिपोर्ट के अनुसार सालाना आधार पर मुद्रास्फीति की दर बढ़कर 4 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो जुलाई में 3.5 प्रतिशत के स्तर पर दर्ज की गई थी। इस आंकड़े ने वित्तीय बाजार में उन चर्चाओं को फिर से हवा दे दी है कि रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया निकट भविष्य में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी का कदम उठा सकता है। केंद्रीय बैंक इस वर्ष अब तक अपनी नीतिगत दरों में 100 आधार अंकों यानी 1 प्रतिशत का इजाफा करके उन्हें 4.6 प्रतिशत तक पहुंचा चुका है।
बाजार की इस स्थिति का विश्लेषण करते हुए कमर्जबैंक के विश्लेषकों का मानना है कि मुद्रास्फीति से जुड़े ताजे आंकड़े यह दर्शाते हैं कि कारोबारी केंद्रीय बैंक की तरफ से अतिरिक्त दर वृद्धि की गुंजाइश क्यों देख रहे थे। नीतिगत समीक्षा बैठक के तुरंत बाद सामने आए इन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के नंबरों ने यह साफ कर दिया है कि मौद्रिक नीति को लेकर सतर्क और सख्त रुख बनाए रखने की जरूरत अभी खत्म नहीं हुई है। हालांकि एशियाई सत्र के दौरान कम स्तरों पर यह चर्चा भी सुनने को मिली कि यदि अंतर्निहित महंगाई दर अनुमानों से थोड़ी भी ढीली पड़ती है, तो सख्त कदमों की गति धीमी हो सकती है। इसके अलावा चीनी पीएमआई आंकड़ों से भी ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा को कोई खास सहारा नहीं मिल सका।
अमेरिकी वृहद आर्थिक आंकड़ों पर टिकी नजरें
दूसरी तरफ अमेरिकी मुद्रा की चाल पर भी आगामी आर्थिक घटनाओं का गहरा असर देखने को मिल रहा है। निवेशक संयुक्त राज्य अमेरिका के सितंबर महीने के एडीपी रोजगार परिवर्तन और अगस्त के पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर प्राइस इंडेक्स के जारी होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अमेरिकी ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक एनालिसिस द्वारा बुधवार को 12:30 जीएमटी पर व्यक्तिगत उपभोग व्यय सूचकांक पेश किया जाना है। फेडरल रिजर्व इस खास महंगाई सूचकांक को अपनी नीतियों का आधार बनाने के लिए बेहद गंभीरता से देखता है, इसलिए इसके आने से पहले बॉन्ड यील्ड और डॉलर इंडेक्स दोनों में सीमित हलचल दिखाई दे रही है।
वैश्विक बाजार के अन्य हिस्सों पर नजर डालें तो अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में नरमी के कारण डॉलर दो महीने के उच्च स्तर से नीचे खिसका, जिससे सोने की कीमतों को सहारा मिला और वह 4,200 डॉलर के पास स्थिर कारोबार करता दिखा। वहीं डॉलर-येन जोड़ी 157.00 के नीचे दबाव में बनी रही क्योंकि बैंक ऑफ जापान की संभावित सख्ती और बाजार में हस्तक्षेप के जोखिम ने जापानी मुद्रा को मजबूती दी। डिजिटल परिसंपत्ति क्षेत्र में बिटकॉइन 85,000 डॉलर के पार टिकने में विफल रहने के बाद 83,000 डॉलर के इर्द-गिर्द दायरे में सिमटा हुआ देखा गया, जहां निवेशक अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड की दिशा देखकर सतर्कता बरत रहे हैं।
चार्ट पर तकनीकी स्तर और समर्थन-प्रतिरोध
तकनीकी चार्ट संरचना पर नजर डालें तो ऊपर की ओर विनिमय दर को तत्काल रुकावट का सामना 61.8 प्रतिशत रिट्रेसमेंट स्तर 0.7008 पर करना पड़ सकता है। यदि यह बाधा पार होती है, तो 50.0 प्रतिशत का स्तर 0.7052 और 20-दिवसीय ईएमए 0.7078 पर अगले अवरोधक बन सकते हैं। इसके बाद 38.2 प्रतिशत रिट्रेसमेंट 0.7096 और 23.6 प्रतिशत स्तर 0.7150 के रूप में दिखाई देते हैं, जो 0.7238 के ऊपरी चक्र तक की बढ़त को सीमित करने की क्षमता रखते हैं।
