अमेरिकी अर्थव्यवस्था से सामने आए नए आंकड़े रोजगार और मुद्रास्फीति को लेकर एक बेहद उलझी हुई तस्वीर पेश कर रहे हैं। गैर-कृषि पेरोल में आई भारी सुस्ती के विपरीत घरेलू सर्वेक्षण ने रोजगार में बड़ी छलांग दिखाई है, जबकि महंगाई के आंकड़े अनुमान से नीचे बने हुए हैं। इस पृष्ठभूमि में वैश्विक वित्तीय बाजारों के भीतर अमेरिकी डॉलर का दबदबा एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है, जिसका सीधा असर प्रमुख विदेशी मुद्राओं, सोने की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर महसूस किया जा रहा है।
पेरोल में तेज गिरावट लेकिन घरेलू सर्वेक्षण में दिखी तेजी
श्रम बाजार के मोर्चे पर सितंबर महीने के दौरान गैर-कृषि पेरोल में केवल 29,000 की वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़ा ब्लूमबर्ग द्वारा सर्वेक्षण किए गए अर्थशास्त्रियों की 90,000 की उम्मीद की तुलना में काफी कमजोर रहा। हालांकि, इसी दौरान जारी घरेलू सर्वेक्षण ने एक अलग ही रुख दर्शाया, जिसके अनुसार सितंबर में रोजगार में 406,000 का उछाल देखा गया। इसके बावजूद देश में बेरोजगारी दर 0.1 प्रतिशत बढ़कर 4.2 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई।
दूसरी तरफ, आर्थिक वृद्धि के मोर्चे पर राहत के संकेत मिले हैं, जहां दूसरी तिमाही के वास्तविक जीडीपी विकास दर के आंकड़े को संशोधित कर 2.2 प्रतिशत वार्षिक कर दिया गया है। रोजगार के कमजोर पेरोल आंकड़े और घरेलू स्तर पर रोजगार वृद्धि के बीच यह असंतुलन नीति निर्माताओं के लिए श्रम बाजार की वास्तविक मजबूती को परखना चुनौतीपूर्ण बना रहा है।
महंगाई दर में स्थिरता और कार्यप्रणाली में बदलाव
मुद्रास्फीति के मोर्चे पर अगस्त महीने का हेडलाइन पीसीई डिफ्लेटर 3.4 प्रतिशत पर दर्ज किया गया, जो पिछले महीने के बराबर ही रहा और बाजार के 3.7 प्रतिशत के सर्वसम्मति अनुमान से काफी कम रहा। इसी तरह 12 महीने का मुख्य यानी कोर पीसीई डिफ्लेटर भी 3.0 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रहा, जो अर्थशास्त्रियों के अनुमान की तुलना में 0.3 प्रतिशत कम था।
मुद्रास्फीति के आंकड़ों में आई इस गिरावट और अनुमान से कम रहने के पीछे एक हिस्सा गणना की कार्यप्रणाली में किए गए बदलावों से भी जुड़ा है। महंगाई के इन आंकड़ों ने फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाओं को कमजोर किया है, लेकिन व्यापक आर्थिक अनिश्चितता के चलते वित्तीय परिसंपत्तियों में उठापटक बनी हुई है।
डॉलर इंडेक्स की तेजी से विदेशी मुद्रा बाजारों में गिरावट
अमेरिकी डॉलर में आई 17 महीने के उच्चतम स्तर की वापसी ने प्रमुख वैश्विक मुद्राओं पर भारी दबाव बना दिया है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले देर से एशियाई कारोबार में 0.6900 के स्तर की तरफ फिसल गया। मिडिल ईस्ट और रूस-यूक्रेन के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव ने डॉलर को सुरक्षित विकल्प के रूप में सहारा दिया है, जबकि ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा के लिए अब नजरें बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल और रिज़र्व बैंक ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया के रुख पर टिकी हैं।
दूसरी ओर, जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर 158.00 के स्तर को दोबारा हासिल करने में कामयाब रहा और पिछले एक सप्ताह के दायरे में कारोबार करता दिखा। हालांकि, बैंक ऑफ जापान के सख्त रुख की उम्मीदों और मुद्रा बाजार में संभावित हस्तक्षेप की आशंकाओं के कारण इस जोड़ी की आगे की बढ़त सीमित रह सकती है। यूरो मुद्रा में भी तीव्र गिरावट दर्ज की गई है, जहां यह जोड़ी 1.1312 के स्तर तक गिरकर मई 2025 के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई, जो जनवरी के 1.2082 के उच्चतम स्तर से काफी नीचे है। यूरोप के ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक जोखिमों ने यूरो पर दोहरा दबाव बना रखा है।
सोने और कच्चे तेल के कारोबार में लगातार नरमी
कीमती धातुओं के बाजार में सोना 4,150 डॉलर प्रति औंस के करीब अपने सुधार को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, हालांकि निकट अवधि में इसका तकनीकी रुझान गिरावट की ओर झुका हुआ नजर आ रहा है। अमेरिकी डॉलर के 17 महीने के उच्च स्तर पर पहुंचने से पीली धातु पर दबाव कायम है, भले ही ट्रेजरी यील्ड और तेल की कीमतों में गिरावट देखी जा रही हो।
ऊर्जा बाजार में वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट कच्चे तेल के दाम लगातार दूसरे दिन गिरकर एशियाई कारोबारी घंटों के दौरान 89.30 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहे। तेल की कीमतों में यह नरमी तब आई जब जी7 देशों ने अपने आपातकालीन भंडार से 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और डीजल जारी करने पर सहमति जताई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के बाद इन देशों ने ऊर्जा निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से बचने की प्रतिबद्धता भी जताई, जिससे वैश्विक आपूर्ति को लेकर तात्कालिक राहत मिली है।
















