अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की तेजी पर उस समय अचानक ब्रेक लग गया जब रूस से बड़े पैमाने पर ईंधन आपूर्ति का नया रास्ता खुल गया। न्यूयॉर्क और वैश्विक जिंस बाजारों में वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई की कीमतें 90.00 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छूने के बाद तेजी गंवा बैठीं। इस अचानक आई गिरावट की मुख्य वजह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत के बाद सामने आया एक नीतिगत कदम रहा, जिसके तहत अमेरिका और वैश्विक बाजार में रूसी डीजल की तत्काल खेप भेजने की घोषणा की गई। इस फैसले के तुरंत बाद अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय यानी ओएफएसी ने सामान्य लाइसेंस 135 जारी कर दिया, जिससे रूसी डीजल के आयात और बिक्री को कानूनी मंजूरी मिल गई। इस घोषणा से रिफाइनरी मार्जिन पर दबाव बढ़ गया और तेल वायदा में बिकवाली तेज हो गई।
रूसी डीजल आपूर्ति का खाका और लाइसेंस की शर्तें
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से टेलीफोन पर हुई चर्चा के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एलान किया कि रूस तुरंत अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए 300 हजार टन डीजल की आपूर्ति करेगा। आपूर्ति के इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए आगामी महीनों के आंकड़े भी तय किए गए हैं। तय योजना के मुताबिक नवंबर में 500 हजार टन और उसके बाद 1 मिलियन टन अतिरिक्त डीजल भेजा जाएगा। शुरुआती 300 हजार टन की खेप लगभग 2.2 मिलियन बैरल ईंधन के बराबर बैठती है। यह मात्रा अमेरिका में डिस्टिलेट ईंधनों की दैनिक खपत के आधे दिन से थोड़े अधिक हिस्से की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है, जिसमें मुख्य रूप से डीजल ही शामिल होता है।
नीतिगत स्तर पर इस कदम को मजबूती देने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के अंतर्गत काम करने वाले विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय ने तुरंत सक्रियता दिखाई। एजेंसी ने उसी दिन सामान्य लाइसेंस 135 जारी करते हुए औपचारिक अनुमति प्रदान कर दी। यह सामान्य लाइसेंस अमेरिकी धरती सहित अंतरराष्ट्रीय बाजारों में रूसी डीजल के आयात और बिक्री को 7 अप्रैल 2027 तक के लिए पूरी तरह वैध बनाता है। पिछले एक सप्ताह के भीतर डीजल की कीमतों पर लगाम लगाने के मकसद से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा उठाया गया यह दूसरा बड़ा कदम है। इससे पहले 2 अक्टूबर को उनके अनुरोध पर यूरोपीय संघ के देशों ने रणनीतिक डीजल भंडार से तेल जारी करने के फ्रांसीसी प्रस्ताव को अपनी सहमति दी थी।
रिफाइनरी मार्जिन और वायदा बाजार की चाल
इस बड़े कूटनीतिक और व्यापारिक घटनाक्रम का सीधा असर न्यूयॉर्क डीजल वायदा पर देखा गया। घोषणा सामने आते ही न्यूयॉर्क डीजल वायदा टूटकर 4.67 डॉलर प्रति गैलन के आसपास आ गया, जिससे गुरुवार को दर्ज की गई ज्यादातर तेजी पूरी तरह खत्म हो गई। यदि बैरल के पैमाने पर गणना की जाए तो यह भाव लगभग 196 डॉलर प्रति बैरल के बराबर बैठता है। दूसरी ओर डब्ल्यूटीआई कच्चा तेल 90.50 डॉलर के करीब कारोबार कर रहा था। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि अमेरिकी रिफाइनरियां जो डीजल तैयार कर रही थीं, उस पर प्रति बैरल 100 डॉलर से अधिक का भारी मार्जिन बन रहा था।
