भारत के नवीनतम पहली तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों को लेकर देश के राजनीतिक और आर्थिक गलियारों में एक नया विवाद खडा हो गया है। राष्ट्रीय आय के आंकड़ों की गणना और उनकी तुलनात्मक समीक्षा की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की है। सरकार ने उन सभी आरोपों को खारिज कर दिया है जिनमें कहा जा रहा था कि चालू वित्त वर्ष की विकास दर को कृत्रिम रूप से बेहतर और मजबूत दिखाने के उद्देश्य से पिछले वर्ष के जीडीपी आंकड़ों में बदलाव या कमी की गई है। सरकार का तर्क है कि आंकड़ों में यह अंतर आधार वर्ष में किए गए व्यापक संशोधन के कारण आया है, न कि आंकड़ों की हेरफेर की वजह से।
आधार वर्ष संशोधन और डेटा अंतर का मुख्य विवाद
इस पूरे विवाद के केंद्र में राष्ट्रीय लेखा प्रणाली के तहत भारत के जीडीपी डेटा गणना के लिए 2022-23 को नया आधार वर्ष स्वीकार किया जाना है। सरकारी स्पष्टीकरण के अनुसार, पुरानी सांख्यिकीय श्रृंखला और नई सांख्यिकीय श्रृंखला के तहत अलग-अलग तैयार किए गए आंकड़ों की सीधे तुलना करना भ्रामक और गलत निष्कर्षों की ओर ले जाता है। आलोचकों और विपक्षी नेताओं ने पिछले वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही के दौरान अर्थव्यवस्था के अनुमानित आकार में हुए संशोधन पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। पुरानी 2011-12 आधार वर्ष श्रृंखला के तहत पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही का सांकेतिक (नॉमिनल) जीडीपी अनुमान 86.05 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किया गया था, जिसे नई 2022-23 आधार वर्ष श्रृंखला लागू होने के बाद संशोधित करके लगभग 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया।
आलोचकों के दावे और 2.6% विकास दर का गणित
पिछले वर्ष के आधार आंकड़े में 86.05 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपये की कमी किए जाने के बाद आलोचकों का तर्क था कि कम आधार (लोअर बेस) के कारण मौजूदा तिमाही की जीडीपी वृद्धि दर स्वाभाविक रूप से काफी ऊंची और आकर्षित दिखाई देने लगती है। कुछ विपक्षी विचारकों और अर्थशास्त्रियों ने यह मुद्दा उठाया कि यदि तुलना के लिए पिछले अनुमानित 86.05 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को ही यथावत बनाए रखा जाता, तो नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर बेहद सुस्त रहती। इसी बहस के दौरान एक पूर्व वित्त सचिव के आकलन का हवाला भी दिया गया, जिसके अनुसार पुरानी गणना पद्धत पर आधारित तुलना करने पर चालू मूल्यों पर जीडीपी वृद्धि दर महज 2.6% ही निकल कर आती। हालांकि, सरकार ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ऐसा विश्लेषण सांख्यिकीय पद्धतियों के मूलभूत नियमों के खिलाफ है।
विभिन्न आधार वर्षों के आंकड़ों की सीधी तुलना क्यों अनुचित है?
सरकार की ओर से दिए गए प्राथमिक तर्क में इस बात पर जोर दिया गया है कि दो भिन्न-भिन्न आधार वर्षों पर आधारित जीडीपी आंकड़ों की आपस में सीधी तुलना करना पूरी तरह से अमान्य है। पुराना 86.05 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा 2011-12 की सांख्यिकीय श्रृंखला का हिस्सा था, जबकि 80 लाख करोड़ रुपये का नया संशोधित अनुमान अद्यतन 2022-23 आधार वर्ष ढांचे के तहत तैयार किया गया है। सांख्यिकी विशेषज्ञों और सरकारी स्पष्टीकरण के मुताबिक, दो अलग-अलग सांख्यिकीय प्रणालियों से प्राप्त आंकड़ों के इस्तेमाल से विकास दर की गणना करने पर परिणाम विकृत हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दोनों श्रृंखलाओं के पीछे की कार्यप्रणाली, आंकड़े जुटाने के स्रोत, क्षेत्रवार भार और मापन के मानक एक दूसरे से काफी भिन्न होते हैं।
88.27 लाख करोड़ रुपये के नए अनुमान का सही संदर्भ
आधिकारिक रुख के अनुसार, विवाद को सही सांख्यिकीय परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है। केंद्र सरकार का कहना है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (Q1) के लिए जारी 88.27 लाख करोड़ रुपये के नवीनतम नॉमिनल जीडीपी अनुमान की तुलना पिछले वर्ष की उसी समान तिमाही के संशोधित 80 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े के साथ ही की जानी चाहिए, क्योंकि ये दोनों आंकड़े 2022-23 की एक ही एकीकृत आधार वर्ष श्रृंखला पर आधारित हैं। सरकार का स्पष्ट मानना है कि नवीनतम 88.27 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पुरानी श्रृंखला के 86.05 लाख करोड़ रुपये के साथ जोड़कर देखना दो अलग-अलग गणना पद्धतियों का अनुचित मिश्रण होगा, जो देश की वास्तविक आर्थिक प्रगति का सही मापदंड प्रस्तुत नहीं कर सकता।
राष्ट्रीय लेखा प्रणाली में आधार वर्ष बदलने की आवश्यकता और प्रक्रिया
सांख्यिकी विज्ञान में जीडीपी का आधार वर्ष किसी भी अर्थव्यवस्था के कुल आकार और उसकी संरचनात्मक गतिविधियों में आ रहे परिवर्तनों को मापने के लिए एक मानक बेंचमार्क के रूप में काम करता है। समय के साथ जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था का विस्तार होता है और उसमें नए क्षेत्र जुड़ते हैं, सरकारें समय-समय पर अपने आधार वर्ष में संशोधन करती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य देश में बदल रहे उपभोग पैटर्न, उभरते नए उद्योगों, तेजी से हो रहे तकनीकी विकास और डेटा संग्रह की अत्याधुनिक तकनीकों को राष्ट्रीय खातों में सही ढंग से शामिल करना होता है। आधार वर्ष के संशोधन में केवल संदर्भ वर्ष बदलना ही शामिल नहीं होता, बल्कि सांख्यिकीय अधिकारी नए डेटा स्रोतों को शामिल करते हैं, विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों के योगदान की गणना में सुधार करते हैं और समग्र आर्थिक गतिविधियों के मापन की विधियों को अपग्रेड करते हैं। इसी प्रक्रिया के तहत जब नई श्रृंखला पेश की जाती है, तो पिछले वर्षों के जीडीपी अनुमानों में भी तदनुसार बदलाव आता है।



















