उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर शहर में कभी सिनेप्रेमियों की धड़कन रहा ऐतिहासिक राहुल टॉकीज एक बार फिर चर्चा में है। किसी जमाने में बड़े पर्दे पर फिल्में देखने के लिए यहां शो शुरू होने से कई घंटे पहले टिकट खिड़की पर लंबी कतारें लग जाती थीं। पारिवारिक मेल-मिलाप से लेकर दोस्तों के साथ जिंदगी की पहली फिल्म देखने का रोमांच इसी परिसर से जुड़ा हुआ था। वक्त के साथ मनोरंजन के तौर-तरीके बदले, नई तकनीक आई और धीरे-धीरे इस सिनेमा हॉल की चहल-पहल कम होती चली गई। दर्शकों की कमी और लगातार आर्थिक दबाव के चलते यह परिसर पूरी तरह वीरान हो गया, लेकिन आज भी सुल्तानपुर के बाशिंदों के दिलों में इससे जुड़ी अनगिनत यादें पूरी तरह ताजा हैं।
वर्ष 2016 से लटका था ताला, अब श्री राज पैलेस पड़ा नया नाम
सुल्तानपुर के फिल्म प्रेमियों की पहली पसंद रहे इस पुराने सिनेमा हॉल का मौजूदा नाम बदलकर श्री राज पैलेस कर दिया गया है। यह प्रतिष्ठान वर्ष 2016 से लगातार बंद पड़ा है। सिनेमा हॉल के संचालक हीरालाल यादव के अनुसार, लगातार बढ़ते वित्तीय नुकसान और गंभीर आर्थिक तंगी के कारण इसे बंद करने का कठिन फैसला लेना पड़ा था। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि अब इस ऐतिहासिक केंद्र को एक बार फिर से जीवित करने और नए सिरे से संचालित करने के गंभीर प्रयास शुरू किए जाएंगे। करीब एक दशक से बंद रहने की वजह से पूरे परिसर की इमारत बेहद खस्ताहाल हो चुकी है, जिसके नवीनीकरण की बड़ी चुनौती सामने है।
जर्जर ढांचा, उखड़ा साउंड सिस्टम और छतों से रिसता पानी
कभी हाउसफुल शो और तालियों की गूंज से आबाद रहने वाला यह हॉल वर्तमान में बदहाली के दौर से गुजर रहा है। ऑडिटोरियम के भीतर दर्शकों के बैठने के लिए लगाई गई अधिकांश कुर्सियां या तो टूट चुकी हैं या पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। दीवारों पर बेहतर आवाज के लिए लगाई गई साउंडप्रूफिंग सामग्री और फोम उखड़कर नीचे गिर रहे हैं। इसके साथ ही छत पर डाली गई टिन की चादरें कई जगहों से क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, जिससे बारिश के दिनों में पानी सीधे हॉल के भीतर टपकता है। रखरखाव के अभाव में पूरा परिसर पूरी तरह खंडहर में बदल चुका है, जिसकी तत्काल मरम्मत की आवश्यकता है।
शोले और लैला मजनू के सुनहरे दौर को याद कर रहे शहरवासी
सुल्तानपुर के स्थानीय निवासी मेराज खान का कहना है कि राहुल टॉकीज केवल फिल्मों के प्रदर्शन का जरिया नहीं था, बल्कि शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा रहा है। उन्होंने यहां शोले, अलीबाबा चालीस चोर और लैला मजनू जैसी ब्लॉकबस्टर क्लासिक फिल्में बड़े पर्दे पर देखी थीं। एक अन्य स्थानीय नागरिक एजाज ने भी इस सिनेमा हॉल को आधुनिक स्वरूप में पुनर्जीवित करने की मांग उठाई है। स्थानीय लोगों का मानना है कि उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक विभाग को सिनेमा हॉल के संचालक हीरालाल यादव के साथ मिलकर एक ठोस योजना तैयार करनी चाहिए। ऐसा करने से न केवल सुल्तानपुर की ऐतिहासिक पहचान बचेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी शहर की इस सांस्कृतिक धरोहर से रूबरू हो सकेंगी।






