बाजार में आने वाली रूसी डीजल की खेप सीधे तौर पर अमेरिकी रिफाइनरियों द्वारा उत्पादित ईंधन से प्रतिस्पर्धा करेगी। जब तैयार उत्पाद का मार्जिन सिकुड़ता है, तो घरेलू रिफाइनरों के पास महंगा कच्चा तेल खरीदने का आर्थिक औचित्य काफी कम हो जाता है। इसी गणित के चलते कच्चे तेल की खरीदारी कमजोर पड़ी। हाजिर डब्ल्यूटीआई बाजार में घोषणा के बाद केवल दो पांच मिनट की कैंडल यानी दस मिनट के भीतर भाव 91.00 डॉलर के नजदीक से लुढ़क कर 90.00 डॉलर के ठीक नीचे पहुंच गया। इस अचानक आई गिरावट ने कारोबारी सत्र के निचले स्तर यानी 89.50 डॉलर से शुरू हुई तीन चौथाई तेजी को सोख लिया। यह तेज गिरावट उस समय दर्ज हुई जब कीमतें 91.50 डॉलर के स्तर को पार करने में दो बार असफल रहीं। बाद में डब्ल्यूटीआई कुछ संभलकर 90.50 डॉलर पर पहुंचा और 89.50 डॉलर से 91.50 डॉलर के सत्र दायरे के बीच टिक गया, जबकि इंट्राडे मोमेंटम ओवरबॉट से ओवरसोल्ड के करीब पहुंच गया।
डब्ल्यूटीआई कच्चा तेल और उसकी अहमियत
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल कई श्रेणियों में बेचा जाता है, जिनमें डब्ल्यूटीआई प्रमुख स्थान रखता है। डब्ल्यूटीआई का पूरा नाम वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट है। यह वैश्विक तेल व्यापार के तीन सबसे बड़े पैमानों में शामिल है, जिनमें ब्रेंट और दुबई क्रूड अन्य दो प्रमुख किस्में हैं। तकनीकी रूप से डब्ल्यूटीआई को लाइट और स्वीट कच्चा तेल कहा जाता है। इसके पीछे मुख्य कारण इसका कम घनत्व और सल्फर की बेहद कम मात्रा है। उच्च गुणवत्ता का तेल होने के कारण रिफाइनरियों के लिए इसे पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पादों में संसाधित करना काफी आसान और किफायती माना जाता है।
यह कच्चा तेल संयुक्त राज्य अमेरिका में निकाला जाता है और इसका प्रमुख वितरण केंद्र कुशिंग हब है, जिसे दुनिया का पाइपलाइन चौराहा भी कहा जाता है। कुशिंग हब की विशाल भंडारण और वितरण प्रणाली के कारण ही डब्ल्यूटीआई को तेल बाजार के एक प्रमुख मानक के तौर पर मान्यता मिली हुई है, और वित्तीय मीडिया में इसके भाव की लगातार चर्चा होती रहती है।
कच्चे तेल की कीमतें तय करने वाले बुनियादी कारक
अन्य सभी व्यापारिक संपत्तियों की तरह डब्ल्यूटीआई कच्चे तेल की कीमत को भी मांग और आपूर्ति के बुनियादी नियम संचालित करते हैं। जब वैश्विक आर्थिक विकास मजबूत होता है तो औद्योगिक गतिविधियों और परिवहन के कारण कच्चे तेल की मांग बढ़ती है, जिससे भाव ऊपर चढ़ते हैं। इसके विपरीत वैश्विक सुस्ती मांग को कमजोर कर कीमतों को गिरा देती है। राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और व्यापारिक प्रतिबंध आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर कीमतों में अचानक तेजी ला सकते हैं। इसके अलावा ओपेक के फैसले तेल बाजार की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होते हैं। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का अधिकांश कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर की मजबूती या कमजोरी का सीधा असर पड़ता है। कमजोर अमेरिकी डॉलर तेल को अन्य मुद्राओं के धारकों के लिए सस्ता बना देता है, जबकि मजबूत डॉलर इसे महंगा कर देता है।
साप्ताहिक इन्वेंट्री रिपोर्ट और आधिकारिक आंकड़े