दूसरी ओर नीचे की तरफ गिरावट की स्थिति में फौरी सहारा 78.6 प्रतिशत रिट्रेसमेंट स्तर 0.6946 पर मौजूद है। इसके नीचे 100.0 प्रतिशत फाइबोनैचि स्तर 0.6866 के आसपास स्थित है। यदि बिकवाली का दबाव बढ़ता है और संकेतक ओवरसोल्ड क्षेत्र की तरफ बढ़ते हैं, तो इस स्तर पर मुनाफावसूली देखने को मिल सकती है जिससे मंदी की रफ्तार पर कुछ समय के लिए ब्रेक लग सकता है।
लाइव मार्केट आंकड़ों के अनुसार, इस समय जोड़ी 0.6952 पर कारोबार कर रही है, जो पिछले बंद स्तर 0.7016 की तुलना में 0.92 प्रतिशत की गिरावट दर्शाती है। इसका 52-सप्ताह का दायरा 0.6422 से 0.7277 के बीच रहा है। लाइव संकेतकों में 14-दिवसीय आरएसआई 27 के स्तर पर है, जो ओवरसोल्ड स्थिति का संकेत देता है। एमएसीडी सूचक भी मंदी की पुष्टि कर रहा है। गतिमान औसतों में 20-दिवसीय ईएमए 0.7083, 50-दिवसीय ईएमए 0.7088 और 200-दिवसीय ईएमए 0.6965 पर स्थित हैं। बोलिंजर बैंड के निचले दायरे 0.6963 के नीचे भाव चल रहा है और ट्रेंड की मजबूती दर्शाने वाला एडीएक्स 32 पर है। दैनिक आधार पर धुरी स्तर 0.6967 है, जबकि प्रतिरोध आर1 0.6982 व आर2 0.7013 तथा समर्थन एस1 0.6936 व एस2 0.6920 पर आंका गया है।
केंद्रीय बैंक का कार्यप्रणाली ढांचा और मुद्रा की दिशा
ऑस्ट्रेलिया में ब्याज दरों के निर्धारण और मौद्रिक नीति के संचालन की कमान रिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया के पास है। इसके नीतिगत फैसले बोर्ड ऑफ गवर्नर्स द्वारा साल भर में आयोजित 11 नियमित बैठकों और जरूरत पड़ने पर आपात बैठकों के जरिए लिए जाते हैं। केंद्रीय बैंक की मूल जिम्मेदारी कीमतों में स्थिरता बनाए रखना है, जिसके तहत महंगाई को 2 से 3 प्रतिशत के दायरे में रखने का लक्ष्य रखा जाता है। इसके साथ ही मुद्रा की स्थिरता, पूर्ण रोजगार और देश की जनता की आर्थिक समृद्धि एवं कल्याण को सुनिश्चित करना भी इसके दायित्वों में शामिल है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को घटाने या बढ़ाने का प्राथमिक हथियार अपनाता है। आमतौर पर ऊंची ब्याज दरें पूंजी प्रवाह को आकर्षित कर मुद्रा को मजबूत बनाती हैं, जबकि दरों में कटौती से मुद्रा कमजोर होती है।
पुराने आर्थिक सिद्धांतों में महंगाई को मुद्रा के मूल्य के लिए नकारात्मक माना जाता था क्योंकि यह पैसे की क्रय शक्ति घटाती है। परंतु आधुनिक युग में सीमा पार पूंजी नियंत्रण हटने के बाद स्थिति उलट चुकी है। जब किसी देश में मुद्रास्फीति बढ़ती है, तो उसका केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाने की ओर कदम बढ़ाता है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक निवेशक बेहतर रिटर्न की तलाश में अपनी पूंजी वहां लगाने लगते हैं, जिससे संबंधित देश की मुद्रा की मांग में तेजी आती है।
इसके अलावा अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य को आंकने वाले व्यापक आर्थिक आंकड़े जैसे जीडीपी, विनिर्माण एवं सेवा पीएमआई, रोजगार संख्या और उपभोक्ता धारणा सर्वेक्षण भी विनिमय दर को गहराई से प्रभावित करते हैं। जब कोई अर्थव्यवस्था सुरक्षित और तेजी से बढ़ती हुई दिखाई देती है, तो वैश्विक निवेशक अपनी पूंजी वहां लगाना पसंद करते हैं, जिससे स्थानीय मुद्रा को समर्थन मिलता है। चरम परिस्थितियों में जब ब्याज दरों में कटौती पर्याप्त नहीं होती, तब केंद्रीय बैंक क्वांटिटेटिव ईजिंग यानी क्यूई का सहारा लेता है। इसके तहत नोट जारी कर वित्तीय संस्थानों से सरकारी या कॉरपोरेट बॉन्ड खरीदे जाते हैं ताकि तरलता बढ़ सके, जिससे अक्सर मुद्रा कमजोर होती है। वहीं इसके विपरीत स्थिति में आर्थिक सुधार के बाद जब मुद्रास्फीति बढ़ने लगती है, तो क्वांटिटेटिव टाइटनिंग यानी क्यूटी लागू की जाती है। इसमें नए बॉन्ड खरीदना बंद कर दिया जाता है, जो अंततः मुद्रा के मूल्य के लिए सकारात्मक साबित होता है।



