कच्चे तेल के अल्पकालिक और मध्यमकालिक रुझान को समझने के लिए बाजार विश्लेषक साप्ताहिक इन्वेंट्री आंकड़ों पर पैनी नजर रखते हैं। इसमें अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट यानी एपीआई और एनर्जी इंफॉर्मेशन एजेंसी यानी ईआईए की रिपोर्ट सबसे प्रमुख मानी जाती हैं। भंडारों में आने वाला बदलाव वास्तविक आपूर्ति और मांग की स्थिति को बयां करता है। यदि साप्ताहिक आंकड़ों में कच्चे तेल के भंडार में गिरावट दर्ज होती है, तो यह मजबूत मांग का संकेत होता है और कीमतें ऊपर की तरफ भागती हैं। दूसरी ओर भंडारण बढ़ने की स्थिति अधिक आपूर्ति को दर्शाती है, जिससे कीमतों में मंदी का रुख बनता है।
एपीआई अपने आंकड़े प्रत्येक मंगलवार को जारी करता है, जबकि ईआईए की आधिकारिक रिपोर्ट उसके ठीक अगले दिन बुधवार को आती है। ऐतिहासिक रूप से दोनों रिपोर्टों के निष्कर्ष काफी मिलते-जुलते रहते हैं और लगभग 75 प्रतिशत मामलों में उनके आंकड़ों का अंतर 1 प्रतिशत के भीतर ही रहता है। हालांकि बाजार प्रतिभागी ईआईए के आंकड़ों को अधिक विश्वसनीय मानते हैं क्योंकि यह एक सरकारी एजेंसी द्वारा जुटाए गए आंकड़े होते हैं।
ओपेक और ओपेक प्लस की भूमिका
वैश्विक तेल की आपूर्ति को नियंत्रित करने में ओपेक यानी पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन की भूमिका केंद्रीय रहती है। यह संगठन 12 प्रमुख तेल उत्पादक देशों का एक समूह है, जो साल में दो बार होने वाली बैठकों में अपने सदस्य देशों के लिए उत्पादन कोटा निर्धारित करता है। ओपेक द्वारा उत्पादन में कटौती का फैसला आपूर्ति को तंग कर देता है, जिससे डब्ल्यूटीआई की कीमतों में उछाल आता है। वहीं जब यह समूह उत्पादन बढ़ाने की घोषणा करता है, तो बाजार में अतिरिक्त तेल आने की उम्मीद से कीमतें नीचे गिर जाती हैं। व्यापक बाजार में इसे ओपेक प्लस के रूप में जाना जाता है, जिसमें दस अतिरिक्त गैर-ओपेक सदस्य देश शामिल हैं। इन गैर-ओपेक सहयोगी देशों में सबसे प्रमुख और प्रभावशाली देश रूस है, जिसकी आपूर्ति नीतियां सीधे तौर पर वैश्विक तेल समीकरणों को बदल देती हैं।
मुद्रा बाजार और कीमती धातुओं का रुझान
ऊर्जा बाजार में मचे इस घमासान के समानांतर अन्य प्रमुख संपत्तियों में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। विदेशी मुद्रा बाजार में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर यानी एयूडी/यूएसडी ने साप्ताहिक निचले स्तर से उबरते हुए वापसी की और शुक्रवार को एशियाई सत्र के दौरान 0.7000 के स्तर की ओर बढ़ने की कोशिश की। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में रात भर आई नरमी ने अमेरिकी डॉलर को उसके 18 महीने के उच्च स्तर से नीचे बनाए रखा, जिससे इस जोड़ी को सहारा मिला। साथ ही आरबीए की सख्त मौद्रिक नीति की उम्मीदों ने भी ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को सहारा दिया।
दूसरी तरफ यूएसडी/जेपीवाई की जोड़ी 158.00 के आसपास अपनी बढ़त बनाए रखने में सफल रही। शुक्रवार को आए आंकड़ों के अनुसार जापान में घरेलू खर्च लगातार नौवें महीने गिरा, जिससे जापानी येन पर दबाव बना रहा। वहीं सोने के बाजार में भी सुस्ती रही। शुरुआती तेजी में साप्ताहिक उच्च स्तर को छूने की कोशिश के बाद सोना शुक्रवार को फिसलकर 4,200 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के नीचे आ गया। अमेरिकी डॉलर में तेजी और ट्रेजरी यील्ड में बढ़त के कारण पीली धातु की आगे की तेजी सीमित बनी रही।

















